श्लोक · Shlok 9
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु | साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते॥
suhṛnmitrāryudāsīnamadhyasthadveṣyabandhuṣu. sādhuṣvapi ca pāpeṣu samabuddhirviśiṣyate.
Translation · अर्थ
English
He who is of the same mind to the good-hearted, friends, enemies, the indifferent, the neutral, the hateful, the relatives, the righteous and the unrighteous, excels.
Sūtradhāra Vichār
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A.C. Bhaktivedanta Swami PrabhupadaEnglish Commentary+
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Swami SivanandaEnglish Commentary+
सुह्यन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु in the goodhearted? in friends? in enemies? in the indifferent? in neutrals? in haters and in relatives? साधुषु in the righteous? अपि also? च and? पापेषु in the unrighteous?,समबुद्धिः one who has eal mind? विशिष्यते excels.Commentary He excels He is the best among the Yogarudhas.Samabudhhi is eanimity or evenness of mind. A Yogi of Samabuddhi has eal vision. He is ite impartial. He is the same to all. He makes no difference with reference to caste? creed or colour. He loves all as his own self? as rooted in the Self.A goodhearted man does good to others without expecting any servie from them in return.Udasina is one who is ite indifferent.A neutral is one who does not join any of the two contending parties. He stands as a silent spectator or witness.The righteous are those who do righteous actions and follow the injunctions of the scriptures.The unrighteous are those who do wrong and forbidden actions? who inure others and who do not follow the scriptures.
Swami ChinmayanandaHindi Commentary+
पूर्व श्लोक में ज्ञानी पुरुष की जड़ वस्तुओं की ओर अवलोकन करने की दृष्टि का वर्णन किया गया है। परन्तु जगत् केवल जड़ वस्तुओं से ही नहीं बना है। उसमें चेतन प्राणी भी हैं। मानव मात्र के साथ ज्ञानी पुरुष किस भाव से रहेगा क्या उन्हें मिथ्या कहकर उनके अस्तित्व का निषेध कर देगा क्या जगत् के अधिष्ठान स्वरूप परमात्मा में स्थित होकर वह लोगों की सेवा के प्रति उदासीन रहेगा इन प्रश्नों का उत्तर इस श्लोक में दिया गया है।भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसा ज्ञानी पुरुष सभी मनुष्यों के साथ समान प्रेम भाव से रहता है चाहे वे सुहृद् हों या मित्र शत्रु उदासीन मध्यस्थ बन्धु साधु हों या पापी। अपनी विशाल सहृदयता में वह सबका आलिंगन करता है। प्रेम और आदरभाव से सबके साथ रहता है। उसकी दृष्टि में वे सभी समान महत्त्वपूर्ण हैं।उसका प्रेम साधु और पापी उत्कृष्ट और निकृष्ट में भेद नहीं करता। वह जानता है कि आत्मस्वरूप के अज्ञान से ही पुरुष पापकर्म में प्रवृत्त होता है और अपने ही कर्मों से दुख उठाता है। स्वामी रामतीर्थ इसे बड़ी सुन्दरता से व्यक्त करते हुये कहते हैं कि हम अपने पापों से दण्डित होते हैं न कि पापों के लिए।आत्मस्वरूप के अपरोक्ष अनुभव से वह यह पहचान लेता है कि एक ही आत्मा सर्वत्र व्याप्त है। अनेकता में एकता को वह जानता है औऱ विश्व के सामञ्जस्य को पहचानता है। सर्वत्र व्याप्त आत्मस्वरूप का अनुभव कर लेने पर वह किसके साथ प्रेम करेगा और किससे घृणा मनुष्य के शरीर के किसी भी अंग में पीड़ा होने पर सबकी ओर देखने का उसका भाव एक ही होता है क्योंकि सम्पूर्ण शरीर में ही वह स्वयं व्याप्त है।इस उत्तम फल को प्राप्त करने के लिए मनुष्य को क्या करना चाहिये उत्तर है
Swami RamsukhdasHindi Commentary+
व्याख्या--[आठवें श्लोकमें पदार्थोंमें समता बतायी, अब इस श्लोकमें व्यक्तियोंमें समता बताते हैं। व्यक्तियोंमें समता बतानेका तात्पर्य है कि वस्तु तो अपनी तरफसे कोई क्रिया नहीं करती; अतः उसमें समबुद्धि होना सुगम है, परन्तु व्यक्ति तो अपने लिये और दूसरोंके लिये भी क्रिया करता है; अतः उसमें समबुद्धि होना कठिन है। इसलिये व्यक्तियोंके आचरणोंको देखकर भी जिसकी बुद्धिमें, विचारमें कोई विषमता या पक्षपात नहीं होता, ऐसा समबुद्धिवाला पुरुष श्रेष्ठ है।]'सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु'--जो माताकी तरह ही, पर ममता-रहित होकर बिना किसी कारणके सबका हित चाहनेके और हित करनेके स्वभाववाला होता है, उसको 'सुहृद्' कहते हैं और जो उपकारके बदले उपकार करनेवाला होता है, उसको मित्र कहते हैं।जैसे सुहृद्का बिना कारण दूसरोंका हित करनेका स्वभाव होता है, ऐसे ही जिसका बिना कारण दूसरोंका अहित करनेका स्वभाव होता है उसको 'अरि' कहते हैं। जो अपने स्वार्थसे अथवा अन्य किसी कारणविशेषको लेकर दूसरोंका अहित, अपकार करता है, वह 'द्वेष्य' होता है।दो आपसमें वाद-विवाद कर रहे हैं, उनको देखकर भी जो तटस्थ रहता है, किसीका किञ्चिन्मात्र भी पक्षपात नहीं करता और अपनी तरफसे कुछ कहता भी नहीं, वह 'उदासीन' कहलाता है। परन्तु उन दोनोंकी लड़ाई मिट जाय और दोनोंका हित हो जाय--ऐसी चेष्टा करनेवाला 'मध्यस्थ' कहलाता है।एक तो बन्धु अर्थात् सम्बन्धी है और दूसरा बन्धु नहीं है, पर दोनोंके साथ बर्ताव करनेमें उसके मनमें कोई विषमभाव नहीं होता। जैसे, उसके पुत्रने अथवा अन्य किसीके पुत्रने कोई बुरा काम किया है, तो वह उनके अपराधके अनुरूप दोनोंको ही समान दण्ड देता है, ऐसे ही उसके पुत्रने अथवा दूसरेके पुत्रने कोई अच्छा काम किया है, तो उनको पुरस्कार देनेमें भी उसका कोई पक्षपात नहीं होता।'साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते'--श्रेष्ठ आचरण करनेवालों और पाप-आचरण करनेवालोंके साथ व्यवहार करनेमें तो अन्तर होता है और अन्तर होना ही चाहिये, पर उन दोनोंकी हितैषितामें अर्थात् उनका हित करनेमें, दुःखके समय उनकी सहायता करनेमें उसके अन्तःकरणमें कोई विषमभाव, पक्षपात नहीं होता। 'सबमें एक परमात्मा हैं, ऐसा स्वयंमें होता है, बुद्धिमें सबकी हितैषिता होती है, मनमें सबका हितचिन्तन होता है, और व्यवहारमें परता-ममता छोड़कर सबके सुखका सम्पादन होता है।जहाँ विषमबुद्धि अधिक रहनेकी सम्भावना है, वहाँ भी समबुद्धि होना विशेष है। वहाँ समबुद्धि हो जाय, तो फिर सब जगह समबुद्धि हो जाती है।इस श्लोकमें भाव, गुण, आचरण आदिकी भिन्नताको लेकर नौ प्रकारके प्राणियोंका नाम आया है। इन प्राणियोंके भाव, गुण, आचरण आदिकी भिन्नताको लेकर उनके साथ बर्ताव करनेमें विषमता आ जाय, तो वह दोषी नहीं है। कारण कि वह बर्ताव तो उनके भाव, आचरण, परिस्थिति आदिके अनुसार ही है और उनके लिये ही है, अपने लिये नहीं। परन्तु उन सबमें परमात्मा ही परिपूर्ण हैं--इस भावमें कोई फरक नहीं आना चाहिये और अपनी तरफसे सबकी सेवा बन जाय--इस भावमें भी कोई अन्तर नहीं आना चाहिये। तात्पर्य यह हुआ कि जिस किसी मार्गसे जिसको तत्त्वबोध हो जाता है, उसकी सब जगह समबुद्धि हो जाती है अर्थात् किसी भी जगह पक्षपात न होकर समान रीतिसे सेवा और हितका भाव हो जाता है। जैसे भगवान् सम्पूर्ण प्राणियोंके सुहृद् हैं--'सुहृदं सर्वभूतानाम्' (गीता 5। 29), ऐसे ही वह सिद्ध कर्मयोगी भी सम्पूर्ण प्राणियोंका सुहृद् हो जाता है--'सुहृदः सर्वदेहिनाम्' (श्रीमद्भा0 3। 25। 21)। यहाँ सुहृद्, मित्र आदि नाम लेनेके बाद अन्तमें 'साधुष्वपि च पापेषु' कहनेका तात्पर्य है कि जिसकी श्रेष्ठ आचरणवालों और निकृष्ट आचरणवालोंमें समबुद्धि हो जायगी, उसकी सब जगह समबुद्धि हो जायगी। कारण कि संसारमें आचरणोंकी ही मुख्यता है, आचरणोंका ही असर पड़ता है, आचरणोंसे ही मनुष्यकी परीक्षा होती है, आचरणोंसे ही श्रद्धा-अश्रद्धा होती है, स्वाभाविक दृष्टि आचरणोंपर ही पड़ती है और आचरणोंसे ही सद्भाव-दुर्भाव पैदा होते हैं। भगवान्ने भी 'यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः' (3। 21) कहकर आचरणकी बात मुख्य बतायी है। इसलिये श्रेष्ठ आचरणवाले और निकृष्ट आचरणवाले--इन दोनोंमें समता हो जायगी, तो फिर सबह जगह समता हो जायगी, इन दोनोंमें भी श्रेष्ठ आचरणवाले पुरुषोंमें तो सद्भाव होना सुगम है, पर पाप-आचरणवाले पुरुषोंमें सद्भाव होना कठिन है। अतः भगवान्ने यहाँ'अपि च' दो अव्ययोंका प्रयोग किया है, जिसका अर्थ है 'और पाप-आचरण करनेवालोंमें भी' जिसकी समबुद्धि है, वह श्रेष्ठ है।यहाँ दीखनेवालोंको लेकर देखनेवालेकी स्थितिका वर्णन किया गया है, अतः'समबुद्धिर्विशिष्यते' कहा है। देखनेवालोंमें जो समबुद्धि होती है, वह हरेकको दीखती नहीं, पर साधकके लिये तो वही मुख्य है; क्योंकि साधक 'मैं अपनी दृष्टिसे कैसा हूँ', ऐसे अपने-आपको देखता है। इसलिये अपने-आपसे अपना उद्धार करनेके लिये कहा गया है (6। 5)।संसारमें प्रायः दूसरोंके आचरणोंपर ही दृष्टि रहती है। साधकको विचार करना चाहिये कि मेरी दृष्टि अपने भावोंपर रहती है या दूसरेके आचरणोंपर? दूसरोंके आचरणोंपर दृष्टि रहनेसे जिस दृष्टिसे अपना कल्याण होता है, वह दृष्टि बंद हो जाती है और अँधेरा हो जाता है। इसलिये दूसरोंके श्रेष्ठ और निकृष्ठ आचरणोंपर दृष्टि न रहकर उनका जो वास्तविक स्वरूप है, उसपर दृष्टि रहनी चाहिये। स्वरूपपर दृष्टि रहनेसे उनके आचरणोंपर दृष्टि नहीं रहेगी; क्योंकि स्वरूप सदा ज्यों-का-त्यों रहता है, जब कि आचरण बदलते रहते हैं। सत्य-तत्त्वपर रहनेवाली दृष्टि भी सत्य होती है। परन्तु जिसकी दृष्टि केवल आचरणोंपर ही रहती है, उसकी दृष्टि असत्पर रहनेसे असत् ही होती है। इसमें भी अशुद्ध आचरणोंपर जिसकी ज्यादा दृष्टि है, उसका तो पतन ही समझना चाहिये। तात्पर्य है कि जो आचरण आदरणीय नहीं है, ऐसे अशुद्ध आचरणोंको जो मुख्यता देता है, वह तो अपना पतन ही करता है। अतः भगवान्ने यहाँ अशुद्ध आचरण करनेवाले पापीमें भी समबुद्धिवालेको श्रेष्ठ बताया है। कारण कि उसकी दृष्टि सत्य-तत्त्वपर रहनेसे उसकी दृष्टिमें सब कुछ परमात्मतत्त्व ही रहता है। फिर आगे चलकर 'सब कुछ' नहीं रहता, केवल परमात्मतत्त्व ही रहता है। उसीकी यहाँ 'समबुद्धिर्विशिष्यते' पदसे महिमा गायी गयी है।विशेष बातगीताका योग 'समता' ही है--'समत्वं योग उच्यते' (2। 48)। गीताकी दृष्टिसे अगर समता आ गयी तो दूसरे किसी लक्षणकी जरूरत नहीं है अर्थात् जिसको वास्तविक समताकी प्राप्ति हो गयी है, उसमें सभी सद्गुण-सदाचार स्वतः आ जायँगे और उसकी संसारपर विजय हो जायगी (5। 19)। विष्णुपुराणमें प्रह्लादजीने भी कहा है कि समता भगवान्की आराधना (भजन) है--'समत्वमाराधनमच्युतस्य' (1। 17। 90)। इस तरह जिस समताकी असीम, अपार, अनन्त महिमा है, जिसका वर्णन कभी कोई कर ही नहीं सकता, उस समताकी प्राप्तिका उपाय है बुराईरहित होना। बुराईरहित होनेका उपाय है--(1) किसीको बुरा न मानें, (2) किसीका बुरा न करें, (3) किसीका बुरा न सोचें, (4) किसीमें बुराई न देखें, (5) किसीकी बुराई न सुनें, (6) किसीकी बुराई न कहें। इन छः बातोंका दृढ़तासे पालन करें, तो हम बुराईरहित हो जायँगे। बुराईरहित होते ही हमारेमें स्वतःस्वाभाविक अच्छाई आ जायगी; क्योंकि अच्छाई हमारा स्वरूप है।अच्छाईको लानेके लिये हम प्रयत्न करते हैं, साधन करते हैं; परन्तु वर्षोंतक साधन करनेपर भी वास्तविक अच्छाई हमारेमें नहीं आती और साधन करनेपर खुदको भी सन्तोष नहीं होता, प्रत्युत यही विचार होता है कि इतना साधन करनेपर भी सद्गुण-सदाचार नहीं आये। अतः ये सद्गुण-सदाचार आनेके हैं नहीं--ऐसा समझकर हम साधनसे हताश हो जाते हैं। हताश होनेमें मुख्य कारण यही है कि हमने अच्छाईको उद्योगसाध्य माना है और बुराईको सर्वथा नहीं छोड़ा है। बुराईका सर्वथा त्याग किये बिना आंशिक अच्छाई बुराईको बल देती रहती है। कारण कि आंशिक अच्छाईसे अच्छाईका अभिमान होता है और जितनी बुराई है वह सब-की-सब अच्छाईके अभिमानपर ही अवलम्बित है। पूर्ण अच्छाई होनेपर अच्छाईका अभिमान नहीं होता और बुराई भी उत्पन्न नहीं होती। अतः बुराईका त्याग करनेपर अच्छाई बिना उद्योग किये और बिना चाहे स्वतः आ जाती है। जब अच्छाई हमारेमें आ जाती है तब हम अच्छे हो जाते हैं। जब हम अच्छे हो जाते हैं, तब हमारे द्वारा स्वाभाविक ही अच्छाई होने लगती है। जब अच्छाई होने लग जाती है, तब सृष्टिके द्वारा स्वाभाविक ही हमारा जीवन-निर्वाह होने लगता है अर्थात् जीवन-निर्वाहके लिये हमें परिश्रम नहीं करना पड़ता और दूसरोंका आश्रय भी नहीं लेना पड़ता। ऐसी अवस्थामें हम संसारके आश्रयसे सर्वथा मुक्त हो जाते हैं। संसारके आश्रयसे सर्वथा मुक्त होते ही हमें स्वतःसिद्ध समता प्राप्त हो जाती है और हम कृतकृत्य हो जाते हैं, जीवन्मुक्त हो जाते हैं। सम्बन्ध--जो समता (समबुद्धि) कर्मयोगसे प्राप्त होती है, वही समता ध्यानयोगसे भी प्राप्त होती है। इसलिये भगवान् ध्यानयोगका प्रकरण आरम्भ कहते हुए पहले ध्यानयोगके लिये प्रेरणा करते हैं।
Sri Abhinav GuptaSanskrit Commentary+
सुहृदिति। सुहृत् यस्य हृदयम् अकारणमेव शोभनम्। मित्रत्वम् अन्योन्यम्। अरित्वं परस्परम्। उदासीन एतदुभयरहितः (S N K (n) एतद्रूपरहितः) मध्यस्थः केनचिदंशेन मित्रं केनचिच्छत्रुः। द्वेषार्हो द्वेष्टुमशक्यो (N द्वेष्टुं शक्यः) द्वेष्यः। बन्धुः योन्यादिसंबन्धेन। एतेषु सर्वेषु समधीः एवं साधुषु पापेषु च स च विशिष्यते क्रमात् क्रम संसारात् तरति।
Sri AnandgiriSanskrit Commentary+
योगारूढस्य प्रशस्तत्वमभ्युपेत्य योगस्याङ्गान्तरं दर्शयति किञ्चेति। परच्छेदः पदार्थोक्तिरिति व्याख्यानाङ्गं संपादयति सुहृदितीति। अरिर्नाम परोक्षमपकारकः प्रत्यक्षमप्रियो द्वेष्य इति विभागः। समबुद्धिरिति व्याचष्टे कः किमिति। प्रथमो हि प्रश्नो जातिगोत्रादिविषयो द्वितीयो व्यापारविषयः। उक्तप्रकारेणाव्यापृतबुद्धित्वे सर्वोत्कर्षो वा सर्वपायविमोक्षो वा सिध्यतीत्याह विशिष्यत इति। पाठद्वयेऽपि सिद्धमर्थं संगृह्य कथयति योगारूढानामिति।
Sri DhanpatiSanskrit Commentary+
न केवलं समलोष्टाश्मकाञ्चन एव अपितु सुहृदादिष्वपि समबुद्धिरित्याह सुहृदिति। सुहृत्प्रत्युपकारमनपेक्ष्योपकर्ता मित्रं स्नेहादिमपेक्ष्य तत्कर्ता अरिः शत्रुः खङ्गहस्तो मारणायोद्यतः उदासीनः पक्षपातशून्यः मध्यस्थो विरोधं कुर्वतोर्द्वयोरपि हितैषी द्वेष्योऽपकर्तृत्वाद्वेषविषयः बन्धुर्भ्रात्रादिः संबन्धीत्येतेषु साधुषु शास्त्रानुवर्तिष्वपिच पापेषु प्रतिषिद्धकारिषु सर्वेष्वेतेषु समबुद्धिः। कः सुहृदादिः किमुपकारादिकर्मकर्तेत्यव्यापृतबुद्धिरित्यर्थः। विशिष्यते सर्वतः श्रेष्ठो भवतीत्यर्थः।विमुच्यते इति वा पाठः।
Sri JayatrithaSanskrit Commentary+
मध्ये लक्ष्यस्योक्तत्वात्सुहृत् इत्यादिकं न योगारूढलक्षणमिति प्रतीतिनिरासायाह स एवेति। साधुपापादिषु समबुद्धिश्च स योगारूढ एवेति न किन्तु सर्वस्मादयोगिवर्गाद्विशिष्यत इत्येतद्वक्तुं पृथगन्वय इति भावः। साधुत्वं धर्मित्वम् पापत्वं पापवत्त्वं च नियतं न तु सुहृत्त्वादिवदव्यवस्थितमित्यतः सुहृदादिष्वित्यनुक्त्वासाधुपापादिषु इत्युक्तम्। समबुद्धित्वं नाम पूजादिसाम्यमित्यन्यथाप्रतीतिनिरासायाह जीवचित इति।एष चेतनया युक्तो जीव इत्यभिधीयते इति चेतनाचेतनपिण्डे जीवशब्दप्रयोगात् चित इत्युक्तम्। सुहृदादिचैतन्यस्य तथा सर्वत्र सुहृदादिषु स्थितस्य परमात्मनः एवं सर्वत्र सुहृदादिषु स्थितस्य सुदृत्त्वादेः परमात्मनिमित्तकत्वस्य चैकरूप्येण कारणेन तद्दर्शी समबुद्धिरित्यर्थः। तत्राद्यं प्रकारं विवृणोति चिद्रूपा एवेति। मनुष्येषु यदेक एकं प्रति सुहृदित्यादि तत् न जीवस्वभावान्तर्गतं किन्तु चिद्रूपत्वादिकमेवेत्यर्थः। तर्हि सुहृत्त्वादिधर्मः किमात्मकः इत्यत आह विशेषस्त्विति। अन्तःकरणोपादानको बाह्यधर्मः। एतदुक्तं भवति मुक्ताववशिष्यमाणं यज्जीवरूपं तत्त्रिविधा जीवसङ्घाः इत्यादिप्रमाणाद्विषममेव किन्तु देहेन्द्रियान्तःकरणधर्मैर्यद्वैषम्यं तत्तत्स्वरूप एवारोप्य विषमबुद्धित्वं योगारूढस्य नास्तीति द्वितीयः प्रकारः स्फुटः। तृतीयं विवृणोति सर्वेषामिति। स्वतः स्वातन्त्र्येण।अत्र प्रमाणमाह उक्तं चेति। स्वतः स्वरूपेण। दोषैररित्वादिभिः। एवं सुहृत्त्वादिगुणैरित्यपि ग्राह्यम्। आगन्तुकधर्मा न स्वरूपान्तर्गता इत्यर्थः। किं तर्हि इत्यत आह तेषां त्विति। दोषा गुणाश्च। उपाधिरन्तःकरणादिः। सर्वं सुहृत्वादिकम्। अतएव प्रकारद्वयेन यदनात्मधर्मानात्मस्वन्तर्भाव्य वैषम्यम् यच्च क्वचित् परमेश्वरानधीनरूपत्वं तद्भ्रान्तिप्रतीतम्। योगे प्रवर्तमानं प्रति यत्सुहृत्त्वादिकं तत् मनुष्येष्वेव स्वरूपवैषम्यकारणं न भवति। न तु देवादिष्वित्युक्तस्यापवादमाह एवमिति। तुशब्दोऽवधारणे। अवधारणार्थं विवृणोति विशेष इति। विशेषो योगिनं प्रति सुहृत्त्वादिः। तदेव प्रपञ्चयति असुरादेरिति। तथाशब्दो वक्ष्यमाणसमुच्चये। दोषा योगिनं प्रति अरित्वाद्याः। तथा चोक्तम्विद्ध्येनमिह वैरिणम् 3।37 इति। गुणदोषौ सुहृत्त्वारित्वादी अनागन्तुकौ। गुणैः सुहृत्त्वादिभिरेकमात्रं गुणैकमात्रम्। तथा च श्रुतिः यथा ह वै बहवः पशवः बृ.उ.1।4।10 इत्यादिका।सुहृत् इत्यादिश्लोकस्य प्रतीत एवार्थः किं न स्यात्। इत्यत आह न त्विति। सर्वशब्दपर्यायस्य समशब्दस्यैव सर्वनामसंज्ञा न साधारणार्थस्य समे देशे यजति इति।तथा न केवलं समपूजायां दोषः किन्तु विषमपूजाविधानं चास्तीत्याह वित्तमिति। बन्धुरिति बन्धुत्वम्। मान्यानि च तानि स्थानानि च। वित्तादिशब्दैः तद्वन्त उपलक्ष्यन्ते। दृष्टिरेवोक्तप्रकारत्रयेण समा कार्या पूजा तु विषमैवेत्यत्र प्रमाणान्तरमाह गुणेति। या विषमा पूजा सा वैषम्यम्। तस्यैव व्याख्यानमुत्तमत्वम्। साम्यं ददाति विदुःखत्वनिमित्तम्। समबुद्धित्वं प्रकारान्तरेण व्याचष्टे सुहृदादिष्विति। एतन्न योगारूढविषयमिति तत्रैव नोक्तम्। न हि योगारूढो लौकिकेष्वरिष्वपकारं करोति यः। सुहृन्मित्रशब्दयोररिद्वेष्यशब्दयोरुदासीनमध्यस्थशब्दयोश्चार्थभेदो न प्रतीयते अत आह प्रत्युपकारेति। निरपेक्षयाऽनपेक्षया अवासितमप्रियं तत उपक्रियमाणात्।
Sri MadhavacharyaSanskrit Commentary+
स एव च सर्वस्माद्विशिष्यते। साधुपापादिषु समबुद्धिः जीवचितः। परमात्मनः सर्वस्य तन्निमित्तकत्वस्य च सर्वत्रैकरूप्येण चिद्रूपा एव हि जीवाः। विशेषस्त्वन्तःकरणकृतः। सर्वेषां साधुत्वादिकं सर्वमीश्वरकृतमेव। स्वतो न किञ्चिदपि।उक्तं चैतत्सर्वम् स्वतः सर्वेऽपि चिद्रूपाः सर्वदोषविवर्जिताः। जीवास्तेषां तु ये दोषास्त उपाधिकृता मताः। सर्वं चेश्वरतस्तेषां न किञ्चित्स्वत एव तु। समा एवं ह्यतः सर्वे वैषम्यं भ्रान्तिसम्भवम्। एवं समानजीवास्तु विशेषो देवतादिषु। स्वाभाविकस्तु नियमादत एव सनातनाः। असुरादेस्तथा दोषा नित्याः स्वाभाविका अपि। गुणदोषौ मानवानां नित्यौ स्वाभाविकौ मतौ। गुणैकमात्ररूपास्तु देवा एव सदा मताः। इति ब्राह्मे। न तु साधुपापादीनां पूजादिसाम्यम् तत्र दोषस्मृतेःसमानां विषमा पूजा विषमानां समा तथा। क्रियते येन देवोऽपि स्वपदाद्भ्रश्यते पुमान्। इति ब्राह्मे।वित्तं बन्धुर्वयः कर्म विद्या चैव तु (भवति) पञ्चमी। एतानि मान्यस्थानानि गरीयो ह्युत्तरो (यद्यदु)त्तरम्। 2।136 इति मानवे।गुणानुसारिणीं पूजां समां दृष्टिं च यो नरः। सर्वभूतेषु कुरुते तस्य विष्णुः प्रसीदति। वैषम्यमुत्तमत्वं तु ददाति नरसञ्चयात्। पूजाया विषमा दृष्टिः समा साम्यं विदुःखजम्। इति ब्रह्मवैवर्ते। सुहृदादिषु शास्त्रोक्तपूजादिकृतिः। अन्यूनानधिका या साऽपि समता। तदप्याहुः यथा सुहृत्सु कर्तव्यं पितृशत्रुसुतेषु च। तथा करोति पूजादि समबुद्धिः स उच्यते। इति गारुडे। प्रत्युपकारनिरपेक्षयोपकारकृत्सुहृत्। क्लेशस्थानं निरूप्य यो रक्षां करोति स मित्रम्। अरिर्वधादिकर्ता। कर्तव्ये उपकारे अपकारे च य उदास्ते स उदासीनः। कर्तव्यमुभयमपि यः करोति स मध्यमः। अवासितकृद्वेष्यः। आह चतत् द्वेष्योऽवासितकृत्कार्यमात्रकारी तु मध्यमः। प्रियकृत्प्रियो निरूप्यापि क्लेशं यः परिरक्षति। स मित्रमुपकारं तु अनपेक्ष्योपकारकृत्। यस्ततः स सुहृत्प्रोक्तः शत्रुश्चापि वधादिकृत्। इति।
Sri Madhusudan SaraswatiSanskrit Commentary+
सुहृन्मित्रादिषु समबुद्धिस्तु सर्वयोगिश्रेष्ठ इत्याह सुहृत्प्रत्युपकारमनपेक्ष्य पूर्वस्नेहं संबन्धं च विनैवोपकर्ता। मित्रं स्नेहेनोपकारकः। अरिः स्वकृतापकारमनपेक्ष्य स्वभावक्रौर्येणापकर्ता। उदासीनो विवदमानयोरुभयोरप्युपेक्षकः। मध्यस्थो विवदमानयोरुभयोरपि हितैषी। द्वेष्यः स्वकृतापकारमपेक्ष्यापकर्ता। बन्धुः संबन्धेनोपकर्ता। एतेषु साधुषु शास्त्रविहितकारिषु पापेषु शास्त्रप्रतिषिद्धकारिष्वपि। चकारादन्येषु च सर्वेषु समबुद्धिः कः कीदृक्कर्मेत्यव्यापृतबुद्धिः सर्वत्र रागद्वेषशून्यो विशिष्यते सर्वत उत्कृष्टो भवति।विमुच्यते इति वा पाठः।
Sri NeelkanthSanskrit Commentary+
समत्वमेव स्तौति सुहृदिति। सुहृत् प्रत्युपकारमनपेक्ष्योपकर्ता मित्रं स्नेहवान् अरिः शत्रुः उदासीन उभयत्र पक्षपातशून्यः मध्यस्थः उभयहितैषी द्वेष्य आत्मनोऽप्रियः बन्धुः संबन्धी तेषु साधुषु पुण्यकृत्सु पापेषु पापाचारेषु कस्य किं कर्मेत्यनालोचयन् तेषु सर्वेषु यः समबुद्धिः स विशिष्यते।
Sri PurushottamjiSanskrit Commentary+
किञ्च एतत्ित्रतय एव न समः किन्तु सर्वत्रैव समबुद्धिरुत्तम इत्याह सुहृदिति। सुहृत् सर्वहितोपदेशकृत्। मित्रं स्नेहपरवशः अरिः स्वस्मिन् शत्रुबुद्धिमान् उदासीनो निरपेक्षः मध्यस्थो विवदमानयोः सदसद्वाक्यविचारकः द्वेष्यः सद्भावहीनः बन्धुः सम्बन्धी एतेषु साधुषु सदाचारेषु। अपि च किं पुनः पापेषु धर्मविरोधिषु समबुद्धिः भगवद्विप्रयोगेन भगवदात्मबुद्धिस्तेषु वा तद्विप्रयोगेन तथाभावदर्शी विशिष्यते योगयुक्तेपूत्तम इत्यर्थः। अत्रायं भावः भगवद्विप्रयोगे तत्सौहार्दस्मरणेनायं सर्वेषु सौहार्दधर्मवान् तथैव च मित्रधर्मवान् तद्रहितेषु अरिबुद्धिमान् तत्तद्दुःखेन सर्वत्रौदासीन्यधर्मवान् विप्रयोगावस्थायां तदनुकरणेन मध्यस्थधर्मवान् तथैव तत्क्लेशेन द्वेषधर्मवान् तत्सम्बन्धस्मरणेन बन्धुधर्मवान् तदर्थं सदाचारवान् तत्तापातिशयेन पापरूपवान् जडत्वधर्मेण एवं यः समबुद्धिः स विशिष्ट इत्यर्थः।
Sri RamanujaSanskrit Commentary+
वयोविशेषानङ्गीकारेण स्वहितैषिणः सुहृदः सवयसो हितैषिणो मित्राणि अरयो निमित्ततः अनर्थेच्छवः उभयहेत्वभावाद् उभयरहिता उदासीनाः जन्मत एव उभयरहिता मध्यस्थाः जन्मत एव अनिष्टेच्छवो द्वेष्याः जन्मत एव हितैषिणो बन्धवः साधवो धर्मशीलाः पापाः पापशीलाः आत्मैकप्रयोजनतया सुहृन्मित्रादिभिः प्रयोजनाभावाद् विरोधाभावाच्च तेषु समबुद्धिः योगाभ्यासार्हत्वे विशिष्यते।
Sri ShankaracharyaSanskrit Commentary+
सुहृत् इत्यादिश्लोकार्धम् एकं पदम्। सुहृत् इति प्रत्युपकारमनपेक्ष्य उपकर्ता मित्रं स्नेहवान् अरिः शत्रुः उदासीनः न कस्यचित् पक्षं भजते मध्यस्थः यो विरुद्धयोः उभयोः हितैषी द्वेष्यः आत्मनः अप्रियः बन्धुः संबन्धी इत्येतेषु साधुषु शास्त्रानुवर्तिषु अपि च पापेषु प्रतिषिद्धकारिषु सर्वेषु एतेषु समबुद्धिः कः किंकर्मा इत्यव्यापृतबुद्धिरित्यर्थः। विशिष्यतेविमुच्यते इति वा पाठान्तरम्। योगारूढानां सर्वेषाम् अयम् उत्तम इत्यर्थः।।अत एवमुत्तमफलप्राप्तये
Sri Sridhara SwamiSanskrit Commentary+
सुहृन्मित्रादिषु समबुद्धियुक्तस्ततोऽपि श्रेष्ठ इत्याह सुहृदिति। सुहृत् स्वभावेनैव हिताशंसी मित्रं स्नेहवशेनोपकारकः अरिर्घातुकः उदासीनो विवदमानयोरुभयोरप्युपेक्षकः मध्यस्थो विवदमानयोरपि हिताशंसी द्वेष्यो द्वेषविषयः बन्धुः संबन्धी साधवः सदाचारः पापा दुराचाराः एतेषु समा रागद्वेषादिशून्या बुद्धिर्यस्य स तु विशिष्टः।
Sri VallabhacharyaSanskrit Commentary+
।।6.8 6.9।।योगारूढस्य स्वरूपं श्रैष्ठ्यं चोपपादयति द्वाभ्यां ज्ञानविज्ञानेति। ज्ञानमौपदेशिकं विज्ञानमपरोक्षानुभवः ताभ्यां तृप्त आत्मा यस्य कूटे स्थितोऽपि युक्त इत्युच्यते स योगी सुहृदादिषु तद्विपरीतेषु च समबुद्धिरधिकतरो भवतीति विशिष्यते।
Vedantadeshikacharya VenkatanathaSanskrit Commentary+
समलोष्टाश्मकाञ्चनः 6।8 इति अचेतनेषूक्त एवार्थश्चेतनविषयतया प्रपञ्च्यत इत्यभिप्रायेणाह तथा चेति। यद्वा सुहृदादिषु समबुद्धित्वस्य दुष्करतरत्वादत्रविशिष्यते इत्युक्तेश्च समदर्शित्वातिशयोऽत्र विवक्षितः तथाच अपिचेत्यर्थः सुहृन्मित्रबन्धुशब्दानां अरिद्वेष्यशब्दयोरुदासीनमध्यशब्दयोश्च पौनरुक्त्यमपाकर्तुं तत्तत्पदव्याख्या। बन्धुशब्दस्तावत्पित्रादिषु प्रसिद्धः मित्रशब्दश्च सवयस्सु अतः पारिशेष्यात्सुहृच्छब्दस्तदुभयव्यतिरिक्तविषय इत्यभिप्रायेणाह वयोविशेषानङ्गीकारेणेति।सवयस इत्यनेन मित्राणां क्रीडादिरूपप्रियैषित्वमप्यस्तीति सूचितम्। बन्धुशब्दासक्तेर्द्वेष्यशब्दस्तावत्सहजशत्रुविषयः प्राप्तः ततोऽत्रापि पारिशेष्यादरिशब्दं कृत्रिमशत्रुविषयमाह अरयो निमित्ततोऽनर्थेच्छव इति। मध्यस्थशब्दोऽपि द्वेष्यबन्धुशब्दासक्तेर्हेतुतो हिताहितप्रवृत्तियोग्येषु प्रयोगाभावाच्च जन्मत एवोभयरहितविषय उचितः। ततः परिशेषादौदासीन्यस्य प्रवृत्तिप्रतिसम्बन्धिकत्वेन तत्स्मारकत्वात्कारणागमे हिताहितप्रवृत्तियोग्यास्तदभावमात्रेण तद्रहिता उदासीना इत्यभिप्रायेणाह उभयेति। उभयं हितैषित्वमहितैषित्वं च जन्मतः सम्बन्धिनो बन्धव इत्येतावन्मात्रस्य दुर्योधनादिष्वतिव्याप्तेःजन्मत एव हितैषिणो बन्धव इत्युक्तम्। एवं स्वप्रतिसम्बन्धिनः पुरुषा उक्ताः अथ साधारण्येन श्लाघ्यत्वनिन्द्यत्वाद्याश्रयाः पुरुषाः साधुपापशब्दाभ्यामभिधीयन्त इत्यभिप्रायेणाह साधव इति। वाक्यार्थमाह आत्मैकेति। सुहृदादिभिः प्रयोजनाभावादितरैर्विरोधाभावाच्चेत्यर्थः। ननु युक्तं नाम सुहृदादिषु समबुद्धित्वम् न तु साधुषु पापेषु च योगिनां समं प्रायोजनम् सत्सङ्गमादेरसत्परित्यागादेश्च ज्ञानवृद्धिहेतुत्वेन तेषामवस्यापेक्षितत्वात्। उच्यते नेदानीमुपजीवकदशापन्नो योगी निर्दिश्यते किन्तु श्रुतसकलश्रोतव्यः कृतसकलकर्तव्यः साक्षात्कारात्यन्तयोग्यदशापन्नः तथाविधस्य च तस्य साधुभिः पापैश्च प्रयोजनाभावः समः केवलं योगोपयुक्तरहस्यस्थानादेरेवोपादेयत्वादिति भावः। योगाभ्यासार्हदशा हि प्रागप्युक्ता इयं तु तत्र काष्ठाप्राप्तावस्थेतिविशिष्यते इत्यस्य भावः। तदाह योगाभ्यासार्हत्वे विशिष्यते इति. अत्रविमुच्यते इति परैः (शं.) पठितात्पाठविकल्पादयमेव पाठ उचित इति भावः।