श्लोक · Shlok 16
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् | मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्॥
ahaṃ kraturahaṃ yajñaḥ svadhāhamahamauṣadham. mantro.ahamahamevājyamahamagnirahaṃ hutam.
Translation · अर्थ
English
I am the Kratu; I am the Yajna; I am the offering (food) to the manes; I am the medicinal herbs and all the plants; I am the Mantra; I am also the Ghee or the melted butter; I am the fire; I am the oblation.
Sūtradhāra Vichār
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A.C. Bhaktivedanta Swami PrabhupadaEnglish Commentary+
The Vedic sacrifice known as Jyotiṣṭoma is also Kṛṣṇa, and He is also the Mahā-yajña mentioned in the smṛti. The oblations offered to the Pitṛloka or the sacrifice performed to please the Pitṛloka, considered as a kind of drug in the form of clarified butter, is also Kṛṣṇa. The mantras chanted in this connection are also Kṛṣṇa. And many other commodities made with milk products for offering in the sacrifices are also Kṛṣṇa. The fire is also Kṛṣṇa because fire is one of the five material elements and is therefore claimed as the separated energy of Kṛṣṇa. In other words, the Vedic sacrifices recommended in the karma-kāṇḍa division of the Vedas are in total also Kṛṣṇa. Or, in other words, those who are engaged in rendering devotional service unto Kṛṣṇa are to be understood to have performed all the sacrifices recommended in the Vedas.
Swami SivanandaEnglish Commentary+
अहम् I? क्रतुः sacrifice? अहम् I? यज्ञः the sacrifice? स्वधा the offering to Pitris or ancestors? अहम् I? अहम् I? औषधम् the medicinal herbs and all plants? मन्त्रः sacred syllable? अहम् I? अहम् I? एव also? आज्यम् ghee or clarified butter? अहम् I? अग्निः the fire? अहम् I? हुतम् the offering.Commentary Kratu is a kind of Vedic sacrifice.Yajna is the worship enjoined in the Smriti or the holy books laying down lay and the code of conduct.I am the Mantra? the chant with which the oblation is offered to the manes or ancestors? and the shining ones (the Devatas or gods).Hutam also means the act of offering.Aushadham All plants including rice and barley or medicine that can cure diseases. (Cf.IV.24)
Swami ChinmayanandaHindi Commentary+
,इस श्लोक में उक्त विचार को इसके पूर्व भी एक प्रसिद्ध श्लोक में व्यक्त किया गया था। हवन क्रिया तथा उसमें प्रयुक्त विविध सामग्रियों के रूपक के द्वारा इस श्लोक में आत्मा की सर्वरूपता एवं सर्वात्मकता का बोध कराया गया है। कर्मकाण्ड में वर्णित कर्मानुष्ठान ही पूजाविधि है। वेदों में उपदिष्ट यज्ञ कर्म को क्रतु तथा स्मृतिग्रन्थों में कथित कर्म को ही यज्ञ कहा जाता है? जिसका अनुष्ठान महाभारत काल में किया जाता था। पितरों को दिया जाने वाला अन्न स्वधा कहलाता है। अर्जुन को यहाँ उपदेश में बताया गया है कि उपर्युक्त ये सब क्रतु आदि मैं ही हूँ।इतना ही नही वरन् यज्ञकर्म में प्रयुक्त औषधि? अग्नि में आहुति के रूप में अर्पित किया जाने वाला घी (आज्यम्)? अग्नि? कर्म में उच्चारित मन्त्र और हवन क्रिया ये सब विविध रूपों में आत्मा की ही अभिव्यक्ति हैं। जब स्वर्ण से अनेक आभूषण बनाये जाते हैं? तब स्वर्ण निश्चय ही यह कह सकता है कि मैं कुण्डल हूँ? मैं अंगूठी हूँ? मैं कण्ठी हूँ? मैं इन सब की चमक हूँ आदि। इसी प्रकार? आत्मा ही सब रूपों का? घटनाओं आदि का सारतत्त्व होने के कारण भगवान् श्रीकृष्ण का उक्त कथन दार्शनिक बुद्धि से सभी पाठकों को स्वीकार्य होगा।और --
Swami RamsukhdasHindi Commentary+
व्याख्या--[अपनी रुचि, श्रद्धा-विश्वासके अनुसार किसीको भी साक्षात् परमात्माका स्वरूप मानकर उसके साथ सम्बन्ध जोड़ा जाय तो वास्तवमें यह सम्बन्ध सत्के साथ ही है। केवल अपने मन-बुद्धिमें किञ्चिन्मात्र भी संदेह न हो। जैसे ज्ञानके द्वारा मनुष्य सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिमें एक परमात्मतत्त्वको ही जानता है। परमात्माके सिवाय दूसरी किसी वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, क्रिया,आदिकी किञ्चिन्मात्र भी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है--इसमें उसको किञ्चिन्मात्र भी संदेह नहीं होता। ऐसे ही भगवान् विराट्रूपसे अनेक रूपोंमें प्रकट हो रहे हैं; अतः सब कुछ भगवान्-ही-भगवान् हैं -- इसमें अपनेको किञ्चिन्मात्र भी संदेह नहीं होना चाहिये। कारण कि 'यह सब भगवान् कैसे हो सकते हैं?' यह संदेह साधकको वास्तविक तत्त्वसे, मुक्तिसे वञ्चित कर देता है और महान् आफतमें फँसा देता है। अतः यह बात दृढ़तासे मान लें कि कार्य-कारणरूपे स्थूल-सूक्ष्मरूप जो कुछ देखने, सुनने, समझने और माननेमें आता है, वह सब केवल भगवान् ही हैं। इसी कार्य-कारणरूपसे भगवान्की सर्वव्यापकताका वर्णन सोलहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक किया गया है।] 'अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्'-- जो वैदिक रीतिसे किया जाय, वह 'क्रतु' होता है। वह क्रतु मैं ही हूँ। जो स्मार्त (पौराणिक) रीतिसे किया जाय, वह 'यज्ञ' होता है, जिसको पञ्चमहायज्ञ आदि स्मार्त-कर्म कहते हैं। वह यज्ञ मैं हूँ। पितरोंके लिये जो अन्न अर्पण किया जाता है, उसको स्वधा कहते हैं। वह स्वधा मैं ही हूँ। उन क्रतु, यज्ञ और स्वधाके लिये आवश्यक जो शाकल्य है अर्थात् वनस्पतियाँ हैं, बूटियाँ हैं, तिल, जौ, छुहारा आदि औषध है, वह औषध भी मैं ही हूँ। 'मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्'-- जिस मन्त्रसे क्रतु, यज्ञ और स्वधा किये जाते हैं, वह मन्त्र भी मैं ही हूँ। यज्ञ आदिके लिये गो-घृत आवश्यक होता है, वह घृत भी मैं ही हूँ। जिस आहवनीय अग्निमें होम किया जाता है, वह अग्नि भी मैं ही हूँ और हवन करनेकी क्रिया भी मैं ही हूँ।'वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च'-- वेदोंकी बतायी हुई जो विधि है, उसको ठीक तरहसे जानना 'वेद्य' है। तात्पर्य है कि कामनापूर्तिके लिये अथवा कामना-निवृत्तिके लिये वैदिक और शास्त्रीय जो कुछ क्रतु, यज्ञ आदिका अनुष्ठान किया जाता है, वह विधि-विधान-सहित साङ्गोपाङ्ग होना चाहिये। अतः विधि-विधानको जाननेयोग्य सब बातें 'वेद्य' कहलाती हैं। वह वेद्य मेरा स्वरूप है। यज्ञ, दान और तप --ये तीनों निष्काम पुरुषोंको महान् पवित्र करनेवाले हैं -- 'यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्' (18। 5)। इनमें निष्कामभावसे जो हव्य आदि वस्तुएँ खर्च होती हैं, वे भी पवित्र हो जाती हैं और इनमें निष्कामभावसे जो क्रिया की जाती है, वह भी पवित्र हो जाती है। यह पवित्रता मेरा स्वरूप है। क्रतु, यज्ञ आदिका अनुष्ठान करनेके लिये जिन ऋचाओंका उच्चारण किया है, उन सबमें सबसे पहले का ही उच्चारण किया जाता है। इसका उच्चारण करनेसे ही ऋचाएँ अभीष्ट फल देती हैं। वेदवादियोंकी यज्ञ, दान, तप आदि सभी क्रियाएँ का उच्चारण करके ही आरम्भ होती हैं (गीता 17। 24)। वैदिकोंके लिये प्रणवका उच्चारण मुख्य है। इसलिये भगवान्ने प्रणवको अपना स्वरूप बताया है। उन क्रतु, यज्ञ आदिकी विधि बतानेवाले ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद -- ये तीनों वेद हैं। जिसमें नियताक्षरवाले मन्त्रोंकी ऋचाएँ होती हैं, उन ऋचाओंके समुदायको ऋग्वेद कहते हैं। जिसमें स्वरोंसहित गानेमें आनेवाले मन्त्र होते हैं, वे सब मन्त्र सामवेद कहलाते हैं। जिसमें अनियताक्षरवाले मन्त्र होते हैं, वे मन्त्र 'यजुर्वेद' कहलाते है (टिप्पणी प0 504)। ये तीनों वेद भगवान्के ही स्वरूप हैं। 'पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः' -- इस जड-चेतन, स्थावर-जङ्गम आदि सम्पूर्ण संसारको मैं ही उत्पन्न करता हूँ -- 'अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः' ( गीता 7। 6 ) और बार-बार अवतार लेकर मैं ही इसकी रक्षा करता हूँ। इसलिये मैं 'पिता' हूँ। ग्यारहवें अध्यायके तैंतालीसवें श्लोकमें अर्जुनने भी कहा है कि 'आप ही इस चराचर जगत्के पिता हैं'--'पितासि लोकस्य चराचरस्य।' इस संसारको सब तरहसे मैं ही धारण करता हूँ और संसारमात्रका जो कुछ विधान बनता है, उस विधानको,बनानेवाला भी मैं हूँ। इसलिये मैं 'धाता' हूँ।जीवोंकी अपने-अपने कर्मोंके अनुसार जिस-जिस योनिमें, जैसे-जैसे शरीरोंकी आश्यकता पड़ती है, उस-उस योनिमें वैसे-वैसे शरीरोंको पैदा करनेवाली 'माता' मैं हूँ अर्थात् मैं सम्पूर्ण जगत्की माता हूँ। प्रसिद्धिमें ब्रह्माजी सम्पूर्ण सृष्टिको पैदा करनेवाले हैं-- इस दृष्टिसे ब्रह्माजी प्रजाके पिता हैं। वे ब्रह्माजी भी मेरेसे प्रकट होते हैं-- इस दृष्टिसे मैं ब्रह्माजीका पिता और प्रजाका 'पितामह' हूँ। अर्जुनने भी भगवान्को ब्रह्माके आदिकर्ता कहा है --'ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे' (11। 37)। 'गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्'--प्राणियोंके लिये जो सर्वोपरि प्रापणीय तत्त्व है, वह 'गति'--स्वरूप मैं ही हूँ। संसारमात्रका भरण-पोषण करनेवाला 'भर्ता 'और संसारका मालिक 'प्रभु' मैं ही हूँ। सब समयमें सबको ठीक तरहसे जाननेवाला 'साक्षी' मैं हूँ। मेरे ही अंश होनेसे सभी जीव स्वरूपसे नित्य-निरन्तर मेरेमें ही रहते हैं, इसलिये उन सबका 'निवास' --स्थान मैं ही हूँ। जिसका आश्रय लिया जाता है, वह 'शरण' अर्थात् शरणागतवत्सल मैं ही हूँ। बिना कारण प्राणिमात्रका हित करनेवाला 'सुहृद्' अर्थात् हितैषी भी मैं हूँ। 'प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्'--सम्पूर्ण संसार मेरेसे ही उत्पन्न होता है और मेरेमें ही लीन होता है, इसलिये मैं 'प्रभव' और 'प्रलय' हूँ अर्थात् मैं ही संसारका निमित्तकारण और उपादानकारण हूँ (गीता 7। 6)। महाप्रलय होनेपर प्रकृतिसहित सारा संसार मेरेमें ही रहता है, इसलिये मैं संसारका 'स्थान' (टिप्पणी प0 505.1) हूँ।संसारकी चाहे सर्गअवस्था हो, चाहे प्रलय-अवस्था हो, इन सब अवस्थाओंमें प्रकृति, संसार, जीव तथा जो कुछ देखने, सुनने, समझनेमें आता है, वह सब-का-सब मेरेमें ही रहता है, इसलिये मैं 'निधान' हूँ।सांसारिक बीज तो वृक्षसे पैदा होता है और वृक्षको पैदा करके नष्ट हो जाता है; परन्तु ये दोनों ही दोष मेरेमें नहीं हैं। मैं अनादि हूँ अर्थात् पैदा होनेवाला नहीं हूँ और अनन्त सृष्टियाँ पैदा करके भी जैसा-का-तैसा ही रहता हूँ। इसलिये मैं 'अव्यय बीज' हूँ।
Sri Abhinav GuptaSanskrit Commentary+
।।9.16 -- 9.19।।ननु कर्म तावत् कारककलापव्याप्तभेदोद्रेकि कथमभिन्नं भगवत्पदं प्रापयतीति उच्यते -- अहं क्रतुरिति अर्जुनेत्यनन्तम्। एकस्यैव निर्भागस्य ब्रह्मतत्त्वस्य परिकल्पित [भेदवत्] साधनाधीनं कर्म पुनरेकत्वं निर्वर्तयति क्रियायाः सर्वकारकात्मसाक्षात्कारेणावस्थाने भगवत्पदप्राप्तिं प्रत्यविदूरत्वात्। उक्तं च -- सेयं क्रियात्मिका शक्तिः शिवस्य पशुवर्तिनी।बन्धयित्री स्वमार्गस्था ज्ञाता सिद्ध्युपपादिका।। (Spk? III? 16)इति मयाप्युक्तम् -- उपक्रमे यैव बुद्धिर्भावाभावानुयायिनी।उपसंहृतिकाले सा भावाभावानुयायिनी।।इति।तत्र तत्र वितत्य विचारितचरमेतत् इतीहोपरम्यते (S omits इति)। तपाम्यहमित्यादि अद्वैतकथाप्रसङ्गेनोक्तम्।
Sri AnandgiriSanskrit Commentary+
भगवदेकविषयमुपासनं तर्हि न सिध्यतीति शङ्कते -- यदीति। प्रकारभेदमादाय ध्यायन्तोऽपि भगवन्तमेव ध्यायन्ति तस्य सर्वात्मकत्वादित्याह -- अत आहेति। क्रतुयज्ञशब्दयोरपौनरुक्त्यं दर्शयन् व्याचष्टे -- श्रौत इत। क्रियाकारकफलजातं भगवदतिरिक्तं नास्तीति समुदायार्थः।
Sri DhanpatiSanskrit Commentary+
ननु बहुभिः प्रकारैः यदि उपासते तर्हि कथं तेषां त्वदेकविषयमुपासनं सिध्यतीत्याशङ्क्य तत्तत्प्रकारभेदेन ध्यायन्तोऽपि मामेव ध्यायन्ति सर्वात्मकत्वान्ममेत्याशयेनाह -- अहमित्यादिना। अहं क्रतुः श्रौतः कर्मभेदोऽहमेवं। ननु क्रतुः संकल्पो देवताध्यानरुप इति भाष्यकृद्भिः कुतो न व्याख्यातमितिचेत्? यज्ञादिसमभिव्याहारादिति गृहाण। यज्ञः स्मार्तकर्मभेदो वैश्वदेवादिः सोऽप्यहमेव। पितृभ्योद्दीयतेऽन्नं तत्स्वधाशब्देन ग्राह्यम्। सर्वप्राणिभिर्यदद्यतेऽन्नं तदौषधम्। यद्वा स्वधाशब्देन साधारणमन्नं गृह्यते। औषधशब्देन व्याधिनिवर्तकमौषधम्। येन पितृभ्यो देवेभ्यश्च हविर्दीयते स मन्त्रः आज्यं हविः यस्मिन्हूयते सोऽग्निः हुतं हवनकर्मक्रियाकारकफलजातं मह्यतिरिक्तं नास्तीति समुदायार्थः।
Sri JayatrithaSanskrit Commentary+
विश्वतोमुखं इत्युक्तं सर्वात्मकत्वं प्रपञ्चयत्युत्तरेण इत्यन्यथा व्याख्याननिरासार्थमाह -- प्रतिज्ञातमिति। अन्यथा प्रतिज्ञातानुक्तिप्रसङ्ग इति भावः। व्याख्यानं तुरसोऽहमप्सु [7।8] इत्यादेरिव द्रष्टव्यम्।क्रतवः इति क्रतुयज्ञशब्दयोरर्थभेदमाह। सामान्यविशेषभावेन भेद इत्यर्थः।
Sri MadhavacharyaSanskrit Commentary+
प्रतिज्ञातं विज्ञानमाह -- अहं क्रतुरित्यादिना। क्रतवोऽग्निष्टोमादयः। यज्ञो देवतामुद्दिश्य द्रव्यपरित्यागः।उद्दिश्य देवान्द्रव्याणां त्यागो यज्ञ इतीरितः इत्यभिधानात्।
Sri Madhusudan SaraswatiSanskrit Commentary+
यदि बहुधोपासते तर्हि कथं त्वामेवेत्याशङ्क्यात्मनो विश्वरूपत्वं प्रपञ्चयति चतुर्भिः -- सर्वस्वरूपोऽहमिति वक्तव्ये तत्तदेकदेशकथनमवयुत्यानुवादेन वैश्वानरे द्वादशकपालेऽष्टाकपालत्वादिकथनवत्। क्रतुः श्रौतोऽग्निष्टोमादिः? यज्ञः स्मार्तो वैश्वदेवादिर्महायज्ञत्वेन श्रुतिस्मृतिप्रसिद्धः? स्वधान्नं पितृभ्यो दीयमानं? औषधं ओषधिप्रभवमन्नं सर्वैः प्राणिभिर्भज्यमानं भेषजं वा। मन्त्रो याज्यापुरोनुवाक्यादिर्येनोद्दिश्य हविर्दीयते देवेभ्यः। आज्यं घृतम्। सर्वहविरुपलक्षणमिदम्। अग्निराहवनीयादिर्हविप्रक्षेपाधिकरणम्। हुतं हवनं हविःप्रक्षेपः। एतत्सर्वमहं परमेश्वर एव। एतदेकैकज्ञानमपि भगवदुपासनमिति कथयितुं प्रत्येकमहंशब्दः। क्रियाकारकफलजातं किमपि भगवदतिरिक्तं नास्तीति समुदायार्थः।
Sri NeelkanthSanskrit Commentary+
इदमेवोपासनं विवृणोति -- अहमिति। क्रतुः संकल्पो देवताध्यानरूपः। यज्ञः श्रौतः स्मार्तश्च देवतोद्देशेन द्रव्यत्यागः। स्वधा पितृ़णामन्नम्। औषधं मनुष्याणामन्नम्। मन्त्रो येन दीयते सः। आज्यं हविः। अग्निः। हुतं प्रक्षेपक्रिया। इदं सर्वं यस्मादहमेवातस्तेषां विश्वतोमुखमुपासनं युक्ततरमित्यर्थः।
Sri PurushottamjiSanskrit Commentary+
नन्वेकमेव त्वां बहुधा ये भजन्ति ते च ज्ञानिन एव? तेषामज्ञाने ज्ञाने कथं प्रवेशः इत्याशङ्क्य तत्तदात्मकं मां ज्ञात्वैव भजन्तीति ज्ञापनाय स्वस्य सर्वात्मत्वं प्रकटयति -- क्रतुरित्यादिचतुर्भिः। क्रतुः यज्ञाधिष्ठात्री देवता अहम्? आधिदैविकरूपस्तत्फलदातेत्यर्थः। यज्ञो धर्मात्मकोऽग्निहोत्रादिर्यज्ञात्मकोऽहम्। स्वधा पित्रर्थे श्राद्धादिपितृयज्ञरूपोऽहम्। औषधं सकलरोगनिवर्तनात्मकभैषज्यरूपोऽन्नरूपो वा अहम्। मन्त्रः ऋगादिरहम्। आज्यं होमद्रव्यं हविः। अग्निराहवनीयादिः। हुतं होमः।
Sri RamanujaSanskrit Commentary+
अहं क्रतुः अहं ज्योतिष्टोमादिकक्रतुः अहम् एव यज्ञः महायज्ञः अहम् एव स्वधा पितृगणपुष्टिदायिनी औषधं हविः च अहम् एव। अहम् एव च मन्त्रः अहम् एव आज्यम्। प्रदर्शनार्थम् इदम्? सोमादिकं च हविः अहम् एव इत्यर्थः। अहम् आहवनीयादिकः अग्निः होमश्च अहम् एव।
Sri ShankaracharyaSanskrit Commentary+
--,अहं क्रतुः श्रौतकर्मभेदः अहमेव। अहं यज्ञः स्मार्तः। किञ्च स्वधा अन्नम् अहम्? पितृभ्यो यत् दीयते। अहम् औषधं सर्वप्राणिभिः यत् अद्यते तत् औषधशब्दशब्दितं व्रीहियवादिसाधारणम्। अथवा स्वधा इति सर्वप्राणिसाधारणम् अन्नम्? औषधम् इति व्याध्युपशमनार्थं भेषजम्। मन्त्रः अहम्? येन पितृभ्यो देवताभ्यश्च हविः दीयते। अहमेव आज्यं हविश्च। अहम् अग्निः? यस्मिन् हूयते हविः सः अग्निः अहम्। अहं हुतं हवनकर्म च।।किञ्च --,
Sri Sridhara SwamiSanskrit Commentary+
सर्वात्मतां प्रपञ्चयति -- अहमिति चतुर्भिः। क्रतुः श्रौतोऽग्निष्टोमादिः? यज्ञस्तु स्मार्तः पञ्चयज्ञादिः? स्वधा पित्रर्थे श्राद्धादिः? औषधमोषधिप्रभवमन्नं भेषजं वा? मन्त्रो याज्यापुरोनुवाक्यादिः? आज्यं होमादिसाधनम्? अग्निराहवनीयादिः? हुतं होमः? एतत्सर्वमहमेव।
Sri VallabhacharyaSanskrit Commentary+
अन्त्यपक्षमेव ज्ञानं सिद्धं विवृणोति -- अहमिति चतुर्भिश्चतुर्विधपुरुषार्थसिद्ध्यर्थम्। अत्र स्वस्य सर्वरूपत्वात्सर्वोऽहं इति वक्तव्यत्वेऽपि यत्तदेकदेशरूपेण कथनं तद्वैश्वानरद्वादशकपालादिवद्देवयुक्त्यानुवादेन। तत्पदयोजनं तु तत्तद्रूपं भजतां तेन रूपेण फलदानं वैश्वानरद्वादशकपालाष्टादशकपालादिकानां तथैव सिद्धत्वादिति तत्तद्रूपत्वं ज्ञात्वा मां भजतां मत्त एव सर्वं फलं इति बोधयितुमाह -- क्रतुरिति। क्रतुः श्रौतकर्मसु सङ्कल्पः अहं ब्रह्मैव। यज्ञः श्रौतः सोमादिरहम्। स्वधा पितृभ्यो दीयमानमन्नं नान्दीमुखादौ। औषधं व्रीह्यादिकमन्नं ब्रह्म। मन्त्रो गायत्र्यादिः? आथर्वणश्च ब्रह्मकर्मरूपोऽहं याज्यापुरोनुवाक्यादिरूपश्च। आज्यं घृतं सर्वहव्योपलक्षणमेतत्। अग्निस्त्रेतादिरूपोऽहं पञ्चाग्निविद्यासिद्धश्च। हुतं हविःप्रक्षेपोऽहं ब्रह्म। तदुपासनत्वेन ब्रह्मत्वं बोधयितुं प्रत्येकमहं शब्दः।
Vedantadeshikacharya VenkatanathaSanskrit Commentary+
यद्यपि परव्यूहादिरूपेणैकत्वपृथक्त्वे वक्तुं शक्ये? तथापि अनन्तरग्रन्थानुसारादुक्त एवार्थ इत्यभिप्रायेणअहं क्रतुः इत्यादिश्लोकचतुष्टयस्य प्रकृतसङ्गतमर्थं चाहतथाहीति।ज्योतिष्टोमादिक इत्यनेनमहायज्ञ इत्यनेन च विषयविशेषप्रदर्शनात् क्रतुयज्ञशब्दयोः पौनरुक्त्यपरिहारः। शारीरमानसश्रौतस्मार्तादिविभागस्तु न प्रसिद्ध्यनुसारीति भावः। महायज्ञः ब्रह्मयज्ञादिः पञ्चविधः। अविशेषादेवकारः सर्वत्रान्वेतव्यः। क्रतुतदवयवादिप्रसङ्गात् स्वधाशब्दसहपाठादाज्यस्य च पृथगुक्तत्वादोषधिविकारहविर्विशेषविषयोऽयमौषधशब्द इत्याहऔषधं हविश्चाहमेवेति। एतेन स्वधौषधशब्दयोरन्नभेषजादिपरत्वव्याख्या प्रत्युक्ता।विशेषविधिः शेषनिषेधार्थः इति शङ्कां परिहरतिप्रदर्शनार्थमिति। एवमुत्तरेष्वपि पितामहादिकथनं प्रपितामहादिप्रदर्शनार्थं ग्राह्यम्। अत्राग्निशब्दस्य प्रकरणविशेषाद्भूततृतीयादिमात्रविषयत्वं न युज्यत इत्यभिप्रायेणाह -- अहमाहवनीयादिकोऽग्निरिति। हविषां प्रागुक्तत्वादत्र हुतशब्दो भावार्थ इत्याह -- होमश्चेति।