श्लोक · Shlok 14
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः | तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥
ananyacetāḥ satataṃ yo māṃ smarati nityaśaḥ. tasyāhaṃ sulabhaḥ pārtha nityayuktasya yoginaḥ.
Translation · अर्थ
English
I am easily attainable by that ever-steadfast Yogi who constantly and daily remembers Me (for a long time), not thinking of anything else (with a single mind or one-pointed mind), O Partha (Arjuna).
Sūtradhāra Vichār
Classical commentaries
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A.C. Bhaktivedanta Swami PrabhupadaEnglish Commentary+
This verse especially describes the final destination attained by the unalloyed devotees who serve the Supreme Personality of Godhead in bhakti-yoga. Previous verses have mentioned four different kinds of devotees – the distressed, the inquisitive, those who seek material gain, and the speculative philosophers. Different processes of liberation have also been described: karma-yoga, jñāna-yoga and haṭha-yoga. The principles of these yoga systems have some bhakti added, but this verse particularly mentions pure bhakti-yoga, without any mixture of jñāna, karma or haṭha. As indicated by the word ananya-cetāḥ, in pure bhakti-yoga the devotee desires nothing but Kṛṣṇa. A pure devotee does not desire promotion to heavenly planets, nor does he seek oneness with the brahma-jyotir or salvation or liberation from material entanglement. A pure devotee does not desire anything. In the Caitanya-caritāmṛta the pure devotee is called niṣkāma, which means he has no desire for self-interest. Perfect peace belongs to him alone, not to them who strive for personal gain. Whereas a jñāna-yogī, karma-yogī or haṭha-yogī has his own selfish interests, a perfect devotee has no desire other than to please the Supreme Personality of Godhead. Therefore the Lord says that for anyone who is unflinchingly devoted to Him, He is easy to attain. A pure devotee always engages in devotional service to Kṛṣṇa in one of His various personal features. Kṛṣṇa has various plenary expansions and incarnations, such as Rāma and Nṛsiṁha, and a devotee can choose to fix his mind in loving service to any of these transcendental forms of the Supreme Lord. Such a devotee meets with none of the problems that plague the practitioners of other yogas. Bhakti-yoga is very simple and pure and easy to perform. One can begin simply by chanting Hare Kṛṣṇa. The Lord is merciful to all, but as we have already explained, He is especially inclined toward those who always serve Him without deviation. The Lord helps such devotees in various ways. As stated in the Vedas ( Kaṭha Upaniṣad 1.2.23), yam evaiṣa vṛṇute tena labhyas/ tasyaiṣa ātmā vivṛṇute tanuṁ svām: one who is fully surrendered and engaged in the devotional service of the Supreme Lord can understand the Supreme Lord as He is. And as stated in Bhagavad-gītā, dadāmi buddhi-yogaṁ tam: the Lord gives such a devotee sufficient intelligence so that ultimately the devotee can attain Him in His spiritual kingdom. The special qualification of the pure devotee is that he is always thinking of Kṛṣṇa without deviation and without considering the time or place. There should be no impediments. He should be able to carry out his service anywhere and at any time. Some say that the devotee should remain in holy places like Vṛndāvana or some holy town where the Lord lived, but a pure devotee can live anywhere and create the atmosphere of Vṛndāvana by his devotional service. It was Śrī Advaita who told Lord Caitanya, “Wherever You are, O Lord – there is Vṛndāvana.” As indicated by the words satatam and nityaśaḥ, which mean “always,” “regularly,” or “every day,” a pure devotee constantly remembers Kṛṣṇa and meditates upon Him. These are qualifications of the pure devotee, for whom the Lord is most easily attainable. Bhakti-yoga is the system that the Gītā recommends above all others. Generally, the bhakti-yogīs are engaged in five different ways: (1) śānta-bhakta, engaged in devotional service in neutrality; (2) dāsya-bhakta, engaged in devotional service as servant; (3) sakhya-bhakta, engaged as friend; (4) vātsalya-bhakta, engaged as parent; and (5) mādhurya-bhakta, engaged as conjugal lover of the Supreme Lord. In any of these ways, the pure devotee is always constantly engaged in the transcendental loving service of the Supreme Lord and cannot forget the Supreme Lord, and so for him the Lord is easily attained. A pure devotee cannot forget the Supreme Lord for a moment, and similarly the Supreme Lord cannot forget His pure devotee for a moment. This is the great blessing of the Kṛṣṇa conscious process of chanting the mahā-mantra – Hare Kṛṣṇa, Hare Kṛṣṇa, Kṛṣṇa Kṛṣṇa, Hare Hare/ Hare Rāma, Hare Rāma, Rāma Rāma, Hare Hare.
Swami SivanandaEnglish Commentary+
अनन्यचेताः with the mind not thinking of any other object? सततम् constantly? यः who? माम् Me? स्मरति remembers? नित्यशः daily? तस्य of him? अहम् I? सुलभः easily attainable? पार्थ O Partha? नित्ययुक्तस्य eversteadfast? योगिनः of Yogi.Commentary I am easily attainable by that eversteadfast Yogi who constantly and daily remembers Me (for a long time)? not thinking of anything else (with a single mind or onepointed mind)? O Partha (Arjuna).Commentary Constantly remembering the Lord throughout the life is the most easy way of attaining Him.Ananyachetah He has no attachment for any other object. He will not think of any other object save his IshtaDevata or tutelary deity.Nityasah For a long time? i.e.? till the end of life.He who remembers the Lord by fits and starts or he who remembers Him for six montsh and then leaves the practice and then again remembers Him for six months and so on cannot attain Him. (Cf.IX.22?34)
Swami ChinmayanandaHindi Commentary+
उस नित्ययुक्त योगी के लिए आत्मप्राप्ति सहज साध्य होती है जो मुझ चैतन्यस्वरूप आत्मा का अनन्यभाव से नित्यप्रतिदिन स्मरण करता है। पूर्व श्लोकों में कथित सिद्धान्त को ही यहाँ संक्षेप में किन्तु स्पष्ट एवं प्रभावशाली भाषा में कहा गया है।प्रार्थना कोई कीटनाशक दवाई नहीं कि जिसका यदकदा छिड़काव करना ही पर्याप्त है उसी प्रकार पूजागृह को स्नानगृह के समान नहीं समझना चाहिये जिसमें हम अशुद्ध प्रवेश करते हैं और फिर स्वच्छ होकर बाहर आते हैं यहाँ श्रीकष्ण अत्यन्त सावधानी से विशेष बल देकर आग्रह करते हैं कि यह आत्मानुसंधान या ईश्वर स्मरण नित्य निरन्तर और अखण्ड होना चाहिये।उपर्युक्त गुणों से सम्पन्न योगी को हे अर्जुन मैं सुलभ हूँ। भगवान् का यह कथन विशेष महत्व एवं अभिप्राय रखता है क्योंकि इन गुणों के अभाव में ध्यान में सफलता की आशा नहीं की जा सकती।आत्मप्राप्ति के लिए प्रयत्न क्यों किया जाय इस पर कहते हैं --
Swami RamsukhdasHindi Commentary+
व्याख्या--[सातवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें जो सगुण-साकार परमात्माका वर्णन हुआ था, उसीको यहाँ चौदहवें, पंद्रहवें और सोलहवें श्लोकमें विस्तारसे कहा गया है।] 'अनन्यचेताः'--जिसका चित्त भगवान्को छोड़कर किसी भी भोगभूमिमें, किसी भी ऐश्वर्यमें किञ्चिन्मात्र भी नहीं जाता; जिसके अन्तःकरणमें भगवान्के सिवाय अन्य किसीका कोई आश्रय नहीं है, महत्त्व नहीं है वह पुरुष अनन्य चित्तवाला है। जैसे, पतिव्रता स्त्रीका पतिका ही व्रत, नियम रहता है। पतिके सिवाय उसके मनमें अन्य किसी भी पुरुषका रागपूर्वक चिन्तन कभी होता ही नहीं। शिष्य गुरुके और सुपुत्र माँ-बापके परायण रहता है, उनका दूसरा कोई इष्ट नहीं होता। इसी तरहसे भक्त भगवान्के ही परायण रहता है। यहाँ 'अनन्यचेताः' पद सगुण-उपासना करनेवालेका वाचक है। सगुण-उपासनामें विष्णु, राम, कृष्ण, शिव, शक्ति, गणेश, सूर्य आदि जो भगवान्के स्वरूप हैं, उनमेंसे जो जिस स्वरूपकी उपासना करता है, उसी स्वरूपका चिन्तन हो। परन्तु दूसरे स्वरूपोंको अपने इष्टसे अलग न माने और अपने-आपको भी अपने इष्टके सिवाय और किसीका न माने, तो उसका अन्यकी तरफ मन नहीं जाता। तात्पर्य यह हुआ कि 'मैं केवल भगवान्का हूँ और भगवान् ही मेरे हैं; मेरा और कोई नहीं है तथा मैं और किसीका नहीं हूँ' ऐसा भाव होनेसे वह 'अनन्यचेताः' हो जाता है। 'सततं यो मां स्मरति नित्यशः'--'सततम्' का अर्थ होता है-- निरन्तर अर्थात् जबसे नींद खुले, तबसे लेकर गाढ़ नींद आनेतक जो मेरा स्मरण करता है; और 'नित्यशः' का अर्थ होता है--सदा अर्थात् इस बातको जिस दिनसे पकड़ा, उस दिनसे लेकर मृत्युतक जो मेरा स्मरण करता है।'तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः'--ऐसे नित्ययुक्त योगीके लिये मैं सुलभ हूँ। यहाँ 'नित्ययुक्त' पद चित्तके द्वारा निरन्तर चिन्तन करनेवालेका वाचक नहीं है, प्रत्युत श्रद्धा-प्रेमपूर्वक निष्कामभावसे खुद भगवान्में लगनेवालेका वाचक है। जैसे कोई ब्राह्मण अपने ब्राह्मणपनेमें स्थित रहता है कि 'मैं ब्राह्मण हूँ; क्षत्रिय, वैश्य आदि नहीं हूँ।' वह अपने ब्राह्मणपनेको याद करे, या न करे पर उसके ब्राह्मणपनेमें कोई फरक नहीं पड़ता। ऐसे ही 'मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं'-- इस नित्य-सम्बन्धमें दृढ़ रहनेवाला ही नित्ययुक्त है। ऐसे नित्ययुक्त योगीको भगवान् सुगमतासे मिल जाते हैं। भगवान्के सिवाय शरीर, इन्द्रियाँ, प्राण, मन, बुद्धि अपने नहीं हैं, केवल भगवान् ही अपने हैं--ऐसा दृढ़तासे माननेपर भगवान् सुलभ हो जाते हैं। परन्तु शरीर आदिको अपना मानते रहनेसे भगवान् सुलभ नहीं होते।भगवान्के साथ अपनी भिन्नता तथा संसारके साथ अपनी एकता कभी हुई नहीं, होगी नहीं और हो सकती भी नहीं। इस रीतिसे मनुष्यकी भगवान्के साथ स्वतःस्वाभाविक अभिन्नता है और संसारके साथ स्वतःस्वाभाविक भिन्नता है। परन्तु भूलके कारण मनुष्य अपनेको भगवान्से और भगवान्को अपनेसे अलग मान लेता है तथा अपनेको शरीरका तथा शरीरको अपना मान लेता है। इस विपरीत धारणाके कारण ही यह मनुष्य जन्म-मरणके चक्रमें फँसा रहता है। जब यह विपरीत धारणा सर्वथा मिट जाती है, तब भगवान् स्वतः सुलभ हो जाते हैं।आठवेंसे तेरहवें श्लोकतक सगुण-निराकार और निर्गुण-निराकारका स्मरण बताया गया। इन दोनों स्मरणोंमें प्राणायामकी मुख्यता रहती है, जिसको सिद्ध करना कठिन है। अन्तकाल-जैसी विकट अवस्थामें भी प्राणायामके बलसे प्राणोंको भ्रुवोंके मध्यमें स्थापित कर सकें अथवा मूर्धा-(दशम द्वार-) में लगा सकें--ऐसा प्राणोंपर अधिकार रहनेकी आवश्यकता है। परन्तु भगवान्के स्मरणमें यह कठिनता नहीं है, क्योंकि यहाँ प्राणोंका खयाल नहीं है। यहाँ तो भगवान्के साथ साधकका स्वयंका अनादिकालसे स्वतःसिद्ध सम्बन्ध है। इस सम्बन्धमें इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण आदिकी भी जरूरत नहीं है। अतः इसमें अन्तकालमें प्राण आदिको लगानेकी जरूरत नहीं है। जैसे किसी वस्तुका बीमा होनेपर वस्तुके बिगड़ने, टूटने-फूटनेकी चिन्ता नहीं रहती, ऐसे ही शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसहित अपने-आपको भगवान्के समर्पित कर देनेपर साधकको अपनी गतिके विषयमें कभी किञ्चिन्मात्र भी चिन्ता नहीं होती। कारण कि यह साधन क्रियाजन्य अथवा अभ्यासजन्य नहीं है। इसमें तो वास्तविक सम्बन्धकी जागृति है। अतः इसमें कठिनताका नामोनिशान नहीं है। इसीसे भगवान्ने अपने-आपको सुलभ बताया है। सम्बन्ध--अब दो श्लोकोंमें भगवान् अपनी प्राप्तिका माहात्म्य बताते हैं।
Sri Abhinav GuptaSanskrit Commentary+
।।8.12 -- 8.14।।सर्वद्वाराणीत्यादि योगिन इत्यन्तम्। द्वाराणि इन्द्रियाणि। हृदि इति -- अनेन विषयसंगाभाव उच्यते न तु विष्ठास्थानाधिष्ठानम्। आत्मनः प्राणम् आत्मसारथिम् इच्छाशक्त्यात्मनि मूर्ध्नि सकलतत्त्वातीते धारयन् इति कायनियमः। ओमिति जपन् इति वाङ्नियमः। मामनुस्मरन्निति चेतसोऽनन्यगामिता (S चेतसाऽनन्यगामिता)। यः प्रयादि -- दिनाद्दिनम् (N दिनंदिनं) अपुनरावृत्तये गच्छति। तथा च देहं त्यजन् कथं मे (SN omit मे) पुनरिदं सकलापत्स्थानं शरीरं मा भूयात् इत्येवं यो मामनन्यचेताः स्मरति सततमेव याति जानाति (S omits जानाति) स मद्भावम् मत्स्वरूपम्। न (N नन्वत्र) मुनेः परब्रह्माद्वैतपदोपक्षेपविरोधी उत्क्रान्तौ ( तत् क्रान्तौ K (n) विरोधीति उत्क्रान्तौ भरः) भरः। तथाचोक्तम् -- व्यापिन्यां शिवसत्तायाम् उत्क्रान्तिर्नाम निष्फला।अव्यापिनि शिवे नाम नोत्क्रान्तिः शिवदायिनी।।इति।।यदि वा सतताभ्यासोऽपि यैर्न कृतः तथापि कुतश्चित् स्वतन्त्रेश्वरेच्छादेर्निमित्तादन्त्ये (S omits स्वतन्त्र -- ) एव क्षणे यदा तादृग्भावो जायते तदा अयमुत्क्रान्तिलक्षण उपायः संस्कारान्तरप्रतिबन्धक उक्तः। अत एव,यदक्षरं वेदविदो वदन्ति इत्यादिना अभिधास्ये इत्यन्तेन प्रतिज्ञा कृता क्षणमात्रस्यापि भगवदनुचिन्तनस्य,(S चिन्तनमयस्य) सकलसंस्कारविध्वंसनलक्षणाम् अद्भुतवृत्तिं प्रतिपादयितुम्। यदाहुराचार्यवर्याः,(S omits यदाहु -- इति) -- निमेषमपि यद्येकं क्षीणदोषे करिष्यसि।पदं चित्ते तदा शंभो किं न संपादयिष्यसि।।(स्तवचिन्तामणिः श्लो 114) इति।अत एव प्रयाणकाले स्मरणेन विना खण्डना [ दृष्टा ] इति येषां शङ्का तान् वीतशङ्कान् कर्तुमुक्तम्,अनन्यचेताः सततम् इति अन्यत्र फलादौ साध्ये यस्य न चेत इत्यर्थः। तस्याहं सुलभ इति। तस्य,(S omit तस्य) न किंचित् प्रयाणकालौचित्यपर्येषाम् तीर्थसेवा उत्तरायणम् आयतनसंश्रयः(N आवर्तनसंश्रयः) सत्त्वविशुद्धिः (SK -- विवृद्धिः) सचिन्तकत्वम् (N सचित्तकत्वम्) विषुवदादिपुण्यकालः दिनम् अकृत्रिमपवित्रभूपरिग्रहः स्नेहमलविहीनदेहता शुद्धवस्त्रादिपरिग्रहः (SN omit परि -- ) इत्यादिक्लेशोभ्यर्थनीय इत्यर्थः यत्प्रागुक्तम् -- तीर्थ श्वपचगृहे वा इत्यादि।
Sri AnandgiriSanskrit Commentary+
ननु वायुनिरोधविधुराणामुदीरितया रीत्या स्वेच्छाप्रयुक्तोत्क्रमणासंभवाद्दुर्लभा परमा गतिरापतेदिति तत्राह -- किञ्चेति। इतश्च भगवदनुस्मरणे प्रयतितव्यमित्यर्थः। सततं नित्यश इति विशेषणयोरपुनरुक्तत्वमाह -- सततमित्यादिना। उक्तमेवापौनरुक्त्यं व्यक्तीकरोति -- नेत्यादिना। जितासुरिच्छया देहं त्यजति तदितरस्तु कर्मक्षयेणैवेति विशेषं विवक्षयन्नाह -- यत इति। अनन्यचेतसं समाहितचेतसं प्रतीश्वरस्य सौलभ्यमेवमित्युच्यते।
Sri DhanpatiSanskrit Commentary+
किंचान्तकाले मत्स्मरणं मत्प्राप्तिकरं न सर्वस्य सुलभं किंतु योगी मां वासुदेवमनन्यचेता नान्यस्मिन्विषये चेतो,यस्य सः। अनेनात्यादार उक्तः सततं सर्वदेति नैरन्तर्यमक्तं नित्यश इति दीर्घकालत्वम्। तथाचात्यादरेण यावज्जीवं नतु षण्मासं वत्सरं वा नैरन्तर्येण यो मां परमेश्वरं स्मरति तस्य योगिनो नित्ययुक्तस्य सदा समाहितचित्तस्याहं सुलभः सुखेनानायासेन लभ्योऽन्तकालेऽनायासलब्धमत्स्मरणेनेति। यत एवमतोऽनन्येचेताः सन्मयि समाहितो भवेदित्याशयः। पार्थेति संबोधयन् तव तूकतासाधनसौलभ्येन मत्प्राप्तिः सलभेति सूचयति।
Sri JayatrithaSanskrit Commentary+
नित्ययुक्तस्य योगिन इत्येतयोरेकार्थतानिरासार्थमाह -- नित्येति। नित्योपायवत्त्वेन सम्पूर्णयोगस्येत्यर्थः।
Sri MadhavacharyaSanskrit Commentary+
नित्ययुक्तस्य नित्योपायवतः। योगिनः परिपूर्णयोगस्य।
Sri Madhusudan SaraswatiSanskrit Commentary+
य एवं वायुनिरोधवैधुर्येण भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य मूर्धन्यया नाड्या देहं त्यक्तुं स्वेच्छया न शक्नोति किंतु कर्मक्षयेणैव परवशो देहं त्यजति तस्य किं स्यादिति तदाह -- न विद्यते मदन्यविषये चेतो यस्य सोऽनन्यचेताः सततं निरन्तरं नित्यशो,यावज्जीवं यो मां स्मरति तस्य स्ववशतया परवशतया वा देहं त्यजतोऽपि नित्ययुक्तस्य सततसमाहितचित्तस्य योगिनः सुलभः सुखेन लभ्योऽहं परमेश्वरः इतरेषामतिदुर्लभोऽपि हे पार्थ तवाहमतिसुलभो मा भैषीरित्यभिप्रायः। अत्र तस्येति षष्ठी शेषे संबन्धसामान्ये कर्तरिन लोका -- इत्यादिना निषेधात्। अत्र चानन्यचेतस्त्वेन सत्कारोऽत्यादरः सततमिति नैरन्तर्यं नित्यश इति दीर्घकालत्वं स्मरणस्योक्तम्। तेनस तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः इति पातञ्जलं मतमनुसृतं भवति। तत्र स इत्यभ्यास उक्तोऽपि स्मरणपर्यवसायी। तेन यावज्जीवं प्रतिक्षणं विक्षेपान्तरशून्यतया भगवदनुचिन्तनमेव परमगतिहेतुर्मूर्धन्यया नाड्या तु स्वेच्छया प्राणोत्क्रमणं भवतु न वेति नातीवाग्रहः।
Sri NeelkanthSanskrit Commentary+
इयं मतिरतीव दुर्लभेति मामंस्था इत्याह -- अनन्येति। नास्ति अन्यत्र चेतो यस्यासौ अनन्यचेता इत्यनेन स्मरणे आदर उच्यते। सततमिति नैरन्तर्यम्। यो मां स्मरति नित्यश इति दीर्घकालत्वम्। यावज्जीवं स्मरतीत्यर्थः। तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य नित्ये योगिनामावश्यके युक्ताहारविहारादौ यमनियमादौ च युक्तस्यावहितस्य योगिनः। योगमनुतिष्ठतः।
Sri PurushottamjiSanskrit Commentary+
एवं योगयुक्तानां स्वांशाक्षरात्मकगतिस्वरूपमुक्त्वा भक्तियुक्तस्य स्वप्राप्तिमाह -- अनन्य इति। सततं निरन्तरमव्यवच्छिन्नतया न अन्यस्िमँल्लौकिकालौकिकविषये चेतो यस्य तादृशो यो मां नित्यशः प्रत्यहं,स्मरति तस्य नित्ययुक्तस्य मम नित्यं सम्मतस्य योगिनः सकाशादहं सुलभः सुखेन लभ्यः प्राप्यः। पार्थेति सम्बोधनेन यथा त्वन्मातृस्मरणबलेन तव सुलभो जातस्तथेति व्यञ्जितम्।
Sri RamanujaSanskrit Commentary+
नित्यशो माम् उद्योगप्रभृति सततं सर्वकालम् अनन्यचेताः यः स्मरति अत्यर्थं मत्प्रियत्वेन मत्स्मृत्या विना आत्मधारणम् अलभमानो निरतिशयप्रियां स्मृतिं यः करोति तस्य नित्ययुक्तस्य नित्ययोगं काङ्क्षमाणस्य योगिनः अहं सुलभः अहम् एव प्राप्यः न मद्भाव ऐश्वर्यादिकः।सुप्रापश्च तद्वियोगम् असहमानः अहम् एव तं वृणे मत्प्राप्त्यनुगुणोपासनविपाकं तद्विरोधिनिरसनम् अत्यर्थं मत्प्रियत्वादिकं च अहम् एव ददामि इत्यर्थः।यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः (मु0 3।2।3) इति हि श्रूयते वक्ष्यते च।तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते।।तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः। नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता।। (गीता 10।1011) इति।अतः परम् अध्यायशेषेण ज्ञानिनः कैवल्यार्थिनश्च अपुनरावृत्तिम् ऐश्वर्यार्थिनः पुनरावृत्तिं च आह --
Sri ShankaracharyaSanskrit Commentary+
--,अनन्यचेताः न अन्यविषये चेतः यस्य सोऽयम् अनन्यचेताः योगी सततं सर्वदा यः मां परमेश्वरं स्मरति नित्यशः। सततम् इति नैरन्तर्यम् उच्यते नित्यशः इति दीर्घकालत्वम् उच्यते। न षण्मासं संवत्सरं वा किं तर्हि यावज्जीवं नैरन्तर्येण यः मां स्मरतीत्यर्थः। तस्य योगिनः अहं सुलभः सुखेन लभ्यः हे पार्थ नित्ययुक्तस्य सदा समाहितचित्तस्य योगिनः। यतः एवम् अतः अनन्यचेताः सन् मयि सदा समाहितः भवेत्।।तव सौलभ्येन किं स्यात् इत्युच्यते श्रृणु तत् मम सौलभ्येन यत् भवति --,
Sri Sridhara SwamiSanskrit Commentary+
एवं चान्तकाले धारणया मत्प्राप्तिर्नित्याभ्यासवशत एव भवति नान्यस्येति पूर्वोक्तमेवानुस्मारयति -- अनन्येति। नास्त्यन्यस्मिंश्चेतो यस्य तथाभूतः सन् यो मां सततं निरन्तरं नित्यशः प्रतिदिनं स्मरति तस्य नित्ययुक्तस्य समाहितस्याहं सुखेन लभ्योऽस्मि नान्यस्य।
Sri VallabhacharyaSanskrit Commentary+
एवं परमात्मचिन्तकानां त्रिधा प्राप्तिमुक्त्वा स्वचिन्तकस्य भक्तस्य स्वप्राप्तिमाह -- अनन्येति। नान्यस्मिन्पुत्रदारादिके (किन्तु अक्षरादिके स्वरूपे) चेतो यस्य तथा मां भगवन्तं लीलापुरुषोत्तमं नित्यशः स्मरति सततं तस्य नित्ययुक्तस्य मदनुरक्तस्य योगिनो मत्सम्बन्धतो वाऽहं निरुपममहिमा वासुदेवः पुरुषोत्तमो भगवान्सुलभो़ऽस्मि।
Vedantadeshikacharya VenkatanathaSanskrit Commentary+
सङ्गत्यर्थमनुवदति -- एवमिति। अध्यायारम्भगतप्रश्नोत्तरयोस्तत्प्रसञ्जके पूर्वाध्यायान्ते चायं क्रमो न विवक्षितः अधियज्ञान्तिमप्रत्यययोः साधारण्येन प्रतिपादने तात्पर्यात्। इह तु प्रतिनियतार्थोपदेशरूपत्वादुत्तरोत्तरं उत्कृष्टताप्रदर्शनायैश्वर्याक्षरयाथात्म्यं भगवच्चरणार्थिनः क्रमेणोक्तमिति भावः। अत्र चएवम् इति निर्देशात्स्वप्राष्यानुगुणं इति निर्देशाच्च प्रकरणस्याधिकारित्रयविषयत्वव्यवस्थापकहेतवः प्रदर्शिताः। तथाहि -- एवमत्र कश्चिच्छङ्क्येत -- ननुते ब्रह्म तद्विदुः [7।29]किं तद्ब्रह्म [8।1]अक्षरं ब्रह्म परमम् [8।3] इति ब्रह्मशब्दस्य साक्षाद्ब्रह्मविषयत्वे को बाधः तस्यैव च सर्वात्मत्वादध्यात्मशब्देनापि तद्गतं सर्वं ग्रहीतुमुचितम्भूतभावोद्भवकरो विसर्गः [8।3] इत्यपि जगत्सृष्टिग्रहणं युक्तं देवतोद्देशेन द्रव्यत्यागो वा स चात्र निवृत्तिलक्षणो यज्ञःअधिभूतं क्षरो भावः [8।4] इति च अधिभवतीति व्युत्पत्तेः प्राणिजातम्। पुरुषश्च अधिदैवतमिति परब्रह्मावस्थाविशेषः समष्टिपुरुषादिर्वा अधियज्ञः सर्वयज्ञाभिमानिनी विष्ण्वाख्या देवतायज्ञो वै विष्णुः [श.ब्रा.1।3।1] इति श्रुतेःअन्तकाले च [8।5] इत्यादि श्लोकत्रयमपि मुमुक्षोरेवान्तिमप्रत्ययमधिकृत्योक्तम् प्रश्नप्रतिवचनश्लोकानां पूर्वाध्याये प्रस्तुताधिकारित्रयज्ञातव्योपादेयपरत्वेऽप्युपरितनाःश्लोकाः प्रधानतया सुदुर्लभत्वेन निर्दिष्टज्ञानिपरा युक्ताः अन्यथामामेव स्मरन् [8।5]मामेवैष्यसि [8।7] इत्यादेर्बाधात् अत एवप्रयाणकाले च कथम् [8।2]अन्तकाले च माम् [8।5] इति श्लोकयोरधिकारित्रयपरत्वेऽपि तद्विवरणेऽत्र तदैकार्थ्यं ग्राह्यमित्यपि निरस्तम्। तत्रापि चाधिकारित्रयपरत्वं न प्रतीयते नचैश्वर्यार्थिनः परमपुरुषविषयान्तिमप्रत्ययसापेक्षतायां प्रमाणं पश्यामः एवमुत्तरेष्वपि श्लोकेष्वेक एवाधिकारी तद्वेद्यं चैकमेव पुनः पुनरनूद्य विशेषतो विशदीक्रियते नच पुनरुक्तिदोषः अभ्यासस्य ज्ञानिप्राधान्यलिङ्गत्वात्संसिद्धिं परमां गताः [8।15]स याति परमां गतिं [8।13]तमाहुः परमां गतिम् [8।21] इत्यमीषामैकार्थ्यं च प्रतीतं त्वपरित्याज्यम् न च परमगन्तव्यातिरिक्ता परमसंसिद्धिः।तमाहुः परमां गतिम् [8।21] इति परोक्षनिर्देशश्चपुरुषः स परः पार्थ [8।22] इतिवत्स्यात्परमं पुरुषं दिव्यं [8।8]स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यं [8।10]पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया [8।22] इत्यमीषां भिन्नार्थत्वकल्पनं चायुक्तम् परैरपि च सर्वैः प्रायश एवमैककण्ठ्येन व्याख्यातम् -- इति। अत्रैवं परिहारक्रमः -- अधियज्ञोऽहमेव इतिवत्अहमेव ब्रह्म इत्यनुक्तेरध्यात्मादिवदत्र ब्रह्मशब्दार्थस्याप्यर्थान्तरत्वं तावत्प्रतीतम् नच ब्रह्मशब्दादक्षरशब्दस्य परमात्मनि रूढ्यतिशयः येन ततस्तद्व्याख्यानं स्यात्।एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते। ये चाप्यक्षरमव्यक्तम् [12।1] इत्यादिषु च परमात्मनोऽन्यदेवोपास्यत्वमक्षरशब्देन प्रतीयतेद्वे रूपे ब्रह्मणस्तस्य मूर्तं चामूर्तमेव च। क्षराक्षरस्वरूपे ते सर्वभूतेषु च स्थिते।।अक्षरं तत्परं ब्रह्म क्षरं सर्वमिदं जगत् [वि.पु.1।22।5556] इत्यादिषु चाक्षरपरब्रह्मशब्दौ परिशुद्धात्मविषयौ शारीरकभाष्ये समर्थितौ अतोऽत्रकिं तद्ब्रह्म [8।1] इत्युक्तेऽहमेव ब्रह्मेत्यव्याख्यानात्स्वेतरविषयब्रह्मशब्दः परमशब्दविशेषिताक्षरशब्दानुगुण्याच्च प्रकृतेरीश्वराच्चान्यस्मिन्परिशुद्धात्मन्युपचाराद्वर्तते पश्चाच्चायमेवअव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तः [8।21] इति वक्ष्यते न चासौ श्लोकः परमात्मपर इति शङ्कनीयम्ये चाप्यक्षरमव्यक्तं [12।1]ये त्वक्षरमनिर्देश्यं [12।3]क्षरश्चाक्षर एव च [15।16] इत्यादिष्विवात्रापि अक्षरशब्दस्य भगवद्व्यतिरिक्तविषयत्वप्रतीतेः संसिद्धिशब्दश्च परमगतिशब्दनिर्दिष्टप्राप्यविलक्षणां समीचीनां सिद्धिं स्वरसत उपसर्गशक्त्या व्यनक्ति अतएव स्वभावादिशब्दा अधिकारित्रयज्ञातव्योपादेयवस्तुविशेषपरा उक्ताः। एवं स्ववाक्य पर्यालोचनया पूर्वाध्यायप्रकृतपरामर्शेन च प्रश्नप्रतिवचनवाक्यानामधिकारित्रयविषयत्वे सिद्धे तदनन्तराणामपि ग्रन्थानां यथासम्भवं सर्वविषयत्वं युक्तम्। प्रक्रान्ते चाधिकारित्रये यद्वृत्तत्रयेणानूद्यमाने कैवल्यभगवत्प्राप्तिकामयोरनन्तरं स्पष्टमभिधानात्अभ्यास[8।8] इत्यादिकं परिशेषादैश्वर्यार्थिविषयम् यच्चैश्वर्यार्थिनां परमपुरुषविषयान्तिमप्रत्ययसापेक्षतायां प्रमाणं नास्तीति तदपि न श्रीमद्भागवते पुराणे ध्रुवचरिते तद्दृष्टेः -- भक्तिं हरौ भगवति प्रवहन् इत्यादिना। अतो यथोक्त एवार्थः। यद्यपि ब्रह्मपुरुषपरगत्यादिशब्दैरिह सर्वत्र परमात्मभजनतत्प्राप्त्यादिरेव प्रतीयते तथापि तावतैवाधिकारिविषयत्वं वक्तुं न युज्यते पूर्वत्र प्रयाणकाले भ्रूमध्ये प्राणावेशस्य तत्रैव परमात्मध्यानस्य च विहितत्वात् अनन्तरं च हृदि ध्यानस्य मूर्ध्नि प्राणावेशस्य च तत्काल एव विधानात् तदिदं द्वयं परस्परविरुद्धं किं कालभेदाद्व्यवस्थाप्येताधिकारिभेदाद्वा तत्र न तावत्कालभेदः श्रुतः प्रत्युत कालैक्यमेव श्रूयते अतः परिशेषात्सिद्धोऽधिकारिभेदः। किञ्च शतं चैका च [छां.उ.8।6।6] इत्यादिभिर्मूर्धन्यनाड्या निष्क्रमणं मोक्षहेतुः अन्याभिर्निष्क्रमणं फलान्तरहेतुरित्यवगते प्रयाणकाले भ्रूमध्ये मूर्ध्नि च प्राणावेशस्योत्क्रमणशेषतया तत्तद्देशगतनाड्योत्क्रमणे प्रतीते सिद्धस्तदधिकारिभेदः। पूर्वत्र चाध्यायेचतुर्विधा भजन्ते माम् [7।16] इत्यादावयमधिकारिभेदः प्रस्तुतः तदन्ते चजरामरणमोक्षाय [7।29]साधिभूताधिदैवं माम् [7।30] इति श्लोकयोर्यच्छब्दावृत्त्याधिकारिभेदप्रतीतिर्भाष्ये प्रतिपादिता सा चात्रापि स्फुटाअणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः [8।9]यः प्रयाति त्यजन् देहं [8।13]यो मां स्मरति नित्यशः इति। एतदखिलमभिप्रेत्योक्तंएवमैश्वर्यार्थिन इत्यादि।उक्तश्चास्याधिकारीअनन्यचेताः इत्युच्यत इति परोक्तं निराकुर्वन्अनन्यचेताः इति श्लोकस्यार्थमाह -- अथेति।नित्यशः इत्यनेनात्मानुभवादिफलान्तरव्यवधाननैरपेक्ष्यं विवक्षितमित्याह -- उद्योगप्रभृतीति। अन्यथासततम् इत्यनेन पुनरुक्तिः सङ्कोचक्लेशो वा स्यादित्यभिप्रायेणाह -- सततं सर्वकालमिति। अनन्यचेतश्शब्देनाभिप्रेतं स्मृतेर्भक्तिरूपापन्नत्वं दर्शयति -- अत्यर्थेति। अनन्यचेतस्त्वादेव च स्मरणस्याच्छिद्रत्वम्। उत्कण्ठनेऽपि च स्मरतिः प्रयुज्यते -- भ्रातरौ स्मरतां वीरौ [वा.रा.2।13] इत्यादिषु।नित्ययुक्तस्य योगिनः इत्युक्तानुवादः फलस्याव्यवहितत्वद्योतनाय। अत्र अहंशब्देनेश्वरस्य प्रत्यगर्थोऽभिप्रेतः। तेन तद्विशेषणभूताक्षरादिफलप्राप्तिव्यवच्छेदो विवक्षित इत्यभिप्रायेणाह -- अहमेवेति। तदेव विवृणोति -- न मद्भाव इति। भगवत्प्राप्तेः फलान्तरेभ्योऽतिशयितफलत्वात्तत्प्राप्तौ प्रयासातिरेकसम्भावनाव्यवच्छेदाय सुलभपदमित्यभिप्रायेणाह -- सुप्रापश्चेति। अकृच्छ्रेण प्राप्य इत्यर्थः।ईषद्दुस्सुषु कृच्छ्राकृच्छ्रार्थेषु खल् [अष्टा.3।3।126] इत्यनुशिष्यते। आश्रितवत्सलस्येश्वरस्य सौलभ्यं रागप्राप्तमित्याह -- तद्वियोगमिति। उक्तस्यातिवादमात्रत्वशङ्काव्युदासाय श्रुतिमूलतामाह -- यमेवेति। अत्र वरणशब्देन किमुच्यते न तावच्छेषत्वशरीरत्वाद्याकारेण स्वीकारः तस्य नित्यसिद्धत्वात् न च तद्विपरीतः विरुद्धत्वादेव नच प्राप्तिप्रदानंतेन लभ्यः इत्यनेन पौनरुक्त्यप्रसङ्गात् नचान्योऽत्र प्रकारः असम्भवादित्यत्राह -- मत्प्राप्त्यनुगुणेति। विपाकोऽत्र ध्रुवानुस्मृतिरूपत्वदर्शनसमानाधिकारत्वादिरूपः। तद्विरोधिनो दुष्कृतरजस्तमोरागद्वेषमोहादयः।अत्यर्थमत्प्रियत्वं निरतिशयभक्तित्वम्। आदिशब्देन परमपदपर्यन्तासत्तिपर्यन्तं यन्मध्येऽपेक्षितं तत्सर्वं विवक्षितम्।अहमेवेति परमकारुणिकस्य ममैवायं भर इत्यभिप्रायः।तस्याहं सुलभः इत्यादेरुक्तार्थपरत्वस्थिरीकरणायास्यैवार्थस्य वक्ष्यमाणं विस्तरगुदाहृतश्रुत्युपबृंहणरूपं दर्शयति -- वक्ष्यते चेति।,