श्लोक · Shlok 10
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः | अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥
sahayajñāḥ prajāḥ sṛṣṭvā purovāca prajāpatiḥ. anena prasaviṣyadhvameṣa vo.astviṣṭakāmadhuk.
Translation · अर्थ
English
The Creator, having in the beginning (of creation) created mankind together with sacrifice, said, "By this shall ye propagate; let this be the milch cow of your desires (the cow which yields all the desired objects)."
Sūtradhāra Vichār
Classical commentaries
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A.C. Bhaktivedanta Swami PrabhupadaEnglish Commentary+
The material creation by the Lord of creatures (Viṣṇu) is a chance offered to the conditioned souls to come back home – back to Godhead. All living entities within the material creation are conditioned by material nature because of their forgetfulness of their relationship to Viṣṇu, or Kṛṣṇa, the Supreme Personality of Godhead. The Vedic principles are to help us understand this eternal relation, as it is stated in the Bhagavad-gītā: vedaiś ca sarvair aham eva vedyaḥ. The Lord says that the purpose of the Vedas is to understand Him. In the Vedic hymns it is said: patiṁ viśvasyātmeśvaram. Therefore, the Lord of the living entities is the Supreme Personality of Godhead, Viṣṇu. In the Śrīmad-Bhāgavatam also (2.4.20) Śrīla Śukadeva Gosvāmī describes the Lord as pati in so many ways: śriyaḥ patir yajña-patiḥ prajā-patir dhiyāṁ patir loka-patir dharā-patiḥ patir gatiś cāndhaka-vṛṣṇi-sātvatāṁ prasīdatāṁ me bhagavān satāṁ patiḥ The prajā-pati is Lord Viṣṇu, and He is the Lord of all living creatures, all worlds, and all beauties, and the protector of everyone. The Lord created this material world to enable the conditioned souls to learn how to perform yajñas (sacrifices) for the satisfaction of Viṣṇu, so that while in the material world they can live very comfortably without anxiety, and after finishing the present material body they can enter into the kingdom of God. That is the whole program for the conditioned soul. By performance of yajña, the conditioned souls gradually become Kṛṣṇa conscious and become godly in all respects. In the Age of Kali, the saṅkīrtana-yajña (the chanting of the names of God) is recommended by the Vedic scriptures, and this transcendental system was introduced by Lord Caitanya for the deliverance of all men in this age. Saṅkīrtana-yajña and Kṛṣṇa consciousness go well together. Lord Kṛṣṇa in His devotional form (as Lord Caitanya) is mentioned in the Śrīmad-Bhāgavatam (11.5.32) as follows, with special reference to the saṅkīrtana-yajña: kṛṣṇa-varṇaṁ tviṣākṛṣṇaṁ sāṅgopāṅgāstra-pārṣadam yajñaiḥ saṅkīrtana-prāyair yajanti hi su-medhasaḥ “In this Age of Kali, people who are endowed with sufficient intelligence will worship the Lord, who is accompanied by His associates, by performance of saṅkīrtana-yajña. ” Other yajñas prescribed in the Vedic literatures are not easy to perform in this Age of Kali, but the saṅkīrtana-yajña is easy and sublime for all purposes, as recommended in Bhagavad-gītā also.
Swami SivanandaEnglish Commentary+
सहयज्ञाः together with sacrifice? प्रजाः mankind? सृष्ट्वा having created? पुरा in the beginning? उवाच said? प्रजापतिः Prajapati? अनेन by this? प्रसविष्यध्वम् shall ye propagate? एषः this? वः your? अस्तु let be? इष्टकामधुक् milch cow of desires.Commentary Prajapati is the Creator or Brahma. Kamadhuk is another name for the cow Kamadhenu. Kamadhenu is the cow of Indra from which everyone can milk whatever one desires. (Cf.VIII.4IX.2427X.25).
Swami ChinmayanandaHindi Commentary+
स्वयं सृष्टिकर्त्ता प्रजापति पंचमहाभूतों की सृष्टि रचकर अन्य प्राणियों के साथ मनुष्य को भी कर्म करने और फल पाने के लिये उत्पन्न करते हैं। उस समय वे यज्ञ को भी बनाते हैं अर्थात् उसका उपदेश देते हैं। यज्ञ का अर्थ है समर्पण बुद्धि और सेवा भाव से किये हुये कर्म। प्रकृति में सर्वत्र यज्ञ की भावना स्पष्ट दिखाई देती है। सूर्य प्रकाशित होता है और चन्द्रमा प्रगट होता है समुद्र स्पन्दित होता है पृथ्वी प्राणियों को धारण करती है ये सब मातृभाव से तथा यज्ञ की भावना से कर्म करते हैं जिनमें रंचमात्र भी आसक्ति नहीं होती।ब्रह्माण्ड की शक्तियाँ और प्राकृतिक घटना चक्र अपने आप सब की सेवा में संलग्न रहता है। जगत् में जीवन के प्रादुर्भाव के पूर्व ही प्रकृति ने उसके लिये उचित क्षेत्र निर्माण कर रखा था। जब विभिन्न स्तरों पर जीवन का विकास होता है तब भी हम प्रकृति में सर्वत्र चल रहा यज्ञ कर्म देख सकते हैं जिसके कारण सबका अस्तित्व बना रहता है और विकास होता रहता है।उपर्युक्त सिद्धांत को काव्यात्मकभाषा में यह अर्थ गर्भित श्लोक प्रस्तुत करता है। सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा जी ने सेवा की भावना तथा यज्ञ करने की क्षमता के साथ जगत् की रचना की। मानो उन्होंने घोषणा की इस यज्ञ में तुम वृद्धि को प्राप्त हो यह तुम्हारे लिये कामधेनु सिद्ध हो। पौराणिक कथाओं के अनुसार कामधेनु नामक गाय वशिष्ट ऋषि के पास थी जो सभी इच्छाओं की पूर्ति करती थी। इसलिये इस शब्द का अर्थ इतना ही है कि यदि मनुष्य सहयोग और अनुशासन में रह कर अनासक्ति और त्याग की भावना से कर्म करने में तत्पर रहे तो उसके लिये कोई लक्ष्य अप्राप्य नहीं हो सकता।यज्ञ से इसका कैसे सम्पादन किया जा सकता है
Swami RamsukhdasHindi Commentary+
व्याख्या--'सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः'--ब्रह्माजी प्रजा (सृष्टि) के रचयिता एवं उसके स्वामी हैं; अतः अपने कर्तव्यका पालन करनेके साथ वे प्रजाकी रक्षा तथा उसके कल्याणका विचार करते रहते हैं। कारण कि जो जिसे उत्पन्न करता है, उसकी रक्षा करना उसका कर्तव्य हो जाता है। ब्रह्माजी प्रजाकी रचना करते, उसकी रक्षामें तत्पर रहते तथा सदा उसके हितकी बात सोचते हैं। इसलिये वे 'प्रजापति' कहलाते हैं। सृष्टि अर्थात् सर्गके आरम्भमें ब्रह्माजीने कर्तव्य-कर्मोंकी योग्यता और विवेक-सहित मनुष्योंकी रचना की है (टिप्पणी प0 128)। अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितिका सदुपयोग कल्याण करनेवाला है। इसलिये ब्रह्माजीने अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिका सदुपयोग करनेका विवेक साथ देकर ही मनुष्योंकी रचना की है।सत्- असत् का विचार करनेमें पशु, पक्षी, वृक्ष आदिके द्वारा स्वाभाविक परोपकार (कर्तव्यपालन) होता है; किन्तु मनुष्यको तो भगवत्कृपासे विशेष विवेक-शक्ति मिली हुई है। अतः यदि वह अपने विवेकको महत्त्व देकर अकर्तव्य न करे तो उसके द्वारा भी स्वाभाविक लोक-हितार्थ कर्म हो सकते हैं।देवता, ऋषि, पितर, मनुष्य तथा अन्य पशु, पक्षी, वृक्ष आदि सभी प्राणी 'प्रजा' हैं। इनमें भी योग्यता, अधिकार और साधनकी विशेषताके कारण मनुष्यपर अन्य सब प्राणियोंके पालनकी जिम्मेवारी है। अतः यहाँ 'प्रजाः' पद विशेषरूपसे मनुष्योंके लिये ही प्रयुक्त हुआ है।कर्मयोग अनादिकालसे चला आ रहा है। चौथे अध्यायके तीसरे श्लोकमें 'पुरातनः' पदसे भी भगवान् कहते हैं कि यह कर्मयोग बहुत कालसे प्रायः लुप्त हो गया था, जिसको मैंने तुम्हें फिरसे कहा है। उसी बातको यहाँ भी 'पुरा' पदसे वे दूसरी रीतिसे कहते हैं कि 'मैंने ही नहीं प्रत्युत ब्रह्माजीने भी सर्गके आदिकालमें कर्तव्य-सहित प्रजाको रचकर उनको उसी कर्मयोगका आचरण करनेकी आज्ञा दी थी। तात्पर्य यह है कि कर्मयोग-=-(निःस्वार्थभावसे कर्तव्य-कर्म करने) की परम्परा अनादिकालसे ही चली आ रही है। यह कोई नयी बात नहीं है।'चौथे अध्यायमें (चौबीसवेंसे तीसवें श्लोकतक) परमात्मप्राप्तिके जितने साधन बताये गये हैं, वे सभी 'यज्ञ' के नामसे कहे गये हैं; जैसे- द्रव्ययज्ञ, तपयज्ञ, योगयज्ञ, प्राणायाम आदि। प्रायः 'यज्ञ' शब्दका अर्थ हवनसे सम्बन्ध रखनेवाली क्रियाके लिये ही प्रसिद्ध है; परन्तु गीतामें 'यज्ञ' शब्द शास्त्रविधिसे की जानेवाली सम्पूर्ण विहित क्रियाओंका वाचक भी है। अपने वर्ण, आश्रम, धर्म, जाति, स्वभाव, देश, काल आदिके अनुसार प्राप्त कर्तव्य-कर्म 'यज्ञ' के अन्तर्गत आते हैं। दूसरेके हितकी भावनासे किये जानेवालेसब कर्म भी 'यज्ञ' ही हैं। ऐसे यज्ञ-(कर्तव्य-) का दायित्व मनुष्यपर पर ही है। 'अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्' (टिप्पणी प0 129.1)--ब्रह्माजी मनुष्योंसे कहते हैं कि तुमलोग अपने-अपने कर्तव्य-पालनके द्वारा सबकी वृद्धि करो, उन्नति करो! ऐसा करनेसे तुमलोगोंको कर्तव्य-कर्म करनेमें उपयोगी सामग्री प्राप्त होती रहे, उसकी कभी कमी न रहे।अर्जुनकी कर्म न करनेमें जो रुचि थी, उसे दूर करनेके लिये भगवान् कहते हैं कि प्रजापति ब्रह्माजीके वचनोंसे भी तुम्हें कर्तव्य-कर्म करनेकी शिक्षा लेनी चाहिये। दूसरोंके हितके लिये कर्तव्य-कर्म करनेसे ही तुम्हारी लौकिक और पारलौकिक उन्नति हो सकती है। निष्कामभावसे केवल कर्तव्य-पालनके विचारसे कर्म करनेपर मनुष्य मुक्त हो जाता है और सकामभावसे कर्म करनेपर मनुष्य बन्धनमें पड़ जाता है। प्रस्तुत प्रकरणमें निष्कामभावसे किये जानेवाले कर्तव्य-कर्मका विवेचन चल रहा है। अतः यहाँ 'इष्टकाम' पदका अर्थ 'इच्छित भोग-सामग्री' (जो सकामभावका सूचक है) लेना उचित प्रतीत नहीं होता। यहाँ इस पदका अर्थ है--यज्ञ (कर्तव्य-कर्म) करनेकी आवश्यक सामग्री (टिप्पणी प0 129.2)।कर्मयोगी दूसरोंकी सेवा अथवा हित करनेके लिये सदा ही तत्पर रहता है। इसलिये प्रजापति ब्रह्माजीके विधानके अनुसार दूसरोंकी सेवा करनेकी सामग्री, सामर्थ्य और शरीर-निर्वाहकी आवश्यक वस्तुओंकी उसे कभी कमी नहीं रहती। उसको ये उपयोगी वस्तुएँ सुगमतापूर्वक मिलती रहती हैं। ब्रह्माजीके विधानके अनुसार कर्तव्य-कर्म करनेकी सामग्री जिस-जिसको, जो-जो भी मिली हुई है, वह कर्तव्य-पालन करनेके लिये उस-उसको पूरी-की-पूरी प्राप्त है। कर्तव्य-पालनकी सामग्री कभी किसीके पास अधूरी नहीं होती। ब्रह्माजीके विधानमें कभी फरक नहीं पड़ सकता; क्योंकि जब उन्होंने कर्तव्य-कर्म करनेका विधान निश्चित किया है, तब जितनेसे कर्तव्यका पालन हो सके, उतनी सामग्री देना भी उन्हींपर निर्भर है।वास्तवमें मनुष्यशरीर भोग भोगनेके लिये है ही नहीं-- 'एहि तन कर फल बिषय न भाई' (मानस 7। 44। 1)। इसीलिये सांसारिक सुखोंको भोगो'--ऐसी आज्ञा या विधान किसी भी सत्-शास्रमें नहीं है। समाज भी स्वच्छन्द भोग भोगनेकी आज्ञा नहीं देता। इसके विपरीत दूसरोंको सुख पहुँचानेकी आज्ञा या विधान शास्त्र और समाज दोनों ही देते हैं। जैसे, पिताके लिये यह विधान तो मिलता है कि वह पुत्रका पालन-पोषण करे, पर यह विधान कहीं भी नहीं मिलता कि पुत्रसे पिता सेवा ले ही। इसी प्रकार पुत्र, पत्नी आदि अन्य सम्बन्धोंके लिये भी समझना चाहिये।कर्मयोगी सदा देनेका ही भाव रखता है, लेनेका नहीं; क्योंकि लेनेका भाव ही बाँधनेवाला है। लेनेका भाव रखनेसे कल्याणप्राप्तिमें बाधा लगनेके साथ ही सांसारिक पदार्थोंकी प्राप्तिमें भी बाधा उपस्थित हो जाती है। प्रायः सभीका अनुभव है कि संसारमें लेनेका भाव रखनेवालेको कोई देना नहीं चाहता। इसलिये ब्रह्माजी कहते हैं कि बिना कुछ चाहे, निःस्वार्थभावसे कर्तव्य-कर्म करनेसे ही मनुष्य अपनी उन्नति (कल्याण) कर सकता है। 'देवान् भावयतानेन'--यहाँ 'देव' शब्द उपलक्षक है; अतः इस पदके अन्तर्गत मनुष्य, देवता, ऋषि, पितर आदि समस्त प्राणियोंको समझना चाहिये। कारण कि कर्मयोगीका उद्देश्य अपने कर्तव्य-कर्मोंसे प्राणिमात्रको सुख पहँचाना रहता है। इसलिये यहाँ ब्रह्माजी सम्पूर्ण प्राणियोंकी उन्नतिके लिये मनुष्योंको अपने कर्तव्य-कर्मरूप यज्ञके पालनका आदेश देते हैं। अपने-अपने कर्तव्यका पालन करनेसे मनुष्यका स्वतः कल्याण हो जाता है (गीता 18। 45)। कर्तव्य-कर्मका पालन करनेके उपदेशके पूर्ण अधिकारी मनुष्य ही हैं। मनुष्योंको ही कर्म करनेकी स्वतन्त्रता मिली हुई है; अतः उन्हें इस स्वतन्त्रताका सदुपयोग करना चाहिये।'ते देवा भावयन्तु वः'-- जैसे वृक्ष, लता आदिमें स्वाभाविक ही फूल-फल लगते हैं; परन्तु यदि उन्हें खाद और पानी दिया जाय तो उनमें फूलफल विशेषतासे लगते हैं। ऐसे ही यजन-पूजनसे देवताओंकी पुष्टि होती है जिससे देवताओंके काम विशेष न्यायप्रद होते हैं। परन्तु जब मनुष्य अपने कर्तव्यकर्मोंके द्वारा देवाताओंका यजन-पूजन नहीं करते, तब देवताओंको पुष्टि नहीं मिलती, जिससे उनमें अपने कर्तव्यका पालन करनेमें कमी आ जाती है। उनके कर्तव्य-पालनमें कमी आनेसे ही संसारमें विप्लव अर्थात् अनावृष्टि-अतिवृष्टि आदि होते हैं।'परस्परं भावयन्तः'--इन पदोंका अर्थ यह नहीं समझना चाहिये कि दूसरा हमारी सेवा करे तो हम उसकी सेवा करें, प्रत्युत यह समझना चाहिये कि दूसरा हमारी सेवा करे या न करे हमें तो अपने कर्तव्यके द्वारा उसकी सेवा करनी ही है। दूसरा क्या करता है, क्या नहीं करता; हमें सुख देता या दुःख, इन बातोंसे हमें कोई मतलब नहीं रखना चाहिये; क्योंकि दूसरोंके कर्तव्यको देखनेवाला अपने कर्तव्यसे च्युत हो जाता है। परिणामस्वरूप उसका पतन हो जाता है। दूसरोंसे कर्तव्यका पालन करवाना अपने अधिकारकी बात भी नहीं है। हमें सबका हित करनेके लिये केवल अपने कर्तव्यका पालन करना है और उसके द्वारा सबको सुख पहुँचाना है। सेवा करनेमें अपनी समझ सामर्थ्य, समय और सामग्रीको अपने लिये थोड़ी-सी भी बचाकर नहीं रखनी है। तभी जडतासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होगा।हमारे जितने भी सांसारिक सम्बन्धी--माता-पिता, स्त्री-पुत्र भाई-भौजाई आदि हैं, उन सबकी हमें सेवा करनी है। अपना सुख लेनेके लिये ये सम्बन्ध नहीं हैं। हमारा जिनसे जैसा सम्बन्ध है, उसीके अनुसार उनकी सेवा करना, मर्यादाके अनुसार उन्हें सुख पहुँचाना हमारा कर्तव्य है। उनसे कोई आशा रखना और उनपर अपना अधिकार मानना बहुत बड़ी भूल है। हम उनके ऋणी हैं और ऋण उतारनेके लिये उनके यहाँ हमारा जन्म हुआ है। अतः निःस्वार्थभावसे उन सम्बन्धियोंकी सेवा करके हम अपना ऋण चुका दें--यह हमारा सर्वप्रथम आवश्यक कर्तव्य है। सेवा तो हमें सभीकी करनी है; परन्तु जिनकी हमारेपर जिम्मेवारी है, उन सम्बन्धियोंकी सेवा सबसे पहले करनी चाहिये।शरीर, इन्द्रयाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ आदि अपने नहीं हैं--और अपने लिये भी नहीं हैं यह सिद्धान्त है। अतः अपने-अपने कर्तव्यका पालन करनेसे स्वतः एक-दूसरेकी उन्नति होती है। कर्तव्य और अधिकारसम्बन्धी मार्मिक बात कर्मयोग तभी होता है, जब मनुष्य अपने कर्तव्यके पालनपूर्वक दूसरेके अधिकारकी रक्षा करता है। जैसे, माता-पिताकी सेवा करना पुत्रका कर्तव्य है और माता-पिताका अधिकार है। जो दूसरेका अधिकार होता है, वही हमारा कर्तव्य होता है। अतः प्रत्येक मनुष्यको अपने कर्तव्य-पालनके द्वारा दूसरेके अधिकारकी रक्षा करनी है तथा दूसरेका कर्तव्य नहीं देखना है। दूसरेका कर्तव्य देखनेसे मनुष्य स्वयं कर्तव्यच्युत हो जाता है; क्योंकि दूसरेका कर्तव्य देखना हमारा कर्तव्य नहीं है। तात्पर्य है कि दूसरेका हित करना है--यह हमारा कर्तव्य है और दूसरेका अधिकार है। यद्यपि अधिकार कर्तव्यके ही अधीन है, तथापि मनुष्यको अपना अधिकार देखना ही नहीं हैं, प्रत्युत अपने अधिकारका त्याग करना है। केवल दूसरेके अधिकारकी रक्षाके लिये अपने कर्तव्यका पालन करना है। दूसरेका कर्तव्य देखना तथा अपना अधिकार जमाना लोक और परलोकमें महान् पतन करनेवाला है। वर्तमान समयमें घरोंमें, समाजमें जो अशान्ति, कलह, संघर्ष देखनेमें आ रहा है, उसमें मूल कारण यही है कि लोग अपने अधिकारकी माँग तो करते हैं, पर अपने कर्तव्यका पालन नहीं करते! इसलिये ब्रह्माजी देवताओं और मनुष्योंको उपदेश देते हैं कि एक-दूसरेका हित करना तुमलोगोंका कर्तव्य है।'श्रेयः परमवाप्स्यथ'-- प्रायः ऐसी धारणा बनी हुई है कि यहाँ परम कल्याणकी प्राप्तिका कथन अतिशयोक्ति है, पर वास्तवमें ऐसा नहीं है। अगर इसमें किसीको सन्देह हो तो वह ऐसा करके खुद देख सकता है। जैसे धरोहर रखनेवालेकी धरोहर उसे वापस कर देनेसे धरोहर रखनेवालेसे तथा उस धरोहरसे हमारा किसी प्रकारका सम्बन्ध नहीं रहता, ऐसे ही संसारकी वस्तु संसारकी सेवामें लगा देनेसे संसार और संसारकी वस्तुसे हमारा कोई सम्बन्ध नहीं रहता। संसारसे माने हुए सम्बन्धका विच्छेद होते ही चिन्मयताका अनुभव हो जाता है। अतः प्रजापति ब्रह्माजीके वचनोंमें अतिशयोक्तिकी कल्पना करना अनुचित है। यह सिद्धान्त है कि जबतक मनुष्य अपने लिये कर्म करता है, तबतक उसके कर्मकी समाप्ति नहीं होती और वह कर्मोंसे बँधता ही जाता है। कृतकृत्य वही होता है, जो अपने लिये कभी कुछ नहीं करता। अपने लिये कुछ भी नहीं करनेसे पापका आचरण भी नहीं होता; क्योंकि पापका आचरण कामनाके कारण ही होता है (3। 37)। अतः अपना कल्याण चाहनेवाले साधकको चाहिये कि वह शास्त्रोंकी आज्ञाके अनुसार फलकी इच्छा और आसक्तिका त्याग करके कर्तव्य-कर्म करनेमें तत्पर हो जाय, फिर कल्याण तो स्वतःसिद्ध है।अपनी कामनाका त्याग करनेसे संसारमात्रका हित होता है। जो अपनी कामना-पूर्तिके लिये आसक्तिपूर्वक भोग भोगता है, वह स्वयं तो अपनी हिंसा (पतन) करता ही है, साथ ही जिनके पास भोग-सामग्रीका अभाव है, उनकी भी हिंसा करता है अर्थात् दुःख देता है। कारण कि भोग-सामग्रीवाले मनुष्यको देखकर अभावग्रस्त मनुष्यको उस भोग-सामग्रीके अभावका दुःख होना स्वाभाविक है। इस प्रकार स्वयं सुख भोगनेवाला व्यक्ति हिंसासे कभी बच नहीं सकता। ठीक इसके विपरीत पारमार्थिक मार्गपर चलनेवाले व्यक्तिको देखकर दूसरोंको स्वतः शान्ति मिलती है, क्योंकि पारमार्थिक सम्पत्तिपर सबका समान अधिकार है। निष्कर्ष यह निकला कि मनुष्य कामना-आसक्तिका त्याग करके अपने कर्तव्य-कर्मका पालन करता रहे तो ब्रह्माजीके कथनानुसार वह परम कल्याणको अवश्य ही प्राप्त हो जायग। इसमें कोई सन्देह नहीं है।यहाँ परम कल्याणकी प्राप्ति मुख्यतासे मनुष्योंके लिये ही बतायी है, देवताओंके लिये नहीं। कारण कि देवयोनि अपना कल्याण करनेके लिये नहीं बनायी गयी है। मनुष्य जो कर्म करता है, उन कर्मोंके अनुसार फल देने, कर्म करनेकी सामग्री देने तथा अपने-अपने शुभ कर्मोंका फल भोगनेके लिये देवता बनाये गये हैं। वे निष्कामभावसे कर्म करनेकी सामग्री देते हों, ऐसी बात नहीं है। परन्तु उन देवताओंमें भी अगर किसीमें अपने कल्याणकी इच्छा हो जाय, तो उसका कल्याण होनेमें मना नहीं है अर्थात् अगर कोई अपना कल्याण करना चाहे, तो कर सकता है। जब पापी-से-पापी मनुष्यके लिये भी उद्धार करनेकी मनाही नहीं है, तो फिर देवताओंके लिये (जो कि पुण्ययोनि है) अपना उद्धार करनेकी मनाही कैसे हो सकती है? ऐसा होनेपर भी देवताओंका उद्देश्य भोग भोगनेका ही रहता है, इसलिये उनमें प्रायः अपने कल्याणकी इच्छा नहीं होती।
Sri Abhinav GuptaSanskrit Commentary+
सहेति। प्रजापतिः परमात्मा प्रजाः सहैव कर्मभिः ससर्ज। उक्तं च (N omits उक्तं च) तेन प्रजानां कर्मभ्य एव प्रसवः सन्तानः। एतान्येव च इष्टं संसारं मोक्षं वा दास्यन्ति संगात्संसारं मुक्तसंगत्वान्मोक्षम् इति।
Sri AnandgiriSanskrit Commentary+
नित्यस्य कर्मणो नैमित्तिकसहितस्याधिकृतेन कर्तव्यत्वे हेत्वन्तरपरत्वेनानन्तरश्लोकमवतारयति इतश्चेति। कथं पुनरनेन यज्ञेन वृद्धिरस्माभिः शक्या कर्तुमित्याशङ्क्याह एष इति।
Sri DhanpatiSanskrit Commentary+
इतश्च हेतोरधिकृतेन कर्म कर्तव्यं प्रजापतिर्ब्रह्मा सर्गादौ यज्ञसहिताः त्रैवर्णिकाः प्रजाः सृष्ट्वोवाच। अनेन यज्ञेन कर्मणा प्रसविष्यध्वं वृद्धिं लभत्वं उत्पत्तिं कुरुध्वम्। वृद्य्धादिहेतुत्वमस्यास्तीत्याह। एष यज्ञो वो युष्माकमभिप्रेतभोगप्रदो भवतु।
Sri JayatrithaSanskrit Commentary+
।।3.10 3.11।।सहयज्ञाः इत्यादेर्न प्रकृते सङ्गतिर्दृश्यते अत आह अत्रेति। वर्णाश्रमोचितस्य कर्मणः सर्वथा कर्तव्यत्वे स्तुतिर्निन्दा परकृतिः पुराकल्पोऽर्थवादः।
Sri MadhavacharyaSanskrit Commentary+
।।3.10 3.11।।अत्रार्थवादमाह सहयज्ञा इति।
Sri Madhusudan SaraswatiSanskrit Commentary+
प्रजापतिवचनादप्यधिकृतेन कर्म कर्तव्यमित्याह सहयज्ञा इत्यादिचतुर्भिः। सह यज्ञेन विहितकर्मकलापेन वर्तन्ते इति सहयज्ञाः। कर्माधिकृता इति यावत्।वोपसर्जनस्य इति पक्षे सादेशाभावः। प्रजाः त्रीन्वर्णान् पुरा कल्पादौ सृष्ट्वोवाच प्रजानां पतिः स्रष्टा। किमुवाचेत्याह अनेने यज्ञेन स्वाश्रमोचितधर्मेण प्रसविष्यध्वं प्रसूयध्वम्। प्रसवो वृद्धिः। उत्तरोत्तरामभिवृद्धिं लभध्वमित्यर्थः। कथमनेन वृद्धिः स्यादत आह एष यज्ञाख्यो धर्मो वो युष्माकं इष्टकामधुक्इष्टानभिमतान्कामान्काम्यानि फलानि दोग्धि प्रापयतीति तथा। अभीष्टभोगप्रदोऽस्त्वित्यर्थः। अत्र यद्यपि यज्ञग्रहणमावश्यककर्मोपलक्षणार्थं अकरणे प्रत्यवायस्याग्रे कथनात्। काम्यकर्मणां च प्रकृते प्रस्तावो नास्त्येवमा कर्मफलहेतुर्भूः इत्यनेन निराकृतत्वात् तथापि नित्यकर्मणामप्यानुषङ्गिकफलसद्भावात्एष वोऽस्त्विष्टकामधुक् इत्युपपद्यते। तथाचापस्तम्बः स्मरति तद्यथाम्रे फलार्थे निमिते छायागन्धावनूत्पद्येते एवं धर्मं चर्यमाणमर्था अनूत्पद्यन्ते नोचेदनूत्पद्यन्ते न धर्महानिर्भवति इति। फलसद्भावेऽपि तदभिसंध्यनभिसंधिभ्यां काम्यनित्ययोर्विशेषः। अनभिसंहितस्यापि वस्तुस्वभावादुत्पत्तौ न विशेषः। विस्तरेण चाग्रे प्रतिपादयिष्यते।
Sri NeelkanthSanskrit Commentary+
एतदेवार्थवादेन द्रढयति सहेति। यज्ञैः सहेति सहयज्ञाः।वोपसर्जनस्य इति पक्षे सादेशाभावः। कर्माधिकृता इति यावत्। प्रजास्त्रैवर्णिकाः। अनेन यज्ञेन प्रसविष्यध्वं प्रसवो वृद्धिस्तां लभध्वम्। एष यज्ञो वो युष्माकमिष्टकामधुगिष्टार्थपूरकोऽस्तु।
Sri PurushottamjiSanskrit Commentary+
ननु तादृशं कर्म त्याज्यमेव चेत्त्वन्मतं तदा केनोक्तं कथमाचरति लोकः इत्याशङ्क्यैतत्कर्म प्रवृत्तिपरं मदाज्ञया प्रवृत्तिप्रवर्त्तकब्रह्मणोक्तं लोकः समाचरतीत्याह सहयज्ञा इति। प्रजापतिर्ब्रह्मा सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा प्रवृत्तिधर्मसहिताः प्रजाः सृष्ट्वा पुरा मदवतारात् पूर्वमुवाच। मत्प्रादुर्भावानन्तरं तु मया भक्तिरेवोक्तेति ज्ञापनाय पुरेत्युक्तम्। तद्वाक्यमेवाह अनेनेति। अनेन यज्ञेन प्रसविष्वध्वं प्रकर्षेण वृद्धिं प्राप्स्यथ। किञ्च एष यज्ञः वो युष्माकं इष्टकामधुक् अभीष्टफलदोऽस्तु भगवदाज्ञया ब्रह्मवाक्यं न मृषा भवतीति वरमेव दत्तवान्।
Sri RamanujaSanskrit Commentary+
पतिं विश्वरस्य आत्मेश्वरम् (तै0 ना0 11।3) इत्यादिश्रुतेः निरुपाधिकः प्रजापतिशब्दः सर्वेश्वरं विश्वस्रष्टारं विश्वात्मानं परायणं नारायणम् आह पुरा सर्गकाले स भगवान् प्रजापतिः अनादिकालप्रवृत्ताचित्संसर्गविवशा उपसंहृतनामरूपविभागाः स्वस्मिन् प्रलीनाः सकलपुरुषार्थनर्हाः चेतनेतरकल्पाः प्रजाः समीक्ष्य परमकारुणिकः तदुज्जिजीवविषया स्वाराधनभूतयज्ञनिर्वृत्तये यज्ञैः सह ताः सृष्ट्वा एवम् उवाच अनेन यज्ञेन प्रसविष्यध्वम् आत्मनो वृद्धिं कुरुध्वम्। एष वो यज्ञः परमपुरुषार्थलक्षणमोक्षाख्यस्य कामस्य तदनुगुणानां च कामानां प्रपूरयिता भवतु।कथम्
Sri ShankaracharyaSanskrit Commentary+
सहयज्ञाः यज्ञसहिताः प्रजाः त्रयो वर्णाः ताः सृष्ट्वा उत्पाद्य पुरा पूर्वं सर्गादौ उवाच उक्तवान् प्रजापतिः प्रजानां स्रष्टा अनेन यज्ञेन प्रसविष्यध्वं प्रसवः वृद्धिः उत्पत्तिः तं कुरुध्वम्। एष यज्ञः वः युष्माकम् अस्तु भवतु इष्टकामधुक् इष्टान् अभिप्रेतान् कामान् फलविशेषान् दोग्धीति इष्टकामधुक्।।कथम्
Sri Sridhara SwamiSanskrit Commentary+
प्रजापतिवचनादपि कर्मकर्तैव श्रेष्ठ इत्याह सहयज्ञा इति चतुर्भिः। यज्ञेन सह वर्तन्ते इति सहयज्ञाः यज्ञाधिकृता ब्राह्मणाद्याः प्रजाः पुरा सर्गादौ सृष्ट्वा ब्रह्मेदमुवाच। अनेन यज्ञेन प्रसविष्यध्वं प्रसूयध्वम्। प्रसवो वृद्धिः। उत्तरोत्तरामभिवृद्धिं लभध्वमित्यर्थः। तत्र हेतुः। एष यज्ञो वो युष्माकमिष्टकामधुगिष्टान्काभान्दोग्धीति तथा। अभीष्टभोगप्रदोऽस्त्वित्यर्थः। अन्न च यज्ञग्रहणमावश्यककर्मोपलक्षणार्थम्। काम्यकर्म प्रशंसा तु प्रकरणेऽसंगतापि सामान्यतोऽकर्मणः कर्मश्रेष्ठमित्येतदर्थेत्यदोषः।
Sri VallabhacharyaSanskrit Commentary+
।।3.10 3.11।।किञ्च श्रुतं च सर्गप्रकरणे यज्ञोपलक्षणकर्मसहितप्रजोत्पादनं ब्रह्मणेति कर्मणोऽवश्यकर्त्तव्यतामाह सहेति चतुर्भिः। यज्ञाधिकृताः ब्राह्मणाद्याः प्रजाः सहयज्ञाः सृष्ट्वोवाच एष यज्ञो व इष्टकामधुनिति। ज्ञानमोक्षादिहेतुत्वं प्रकारान्तरेण वरप्रदानं तदाह अस्त्विति। न चेयं काम्यकर्मप्रशंसा कामधुक्त्वेनेष्टमात्रसाधकत्वाद्यज्ञादेर्विहितस्य नियतकर्मणः अन्यथाऽक्रामितोऽपि मोक्षः स्यात् तेन सर्वपुरुषार्थहेतुत्वमुक्तं भवति तदेवाह देवानिति। अनेन यज्ञेन विष्ण्वादीन् देवान् भावयत्। तदा परं श्रेय आत्यन्तिकमवाप्स्यथेति भावः।
Vedantadeshikacharya VenkatanathaSanskrit Commentary+
उक्तमर्थद्वयंसह यज्ञैः इत्यारभ्यमोघं पार्थ स जीवति 3।16 इत्यन्तेन निन्दाप्रशंसादिभिर्द्रढयतीत्याह यज्ञशिष्टेनैवेति।सर्वपुरुषार्थसाधननिष्ठानामित्यनेनप्रजाः सृष्ट्वा इति सामान्यनिर्देशफलितमुक्तम्। अत्र प्रजापतिशब्दस्य हिरण्यगर्भादिविषयत्वव्युदासायाह पतिं विश्वस्येतीति। हिरण्यगर्भादेरपि न तु हिरण्यगर्भादिवदण्डाद्यवच्छिन्नस्येत्यर्थः। तत एवोक्तंनिरुपाधिक इति। श्रुतार्थस्वभावादपि स एव सर्वप्रजापतिरिति प्रदर्शनायसर्वेश्वरमित्यादिविशेषणोक्तिः।नारायणम् एतदखिलं नारायणशब्दवाच्यस्यैव हि नारायणानुवाकादिषु प्रतिपाद्यत इति भावः। उक्तं च जगत्पतित्वं स्रष्ट्टत्वादिकं च समुच्चित्य भगवता पराशरेणकलौ जगत्पतिं विष्णुं सर्वस्रष्टारमीश्वरम् वि.पु.6।1।50ब्र.पु.च.120।45 इति।अनुमानात्तदुद्धारं कर्तुकामः प्रजापतिः वि.पु.1।4।7 इति च वराहरूपे भगवति प्रजापतिशब्दः तेनप्रजापतिः तै.ना.1।1 इत्यादिश्रुत्यनुसारात्प्रयुक्तः। किञ्च स्वतन्त्रस्य कर्मपरतन्त्रान्प्रति नियोगो ह्ययम्। अतोऽत्रप्रजाः सृष्ट्वा इति प्रजाशब्दः सर्वान् ब्रह्मपर्यन्तान् जगदन्तर्व्यवस्थितान् कर्मजनितसंसारवशवर्तिनो यज्ञाद्यधिकारिणःप्राणिनः सङ्गृह्णाति। अतोऽत्र प्रजापतिशब्द उपक्रमस्थप्रजाशब्दानुरोधात् सङ्कोचेन तद्वैरूप्यायोगाच्च परित्यक्तरूढिरकर्मवश्यं नियोक्तारं सर्वेश्वरं नारायणमाह। तथा सृज्यसमस्तक्षेत्रज्ञविषयो ह्ययमनवच्छिन्नः प्रजाशब्दः।पुरेति प्रलयानन्तरकालाभिधानात्ततश्च सदेव सोम्येदमग्र आसीत् ৷৷. तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति छां.उ.6।2।13 सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः छां.उ.6।8।4 एको ह वै नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानः इत्यारभ्य बुद्बुदात्र्यक्षः शूलपाणिः पुरुषो जायते ৷৷. तत्र ब्रह्मा चतुर्मुखोऽजायत महो.1।1सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः मनुः1।8 इत्यादिषु हिरण्यगर्भादेरपि प्रजात्वावगमान्नारायणस्य च तज्जनकत्वावगतेःप्रजाः सृष्ट्वा इत्यनवच्छेदेन निर्दिष्टो विश्वस्य स्रष्टा नारायण एवेति स एवात्र प्रजापतिः। किञ्च तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे ऋक्सं.6।4।18।4यजुस्सं.31।7 सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरः। नामानि कृत्वाऽभिवदन्यदास्ते इति यज्ञैः सह सर्वप्रजानां स्रष्ट्टतया निर्दिष्टोऽप्यधिकारपुरुषस्यापि स्रष्टा सहस्रशीर्षत्वादिविशिष्टः परमपुरुष एव। अतोऽपिसह यज्ञैः प्रजाः सृष्ट्वा इति निर्दिष्टः प्रजापतिः विश्वस्य स्रष्टा स एव। तथासृष्टिं ततः करिष्यामि त्वामाविश्य प्रजापते वि.ध.68।51 इत्यादिवचनबलाद्धिरण्यगर्भाख्यप्रजापतिमुखेनापि विश्वस्रष्टा सर्वभूतान्तरात्मा अपहतपाप्मा दिव्यो देव एको नारायणः सु.उ.7 इति श्रुतः स एव विश्वात्मा। किञ्चात्र निर्दिश्यमानं देवानां भावनादिकं परमात्मात्मकानामेवेतिअहं हि सर्वयज्ञानाम् 9।24 इत्यादौ व्यक्तं भविष्यति यस्मिन्निदं सञ्चविचैति श्वे.उ.4।11 प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तः य.सं.31।19तै.ना.6।11 इत्यादिकंविश्वस्य स्रष्टारं विश्वात्मानमिति विशेषणाभ्यां सूचितम्। अतोऽप्यत्र विश्वात्मानं तमेवाह। तथा प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये छां.उ.8।14।1 इत्यत्र परमप्राप्यतया च प्रजापतिशब्दनिर्दिष्टोऽपि परमात्मैवेतिन च कार्ये प्रत्यभिसन्धिः ब्र.सू.4।3।14 इति सूत्रे प्रत्यपादि अतोऽपि परायणं तमेवाह। एवं सर्वेश्वरमित्यादिविशेषणैः तत्तत्प्रमाणसूचनं कृतम्। एवं श्यामैकरूपसप्तदशायातयामाज्यदैवतविष्णुविषयप्रजापतिशब्दश्रुतिरप्यनुसन्धेया।पुराशब्दस्य वचनान्वयं प्रतीतिव्युदासेन ब्रह्माद्यगोचरसृष्ट्यन्वयव्यक्त्यर्थमाह पुरा सर्गकाले इति। श्रुतिस्मृत्यादिषु सृष्टिप्रकरणप्रसिद्धिप्रकारमभिप्रैति स भगवानिति भगवच्छब्देन सृष्ट्यादिपञ्चकृत्योपयुक्तहेयप्रत्यनीककल्याणगुणविशिष्टत्वं दर्शितम्। तथा मानवे धर्मशास्त्रे प्रथमम्आसीदिदं तमोभूतम् 1।5 इति प्रलयमभिधायततः स्वयम्भूर्भगवान् 1।6 इति भगवच्छब्देन सर्वस्रष्टा निर्दिष्टः। अनन्तरं चता यदस्यायनं पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः 1।10तद्विसृष्टः स पुरुषो लोके ब्रह्मेति कीर्त्यते 1।11 इति हिरण्यगर्भाख्यप्रजापतेः स्रष्टा नारायण इत्युक्तम्।अत्र प्रजापतिरुवाच इति पराक्तया निर्देशस्तु सारथिभूतस्य स्वस्य प्रजापतिशब्दप्रतिपन्नात् स्वस्माद्भेदोपचारेणेति मन्तव्यम्। एवमुत्तरत्रापि सर्वत्र पराक्त्वनिर्देशेषु यथार्हमनुसन्धेयम्।सर्वत्र सृष्टेः संहारपूर्वकत्वदर्शनादत्रापि तथा विवक्षन् संहारस्य प्रयोजनं सृष्टेर्हेतुं चाह अनादीति। अनवरतसुखदुःखोपभोगायासपरिश्रान्तानां विश्रमार्थं अश्रान्तापथप्रवृत्तिवासनाविच्छेदार्थं चोपसंहारः। अतो न संहारे नैर्घृण्यदोषः। तादृशसुखदुःखोपभोगप्रदाने च परमात्मनित्यसङ्कल्पसिद्धजीवस्वातन्त्र्यनिबन्धनानादिकर्मप्रवाहहेतुकाचित्संसर्ग एव हेतुरिति न तत्र वैषम्यनैर्घृण्ये। सूत्रितं चवैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात्तथाहि दर्शयतिन कर्माविभागात् ब्र.सू.2।1।3435 इति चेन्नानादित्वादुपपद्यते चाप्युपलभ्यते चकृतप्रयत्नापेक्षस्तु विहितप्रतिषिद्धावैयर्थ्यादिभ्यः ब्र.सू.2।3।42 इति।उपसंहृतनामरूपविभागाः स्वस्मिन् प्रलीना इति। असद्व्यपदेश एकत्वव्यपदेशादिश्च निर्व्यूढः। नामरूपप्रहाणं स्वस्मिन् प्रलयश्च मोक्षवत्पुरुषार्थ एव स्यादित्याशङ्क्याह सकलेति। त्रिवर्गेऽप्यनर्हाः किं पुनरपवर्ग इति भावः। तत्र हेतुमाह चेतनेतरकल्पा इति। स्वप्रकाशत्वेऽप्यत्यन्तज्ञानसङ्कोचात्तत्कल्पत्वम् न तु ज्ञानविनाशात्।प्रजाः हिरण्यगर्भादिकाः समीक्ष्य सम्यगवलोक्य एतेनजायमानं हि पुरुषं यं पश्येन्मधुसूदनः म.भा.12।348।73नावेक्षसे यदि ततो भुवनान्यमूनि नालं प्रभो भवितुमेव कुतः प्रवृत्तिः। एवं निसर्गसुहृदि त्वयि सर्वजन्तोः स्वामिन्न चित्रमिदमाश्रितवत्सलत्वम् स्तो.र.10।।इत्यादिकमभिप्रेतम्। स एकाकी न रमते महो.1 इति श्रुतेःपरमकारुणिकः किल त्वम् इत्यादिस्मृतिसिद्धगुणविशेषे तात्पर्यमाह परमकारुणिक इति। अवाप्तसमस्तकामस्य जगद्व्यापारानुपपत्तिं परिहरति तदुज्जिजीवयिषयेति। कारुणिका हि स्वार्थनिरपेक्षा एव परोज्जिजीवयिषया प्रवर्तन्ते सैव प्रवृत्तिरस्य लीलाऽपीति न दोष इति भावः। यज्ञैः सहेति निर्देश उज्जीवनोपायविशेषनिष्पत्त्यर्थ इत्यभिप्रायेणाह स्वाराधनेति।यज्ञैरिति वैविध्यसूचनाय बहुवचननिर्देशे पूर्वं कृतेऽपिअनेन इत्येकवचनेन परामर्शो जात्येकत्वपर इत्यभिप्रायेणाह अनेन यज्ञेनेति।सहयज्ञाः इतिशङ्करयादवप्रकाशीयपाठस्त्वप्रासिद्धरनादृतः।प्रसविष्यध्वम् इत्यत्रषूञ् प्राणिप्रसवेषूङ् गर्भविमोचने इतिधातुद्व्येऽपि प्रजननमात्रप्रतीतिः स्यात् न च द्वादशाहादिवत् सर्वेषां यज्ञादीनां प्रजामात्रं फलम्। अतः सन्तत्युपलक्षिता स्वनिष्पाद्या समृद्धिरत्र विवक्षितेत्यभिप्रायेणाह आत्मनो वृद्धिं कुरुध्वमिति। यज्ञसाध्यः कामो निषिद्धेतरधर्माविरुद्धसमस्तकाम्यवर्गः तत्रापि मोक्षतत्साधनोपकारिषु तात्पर्यभूयस्त्वमित्यभिप्रायेण मोक्षतदनुगुणोपादानम्। रुचिवैचित्र्यज्ञापनाय इष्टशब्देन विशेषणम्। मोक्षस्येष्टकामशब्देन सङ्ग्रहायपरमपुरुषार्थलक्षणेत्युक्तम्। अवधीरितस्वर्गाय अर्जुनायोपदेशात्मा फलेषु 2।47श्रेयः परम्