श्लोक · Shlok 33
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि | प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥
sadṛśaṃ ceṣṭate svasyāḥ prakṛterjñānavānapi. prakṛtiṃ yānti bhūtāni nigrahaḥ kiṃ kariṣyati.
Translation · अर्थ
English
Even a wise man acts in accordance with his own nature; beings will follow Nature; what can restraint do?
Sūtradhāra Vichār
Classical commentaries
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A.C. Bhaktivedanta Swami PrabhupadaEnglish Commentary+
Unless one is situated on the transcendental platform of Kṛṣṇa consciousness, he cannot get free from the influence of the modes of material nature, as it is confirmed by the Lord in the Seventh Chapter. Therefore, even for the most highly educated person on the mundane plane, it is impossible to get out of the entanglement of māyā simply by theoretical knowledge, or by separating the soul from the body. There are many so-called spiritualists who outwardly pose as advanced in the science but inwardly or privately are completely under particular modes of nature which they are unable to surpass. Academically, one may be very learned, but because of his long association with material nature, he is in bondage. Kṛṣṇa consciousness helps one to get out of the material entanglement, even though one may be engaged in his prescribed duties in terms of material existence. Therefore, without being fully in Kṛṣṇa consciousness, one should not give up his occupational duties. No one should suddenly give up his prescribed duties and become a so-called yogī or transcendentalist artificially. It is better to be situated in one’s position and to try to attain Kṛṣṇa consciousness under superior training. Thus one may be freed from the clutches of Kṛṣṇa’s māyā.
Swami SivanandaEnglish Commentary+
सदृशम् in accordance? चेष्टते acts? स्वस्याः of his own? प्रकृतेः of nature? ज्ञानवान् a wise man? अपि even? प्रकृतिम् to nature? यान्ति follow? भूतानि beings? निग्रहः restraint? किम् what? करिष्यति will do.Commentary He who reads this verse will come to the conclusion that there is no scope for mans personal exertion. It is not so. Read the following verse. It clearly indicates that man can coner Nature if he rises above the sway of RagaDvesha (love and hatred).The passionate and ignorant man only comes under the sway of his natural propensities? and his lower nature. He cannot have any restraint over the senses and the two currents of likes and dislikes. The seeker after Truth who is endowed with the four means? and who is constantly practising meditation can easily control Nature. (Cf.II.60V.14XVIII.59).
Swami ChinmayanandaHindi Commentary+
जिस प्रकार के विचारों का चिन्तन हम करते हैं उनसे विचारों की दिशा निर्धारित होती है और वे स्थायी भाव का रूप लेते हैं इसको ही हमारा स्वभाव कहा जाता है। किसी समय मनुष्य का स्वभाव उसके मन में उठने वाले विचारों से निश्चित किया जाता है। यहाँ कहा गया है कि ज्ञानवान् पुरुष भी अपने स्वभाव के अनुसार ही कार्य करता है।यहाँ ज्ञानवान शब्द का अर्थ है वह पुरुष जिसने कर्मयोग के सिद्धान्त को भली भाँति समझ लिया है। यद्यपि वह सिद्धान्त को जानता है तथापि उसे कार्यान्वित करने में कठिनाई आती है क्योंकि उसका स्वभाव उसके कार्य में बाधा उत्पन्न करता है। पूर्वाजिर्त वासनाओं के कारण इस सरल से प्रतीत होने वाले सिद्धांत को मनुष्य अपने जीवन में नहीं उतार पाता। इसका एक मात्र कारण है प्राणिमात्र अपने स्वभाव का अनुसरण करते हैं। स्वभाव के शक्तिशाली होने पर किसी का निग्रह क्या करेगा यह अन्तिम वाक्य भगवान् के उपदेश में निराशा का उद्गार नहीं किन्तु उनकी परिपूर्ण दृष्टि का परिचायक है। वे वस्तु स्थिति से परिचित हैं कि प्रत्येक व्यक्ति जीवन के उच्च मार्ग पर चलने की क्षमता नहीं रखता। विकास के सोपान की सबसे निचली सीढ़ी पर खड़े असंख्य मनुष्यों के लिये इस मार्ग का अनुसरण कदापि सम्भव नहीं क्योंकि विषयों में आसक्ति तथा पाशविक प्रवृत्तियों से वे इस प्रकार बंधे होते हैं कि उन सबका एकाएक त्याग करना उन सबके लिये सम्भव नहीं होता। जिस मनुष्य में कर्म के प्रति उत्साह तथा जीवन में कुछ पाने की महत्त्वाकांक्षा है केवल वही व्यक्ति इस कर्मयोग का आचरण करके स्वयं को कृतार्थ कर सकता है। भगवान् का यह कथन उनकी विशाल हृदयता एवं सहिष्णुता का परिचायक है।प्रत्येक व्यक्ति का अपना निजी स्वभाव है यदि उसी के अनुसार कर्म करने को वह विवश है तो फिर पुरुषार्थ के लिये कोई अवसर ही नहीं रह जाता। इस कारण यह उपदेश भी निष्प्रयोजन हो जाता है। इस पर भगवान् कहते हैं
Swami RamsukhdasHindi Commentary+
व्याख्या-- 'प्रकृतिं यान्ति भूतानि'-- जितने भी कर्म किये जाते हैं, वे स्वभाव अथवा सिद्धान्तको (टिप्पणी प0 174.1) सामने रखकर किये जाते हैं। स्वभाव दो प्रकारका होता है-- राग-द्वेषरहित और राग-द्वेषयुक्त। जैसे, रास्तेमें चलते हुए कोई बोर्ड दिखायी दिया और उसपर लिखा हुआ पढ़ लिया तो यह पढ़ना न तो राग- द्वेषसे हुआ और न किसी सिद्धान्तसे, अपितु राग-द्वेषरहित स्वभावसे स्वतः हुआ। किसी मित्रका पत्र आनेपर उसे रागपूर्वक पढ़ते हैं, और शत्रुका पत्र आनेपर उसे द्वेषपूर्वक पढ़ते हैं तो यह पढ़ना राग-द्वेषयुक्त स्वभावसे हुआ। गीता, रामायण आदि सत्- शास्त्रोंको पढ़ना 'सिद्धान्त' से पढ़ना हुआ। मनुष्य-जन्म परमात्मप्राप्तिके लिये ही है; अतः परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यसे कर्म करना भी सिद्धान्तके अनुसार कर्म करना है।इस प्रकार देखना, सुनना, सूघँना, स्पर्श करना आदि मात्र क्रियाएँ स्वभाव और सिद्धान्त--दोनोंसे होती हैं। राग-द्वेषरहित स्वभाव दोषी नहीं होता, प्रत्युत राग-द्वेषयुक्त स्वभाव दोषी होता है। राग-द्वेषपूर्वक होनेवाली क्रियाएँ मनुष्यको बाँधती हैं; क्योंकि इनसे स्वभाव अशुद्ध होता है और सिद्धान्तसे होनेवाली क्रियाएँ उद्धार करनेवाली होती हैं; क्योंकि इनसे स्वभाव शुद्ध होता है। स्वभाव अशुद्ध होनेके कारण ही संसारसे माने हुए सम्बन्धका विच्छेद नहीं होता। स्वभाव शुद्ध होनेसे संसारसे माने हुए सम्बन्धकासुगमतापूर्वक विच्छेद हो जाता है।ज्ञानी महापुरुषके अपने कहलानेवाले शरीरद्वारा स्वतः क्रियाएँ हुआ करती हैं; क्योंकि उसमें कर्तृत्वाभिमान नहीं होता। परमात्मप्राप्ति चाहनेवाले साधककी क्रियाएँ सिद्धान्तके अनुसार होती है। जैसे लोभी पुरुष सदा सावधान रहता है कि कहीं कोई घाटा न लग जाय, ऐसे ही साधक निरन्तर सावधान रहता है कि कहीं कोई क्रिया राग-द्वेषपूर्वक न हो जाय। ऐसी सावधानी होनेपर साधकका स्वभाव शीघ्र शुद्ध हो जाता है और परिणाम-स्वरूप वह कर्म-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।यद्यपि क्रियामात्र स्वाभाविक ही प्रकृतिके द्वारा होती है, तथापि अज्ञानी पुरुष क्रियाओंके साथ अपना सम्बन्ध मानकर अपनेको उन क्रियाओंका कर्ता मान लेता है (गीता 3। 27)। पदार्थों और क्रियाओंसे अपना सम्बन्ध माननेके कारण ही राग-द्वेष उत्पन्न होते हैं, जिनसे जन्म-मरणरूप बन्धन होता है। परन्तु प्रकृतिसे सम्बन्ध न माननेवाला साधक अपनेको सदा अकर्ता ही देखता है (गीता 13। 29)।स्वभावमें मुख्य दोष प्राकृत पदार्थोंका राग ही है। जबतक स्वभावमें राग रहता है, तभीतक अशुद्ध कर्म होते हैं। अतः साधकके लिये राग ही बन्धनका मुख्य कारण है।राग माने हुए 'अहम्' में रहता है और मन, बुद्धि, इन्द्रियों एवं इन्द्रियोंके विषयोंमें दिखायी देता है। अहम् दो प्रकारका है 1 चेतनद्वारा जडके साथ माने हुए सम्बन्धसे होनेवाला तादात्म्यरूप अहम्। 2 जड प्रकृतिका धातुरूप 'अहम्'-- 'महाभूतान्यहंकारः' (गीता 13। 5)।जड प्रकृतिके धातुरूप अहम् में कोई दोष नहीं है; क्योंकि यह 'अहम्' मन, बुद्धि, इन्द्रियों आदिकी तरह एक करण ही है। इसलिये सम्पूर्ण दोष माने हुए 'अहम्' में ही हैं। ज्ञानी महापुरुषमें तादात्म्यरूप 'अहम्' का सर्वथा अभाव होता है; अतः उसके कहलानेवाले शरीरके द्वारा होनेवाली समस्त क्रियाएँ प्रकृतिके धातुरूप 'अहम्' से ही होती हैं। वास्तवमें समस्त प्राणियोंकी सब क्रियाएँ इस धातुरूप 'अहम्' से ही होती हैं, परन्तु जड शरीरको 'मैं' और 'मेरा' माननेवाला अज्ञानी पुरुष उन क्रियाओंको अपनी तथा अपने लिये मान लेता है और बँध जाता है। कारण कि क्रियाओंको अपनी और अपने लिये माननेसे ही राग उत्पन्न होता है (टिप्पणी प0 174.2)। 'सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि'-- यद्यपि अन्तःकरणमें राग-द्वेष न रहनेसे ज्ञानी महापुरुषकी प्रकृति निर्दोष होती है और वह प्रकृतिके वशीभूत नहीं होता, तथापि वह चेष्टा तो अपनी प्रकृति-(स्वाभाव-) के अनुसार ही करता है। जैसे, कोई ज्ञानी महापुरुष अंग्रेजी भाषा नहीं जानता और उससे अंग्रेजी बोलनेके लिये कहा जाय, तो वह बोल नहीं सकेगा। वह जिस भाषाको जानता है, उसी भाषामें बोलेगा।भगवान् भी अपनी प्रकृति-(स्वभाव-) को वशमें करके जिस योनिमें अवतार लेते हैं, उसी योनिके स्वभावके अनुसार चेष्टा करते हैं; जैसे--भगवान् राम या कृष्ण-रूपसे मनुष्ययोनिमें अवतार लेते हैं तथा मत्स्य, कच्छप, वराह आदि योनियोंमें अवतार लेते हैं तो वहाँ उस-उस योनिके अनुसार ही चेष्टा करते हैं। तात्पर्य है कि भगवान्के अवतारी शरीरोंमें भी वर्ण, योनिके अनुसार स्वभावकी भिन्नता रहती है, पर परवशता नहीं रहती। इसी तरह जिन महापुरुषोंका प्रकृति-(जडता-) से सम्बन्ध-विच्छेद हो गया है, उनमें स्वभावकी भिन्नता तो रहती है, पर परवशता नहीं रहती। परन्तु जिन मनुष्योंका प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं हुआ है, उनमें स्वभावकी भिन्नता और परवशता--दोनों रहती हैं। यहाँ स्वस्याः पदका तात्पर्य यह है कि ज्ञानी महापुरुषकी प्रकृति निर्दोष होती है। वह प्रकृतिके वशमें नहीं होता, प्रत्युत प्रकृति उसके वशमें होती है। कर्मोंकी फल-जनकताका मूल बीज कर्तृत्वाभिमान और स्वार्थ-बुद्धि है। ज्ञानी महापुरुषमें कर्तृत्वाभिमान और स्वार्थ-बुद्धि नहीं होती। उसके द्वारा चेष्टामात्र होती है। बन्धनकारक कर्म होता है, चेष्टा या क्रिया नहीं। इसीलिये यहाँ चेष्टते पद आया है। उसका स्वभाव इतना शुद्ध होता है कि उसके द्वारा होनेवाली क्रियाएँ भी महान् शुद्ध एवं साधकोंके लिये आदर्श होती हैं।पीछेके और वर्तमान जन्मके संस्कार, माता-पिताके संस्कार, वर्तमानका सङ्ग, शिक्षा, वातावरण, अध्ययन, उपासना, चिन्तन, क्रिया, भाव आदिके अनुसार स्वभाव बनता है। यह स्वभाव सभी मनुष्योंमें भिन्न-भिन्न होताहै और इसे निर्दोष बनानेमें सभी मनुष्य स्वतन्त्र हैं। व्यक्तिगत स्वभावकी भिन्नता ज्ञानी महापुरुषोंमें भी रहती है। चेतनमें भिन्नता होती ही नहीं और प्रकृति-(स्वभाव-) में स्वाभाविक भिन्नता रहती है। प्रकृति है ही विषम। जैसे एक जाति होनेपर भी आम आदिके वृक्षोंमें अवान्तर भेद रहता है, ऐसे ही प्रकृति (स्वभाव) शुद्ध होनेपर भी ज्ञानी महापुरुषोंमें प्रकृतिका भेद रहता है।ज्ञानी महापुरुषका स्वभाव शुद्ध (राग-द्वेषरहित) होता है अतः वह प्रकृतिके वशमें नहीं होता। इसके विपरीत अशुद्ध (रागद्वेषयुक्त) स्वभाववाले मनुष्य अपनी बनायी हुई परवशतासे बाध्य होकर कर्म करते हैं।'निग्रहः किं करिष्यति'-- जिनका स्वभाव महान् शुद्ध एवं श्रेष्ठ है, उनकी क्रियाएँ भी अपनी प्रकृतिके अनुसार हुआ करती हैं, फिर जिनका स्वभाव अशुद्ध (राग-द्वेषयुक्त) है, उन पुरुषोंकी क्रियाएँ तो प्रकृतिके अनुसार होंगी ही। इस विषयमें हठ उनके काम नहीं आयेगा। जिसका जैसा स्वभाव है, उसे उसीके अनुसार कर्म करने पड़ेंगे। यदि स्वभाव अशुद्ध हो तो वह अशुद्ध कर्मोंमें और शुद्ध हो ते वह शुद्ध कर्मोंमें मनुष्यको लगा देगा। अर्जुन भी जब हठपूर्वक युद्धरूप कर्तव्य-कर्मका त्याग करना चाहते हैं, तब भगवान् उन्हें यही कहते हैं कि तेरा स्वभाव तुझे बलपूर्वक युद्धमें लगा देगा-- 'प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति' (18। 59); क्योंकि तेरे स्वभावमें क्षात्रकर्म (युद्ध आदि) करनेका प्रवाह है। इसलिये स्वाभाविक कर्मोंसे बँधा हुआ तू परवश होकर युद्ध करेगा अर्थात् इसमें तेरा हठ काम नहीं आयेगा-- 'करिष्यस्यवशोऽपि तत्' (18। 60)। जैसे सौ मील प्रति घंटेकी गतिसे चलनेवाली मोटर अपनी नियत क्षमतासे अधिक नहीं चलेगी, ऐसे ही ज्ञानी महापुरुषके द्वारा भी अपनी शुद्ध प्रकृतिके विपरीत चेष्टा नहीं होगी। जिनकी प्रकृति अशुद्ध है, उनकी प्रकृति बिगड़ी हुई मोटरके समान है। बिगड़ी हुई मोटरको सुधारनेके दो मुख्य उपाय हैं (1) मोटरको खुद ठीक करना और (2) मोटरको कारखानेमें पहुँचा देना। इसी प्रकार अशुद्ध प्रकृतिको सुधारनेके भी दो मुख्य उपाय हैं-- (1) रागद्वेषसे रहित होकर कर्म करना (गीता 3। 34) और (2) भगवान्के शरणमें चले जाना (गीता 18। 62)। यदि मोटर ठीक चलती है तो हम मोटरके वशमें नहीं हैं, और यदि मोटर बिगड़ी हुई है तो हम हम मोटरके वशमें हैं। ऐसे ही ज्ञानी महापुरुष प्रकृतिके शुद्ध होनेके कारण प्रकृतिके वशमें नहीं होता और अज्ञानी पुरुष प्रकृतिके अशुद्ध होनेके कारण प्रकृतिके वशमें होता है।जिसकी बुद्धिमें जडता-(सांसारिक भोग और संग्रह-) का ही महत्त्व है, ऐसा मनुष्य कितना ही विद्वान् क्यों न हो, उसका पतन अवश्यम्भावी है। परन्तु जिसकी बुद्धिमें जडताका महत्त्व नहीं है और भगवत्प्राप्ति ही जिसका उद्देश्य है, ऐसा मनुष्य विद्वान् न भी हो, तो भी उसका उत्थान अवश्यम्भावी है। कारण कि जिसका उद्देश्य भोग और संग्रह न होकर केवल परमात्माको प्राप्त करना ही है, उसके समस्त भाव, विचार, कर्म आदि उसकी उन्नतिमें सहायक हो जाते हैं। अतः साधकको सर्वप्रथम परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य बना लेना चाहिये, फिर उस उद्देश्यकी सिद्धिके लिये राग-द्वेषसे रहित होकर कर्तव्य-कर्म करने चाहिये। राग-द्वेषसेरहित होनेका सुगम उपाय है--मिले हुए शरीरादि पदार्थोंको अपना और अपने लिये न मानते हुए दूसरोंकी सेवामें लगाना और बदलेमें दूसरोंसे कुछ भी न चाहना। प्रकृतिके वशमें होनेके लिये साधकको चाहिये कि वह किसी आदर्शको सामने रखकर कर्तव्यकर्म करे। आदर्श दो हो सकते हैं-- (1) भगवान्का मत (सिद्धान्त) और (2) श्रेष्ठ महापुरुषोंका आचरण। आदर्शको सामने रखकर कर्म करनेवाले मनुष्यकी प्रकृति शुद्ध हो जाती है और नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है। इसके विपरीत आदर्शको सामने न रखकर कर्म करनेवाला मनुष्य राग-द्वेषपूर्वक ही सब कर्म करता है, जिससे राग-द्वेष पुष्ट हो जाते हैं और उसका पतन हो जाता है-- 'नष्टान् विद्धि'(गीता 3।32)।जैसे नदीके प्रवाहको हम रोक तो नहीं सकते, पर नहर बनाकर मोड़ सकते हैं, ऐसे ही कर्मोंके प्रवाहको रोक तो नहीं सकते, पर उसका प्रवाह मोड़ सकते हैं। निःस्वार्थ-भावसे केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करना ही कर्मोंके प्रवाहको मोड़ना है। अपने लिये किञ्चिन्मात्र भी कर्म करनेसे कर्मोंका प्रवाह मुड़ेगा नहीं। तात्पर्य यह कि केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेसे कर्मोंका प्रवाह संसारकी ओर हो जाता है और साधक कर्म-बन्धनसे मुक्त हो जाता है। सम्बन्ध प्रत्येक मनुष्यका अपनी प्रकृतिको साथ लेकर ही जन्म होता है; अतः उसे अपनी प्रकृतिके अनुसार कर्म करने ही पड़ते हैं। इसलिये अब भगवान् आगेके श्लोकमें प्रकृतिको शुद्ध करनेका उपाय बताते हैं।
Sri Abhinav GuptaSanskrit Commentary+
सदृशमिति। योऽपि च ज्ञानी न तस्य व्यवहारे भोजनादौ विपर्यासः कश्चित्। अपि तु सोऽपि सत्त्वाद्युचितमेव चेष्टते एवमेव जानन्। यतः ( N अतः) भूतानां पृथिव्यादीनां प्रकृतौ विलयः आत्मा च अकर्ता नित्यमुक्त इति कस्य जन्मादिनिग्रहः।
Sri AnandgiriSanskrit Commentary+
भगवन्मतानुवर्तनमन्तरेण परधर्मानुष्ठाने स्वधर्माननुष्ठाने च कारणं पृच्छति कस्मादिति। भगवत्प्रतिकूलत्वमेव तत्र कारणमित्याशङ्क्याह तत्प्रतिकूला इति। राजानुशासनातिक्रमे दोषदर्शनाद्भगवदनुशासनातिक्रमेऽपि दोषसंभवात्प्रतिकूलत्वं भयकारणमित्यर्थः। उत्तरत्वेन श्लोकमवतारयति सदृशमिति। तत्राहेति। सर्वस्य प्राणिवर्गस्य प्रकृतिवशवर्तित्वे कैमुतिकन्यायं सूचयति ज्ञानवानपीति। सर्वाण्यपि भूतान्यनिच्छन्त्यपि प्रकृतिसदृशीं चेष्टां गच्छन्तीति निगमयति प्रकृतिमिति। भूतानां प्रकृत्यधीनत्वेऽपि प्रकृतिर्भगवता निग्राह्येत्याशङ्क्याह निग्रह इति। का पुनरियं प्रकृतिर्यदनुसारिणी भूतानां चेष्टेति पृच्छति प्रकृतिर्नामेति। भगवदभिप्रेतां प्रकृतिं प्रकटयति पूर्वेति। आदिशब्देन ज्ञानेच्छादि संगृह्यते। यथोक्तः संस्कारः स्वशक्त्या प्रवर्तकश्चेत्प्रलयेऽपि प्रवृत्तिः स्यादित्याशङ्क्य विशिनष्टि वर्तमानेति। सर्वो जन्तुरित्युक्तं विवेकिप्रवृत्तेरतथात्वादित्याशङ्क्यपश्वादिमिश्चाविशेषात् इति न्यायमनुसरन्नाह ज्ञानवानिति। ज्ञानवतामज्ञानवतां च प्रकृत्यधीनत्वाविशेषे फलितमाह तस्मादिति। प्रकृतिं यान्ति प्रकृतिसदृशीं चेष्टां गच्छन्त्यनिच्छन्त्यपि सर्वाणि भूतानीत्यर्थः। प्रकृतेर्भगवता तत्तुल्येन वा केनचिन्निग्रहमाशङ्क्यावतारितचतुर्थपादस्यार्थापेक्षितं पूरयति मम वेति।
Sri DhanpatiSanskrit Commentary+
ननु कस्मात्त्वत्प्रतिकूलास्त्वच्छासनातिक्रमान्न बिभ्यति त्वदीयं मतं स्वधर्मं नानुतिष्ठन्ति परधर्मं चानुतिष्ठन्तीति चेत्तत्राह सदृशमिति। ज्ञानवानपिपश्वादिभिश्चाविशेषात् इति न्यायात् गुणदोषज्ञानवानपीति वा। स्वस्याः प्रकृतेः साच पूर्वकृतधर्माधर्मादिसंस्कारो वर्तमानजन्मादावभिव्यक्तः तस्याः सदृशमनुरुपं चेष्टां करोति किं पुनर्मुर्खः। तस्माद्भूतानि प्राणिनः प्रकृतिं यान्त्यनुगच्छन्ति। निग्रहो निषेधरुपः मम परमेश्वरस्यान्यस्य राज्ञो वा किं करिष्यति। प्रकृतेः प्राबल्यान्नास्मदादिशासनाद्विभ्यतीति भावः।
Sri JayatrithaSanskrit Commentary+
सदृशं इति श्लोकस्य सङ्गतिर्न प्रतीयतेऽतस्तामाह एवं चेदिति। यदि त्वन्मतानुष्ठाने मोक्षः अन्यथा नाश इत्यर्थः। मूलप्रकृतेरेकत्वात्कथं स्वस्या इति प्रातिस्विकत्वमुच्यते इत्यत आह प्रकृतिरिति तत्कार्यौ रागद्वेषौ उपलक्ष्येते।
Sri MadhavacharyaSanskrit Commentary+
एवं चेत्किमिति ते मतं नानुतिष्ठन्ति लोकाः इत्यत आह सदृशमिति। प्रकृतिः पूर्वसंस्कारः।
Sri Madhusudan SaraswatiSanskrit Commentary+
ननु राज्ञ इव तव शासनातिक्रमे भयं पश्यन्तः कथमसूयन्तस्तव मतं नानुवर्तन्ते कथं वा सर्वपुरुषार्थसाधने प्रतिकूला भवन्तीत्यत आह प्रकृतिर्नाम प्राग्जन्मकृतधर्माधर्मज्ञानेच्छादिसंस्कारो वर्तमानजन्मन्यभिव्यक्तः सर्वतो बलवान्तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते पूर्वप्रज्ञा च इति श्रुतिप्रमाणकः। तस्याः स्वकीयायाः प्रकृतेः सदृशमनुरूपमेव सर्वो जन्तुर्ज्ञानवान् ब्रह्मविदपिपश्वादिभिश्चाविशेषात् इतिन्यायात् गुणदोषज्ञानवान्वा चेष्टते किं पुनर्मूर्खः। तस्मात् भूतानि सर्वे प्राणिनः प्रकृतिं यान्ति अनुवर्तन्ते पुरुषार्थभ्रंशहेतुभूतामपि। तत्र मम वा राज्ञो वा निग्रहः किं करिष्यति। रागौत्कठ्येन दुरितान्निवर्तयितुं न शक्नोतीत्यर्थः। महानरकसाधनत्वं ज्ञात्वापि दुर्वासनाप्राबल्यात्पापेषु प्रवर्तमाना न मच्छासनातिक्रमदोषाद्बिभ्यतीति भावः।
Sri NeelkanthSanskrit Commentary+
ननु ते चेत्तव मतं नानुतिष्ठन्ति तर्हि कथं तवान्तर्यामित्वमित्यत आह सदृशमिति। स्वस्याः प्रकृतेः स्वकीयस्य प्राग्भवीयधर्माधर्मसंस्कारस्य सदृशमनुरूपं ज्ञानवानपि चेष्टते किमु मूर्खः।पश्वादिभिश्चाविशेषात् इति न्यायात्। तस्मात्प्रकृतिं यान्त्यनुसरन्ति भूतानि प्राणिनस्तत्र मम वान्यस्य वा निग्रहः किं करिष्यति न किमपि। अहमपि पूर्वकर्मापेक्षयैव तान्प्रवर्तयामीति भावः।
Sri PurushottamjiSanskrit Commentary+
ननु त्वन्मतं विहाय नाशसाधने कथमनुवर्त्तन्ते इत्याशङ्क्याहुः सदृशमिति। ज्ञानवानपि नरः स्वस्याः प्रकृतेः सदृशं चेष्टते करोति। अत्रायं भावः प्रकृत्यंशो जीवो न भगवदुक्ते प्रवर्तते तदंशस्वात्। अत एव स्मर्यतेयो यदंशः स तं भजेत्। माया तु भगवद्दत्तसामर्थ्येन ज्ञानवतोऽपि मोहयति। अत एव मार्कण्डेयपुराणे दुर्गासप्तशत्यां1।55ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा। बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति इत्युक्तम्। ननु सत्सङ्गेन श्रीमद्वाक्येन वा कथं न ते यजन्ति तत्राहुः। भूतानि प्रकृतिं स्वाधिष्ठानमेव यान्ति। एतदर्थमेव नपुंसकत्वमुक्तम्। निग्रहः सत्सङ्गादीनां किं करिष्यति अकिञ्चित्करेष्वित्यर्थः।
Sri RamanujaSanskrit Commentary+
प्रकृतिविविक्तम् ईदृशम् आत्मस्वरूपम् तदेव सर्वदानुसन्धेयम् इति च शास्त्राणि प्रतिपादयन्ति इति ज्ञानवान् अपि स्वस्याः प्रकृतेः प्राचीनवासनायाः सदृशं प्राकृतविषयेषु एव चेष्टते कुतः प्रकृतिं यान्ति भूतानि अचित्संसृष्टा जन्तवः अनादिकालप्रवृत्तवासनाम् एव यान्ति तानि वासनानुयायीनि भूतानि शास्त्रकृतो निग्रहः किं करिष्यति।प्रकृत्यनुयायित्वप्रकारम् आह
Sri ShankaracharyaSanskrit Commentary+
सदृशम् अनुरूपं चेष्टते चेष्टां करोति। कस्य स्वस्याः स्वकीयायाः प्रकृतेः। प्रकृतिर्नाम पूर्वकृतधर्माधर्मादिसंस्कारः वर्तमानजन्मादौ अभिव्यक्तः सा प्रकृतिः। तस्याः सदृशमेव सर्वो जन्तुः ज्ञानवानपि चेष्टते किं पुनर्मूर्खः। तस्मात् प्रकृतिं यान्ति अनुगच्छन्ति भूतानि प्राणिनः। निग्रहः निषेधरूपः किं करिष्यति मम वा अन्यस्य वा।।यदि सर्वो जन्तुः आत्मनः प्रकृतिसदृशमेव चेष्टते न च प्रकृतिशून्यः कश्चित् अस्ति ततः पुरुषकारस्य विषयानुपपत्तेः शास्त्रानर्थक्यप्राप्तौ इदमुच्यते
Sri Sridhara SwamiSanskrit Commentary+
ननु तर्हि महाफलत्वादिन्द्रियाणि निगृह्य निष्कामाः सन्तः सर्वेऽपि स्वधर्ममेव किं नानुतिष्ठन्ति तत्राह सदृशमिति। प्रकृतिः प्राचीनकर्मसंस्काराधीनस्वभावः स्वस्याः स्वकीयायाः प्रकृतेः स्वभावस्य सदृशमनुरूपमेव गुणदोषज्ञानवानपि चेष्टते किं पुनर्वक्तव्यमज्ञश्चेष्टत इति। तस्माद्भूतानि सर्वेऽपि प्राणिनः प्रकृतिं यान्त्यनुवर्तन्ते। एवं सति इन्द्रियनिग्रहः किं करिष्यति प्रकृतेर्बलिष्ठत्वादित्यर्थः।
Sri VallabhacharyaSanskrit Commentary+
ननु तर्हि सर्वे बुधा महाफलत्वात्त्वन्मतमेव किमिति नानुतिष्ठन्ति तत्राह सदृशमिति। कैमुत्येनाह ज्ञानवानिति। शास्त्रीयं ज्ञानं सात्विकं तद्वानपि स्वस्याः परिणतायाः प्रकृतेरनुरूपं चेष्टते। चेष्टायां प्रकृतिरेवानुगुणहेतुः। प्रकृतिमोहित एवाहमित्यभिज्ञ इति मनुते। न परोक्तमनुसन्धत्ते किं पुनर्वक्तव्यमज्ञ एवं भवतीति अतो भूतानि सर्वाणि सात्विकराजसतामसानि स्वभावमनुवर्त्तन्ते वायुं तृणवत्। तत्र निग्रहः शिक्षणं ऐन्द्रियो वा किं करिष्यति प्रकृतेः प्रबलत्वादित्यर्थः।
Vedantadeshikacharya VenkatanathaSanskrit Commentary+
उत्तरप्रघट्टकसङ्गत्यर्थं प्रतिपत्तिसौकर्यार्थं च पूर्वोक्तं सङ्कलय्य दर्शयति एवमिति। मुक्तानां कर्तृत्वस्य गुणाधीनत्वाभावात्प्रकृतिसंसर्गिण इत्युक्तम्। ज्ञानयोगादनादरहेतुभूतदुश्शकत्वादिसमर्थनपरमनन्तरप्रकरणमित्यभिप्रायेणाह अतः परमिति।नानुतिष्ठन्ति इत्यस्य हेतुरपिसदृशं इत्यादिनाऽभिप्रेतः।ज्ञानवानपीत्यत्र न तावल्लौकिकज्ञानमात्रमुच्यते तस्य प्रकृत्यनुकूलत्वप्रवृत्तिविरोधित्वाभावेनापिशब्दानन्वयात्। नाप्यात्मसाक्षात्कारपर्यन्तं ज्ञानं तस्यामवस्थायां प्रकृत्यनुवर्तित्वप्रसङ्गाभावात्। अतो यदालम्ब्य ज्ञानयोगे प्रवर्तितुमुत्सहते तज्ज्ञानमिह विवक्षितम् तच्च शास्त्रजन्यं यथावस्थितात्मतत्त्वज्ञानमित्यभिप्रायेणाहप्रकृतिविविक्तमिति।ईदृशमिति यथावस्थितपरशेषत्वादिविशिष्टस्वरूपनिर्देशः।तदेवेति विषयानुभवव्यवच्छेदः।सर्वदेति आफलावाप्तेरित्यर्थः। स्वस्याः प्रातिस्विक्या इत्यर्थः। चेतनप्रवृत्तिरूपचेष्टाया असाधारणकारणं हि रागद्वेषौ तौ चानन्तरश्लोकेऽभिधीयेते तन्मूलं च प्राचीनवासनैव। अतोऽत्र प्रकृतिशब्देन स्वभावव्यपदेशार्हानादिवासनैव विवक्षितेत्यभिप्रायेणोक्तं प्राचीनवासनाया इति।सदृशं इत्यनेनाभिप्रेतमानुरूप्यमाह प्राकृतविषयेष्विति शब्दादिविषयवासनया पुनरपि तत्रैव प्रवर्तत इत्यर्थः।कुत इति। ज्ञानवांश्चेत् ज्ञानानुरूपं चेष्टताम् कुतः प्रकृत्यनुरूपं चेष्टते इत्यर्थः। अत्रोत्तरंप्रकृतिं यान्ति भूतानि इति। पुनरुक्तिशङ्कां परिहरन्नुत्तरत्वं विवृणोति अचिदिति। अचित्संसृष्टा जन्तव इति भूतशब्दार्थः। अनादिकालप्रवृत्ताचित्संसर्गकृतापरोक्षाभङ्गुरदेहात्मभ्रमजनितामत्यन्तप्रपञ्चितां वासनामद्यतनपरोक्षशास्त्रजन्यज्ञानं न सहसैव निरोद्धुं क्षममित्यभिप्रायः। तदेव विवृणोति तानीति।निग्रह इति नियमनमित्यर्थः। अत्र मम वाऽन्यस्य वेति निग्रहकर्त्रध्याहारो न युक्तःअनिच्छन्नपि 3।36 इत्यादिप्राकरणिकार्थानुसारेण शास्त्रकृतत्वमेवोचितम्।किं करिष्यतीति न किञ्चन किञ्चिदपि निरोद्धुं शक्यमित्यर्थः।