श्लोक · Shlok 62
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते | सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
dhyāyato viṣayānpuṃsaḥ saṅgasteṣūpajāyate. saṅgātsañjāyate kāmaḥ kāmātkrodho.abhijāyate.
Translation · अर्थ
English
When a man thinks of the objects, attachment for them arises; from attachment desire is born; from desire anger arises.
Sūtradhāra Vichār
Classical commentaries
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A.C. Bhaktivedanta Swami PrabhupadaEnglish Commentary+
One who is not Kṛṣṇa conscious is subjected to material desires while contemplating the objects of the senses. The senses require real engagements, and if they are not engaged in the transcendental loving service of the Lord, they will certainly seek engagement in the service of materialism. In the material world everyone, including Lord Śiva and Lord Brahmā – to say nothing of other demigods in the heavenly planets – is subjected to the influence of sense objects, and the only method to get out of this puzzle of material existence is to become Kṛṣṇa conscious. Lord Śiva was deep in meditation, but when Pārvatī agitated him for sense pleasure, he agreed to the proposal, and as a result Kārtikeya was born. When Haridāsa Ṭhākura was a young devotee of the Lord, he was similarly allured by the incarnation of Māyā-devī, but Haridāsa easily passed the test because of his unalloyed devotion to Lord Kṛṣṇa. As illustrated in the above-mentioned verse of Śrī Yāmunācārya, a sincere devotee of the Lord shuns all material sense enjoyment due to his higher taste for spiritual enjoyment in the association of the Lord. That is the secret of success. One who is not, therefore, in Kṛṣṇa consciousness, however powerful he may be in controlling the senses by artificial repression, is sure ultimately to fail, for the slightest thought of sense pleasure will agitate him to gratify his desires.
Swami SivanandaEnglish Commentary+
ध्यायतः thinking? विषयान् (on) objects of the senses? पुंसः of a man? सङ्गः attachment? तेषु in them? उपजायते arises? सङ्गात् from attachment? संजायते is born? कामः desire? कामात् from desire? क्रोधः anger? अभिजायते arises.Commentary When a man thinks of the beauty and the pleasant and alluring features of the senseobjects he becomes attached to them. He then regards them as something worthy of acisition and possession and hankers after them. He develops a strong desire to possess them. Then he endeavours his level best to obtain them. When his desire is frustrated by some cause or other? anger arises in his mind. If anybody puts any obstruction in his way of obtaining the objects he hates him? fights with him and develops hostility towards hi. (Cf.II.64).
Swami ChinmayanandaHindi Commentary+
no commentary.
Swami RamsukhdasHindi Commentary+
।। व्याख्या--'ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते'-- भगवान्के परायण न होनेसे भगवान्का चिन्तन न होनेसे विषयोंका ही चिन्तन होता है। कारण कि जीवके एक तरफ परमात्मा है और एक तरफ संसार है। जब वह परमात्माका आश्रय छोड़ देता है तब वह संसारका आश्रय लेकर संसारका ही चिन्तन करता है क्योंकि संसारके सिवाय चिन्तनका कोई दूसरा विषय रहता ही नहीं। इस तरह चिन्तन करतेकरते मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति राग प्रियता पैदा हो जाती है। आसक्ति पैदा होनेसे मनुष्य उन विषयोंका सेवन करता है। विषयोंका सेवन चाहे मानसिक हो चाहे शारीरिक हो उससे जो सुख होता है उससे विषयोंमें प्रियता पैदा होती है। प्रियतासे उस विषयका बारबार चिन्तन होने लगता है। अब उस विषयका सेवन करे चाहे न करे पर विषयोंमें राग पैदा हो ही जाता है यह नियम है। 'सङ्गात्संजायते कामः'-- विषयोंमें राग पैदा होनेपर उन विषयोंको (भोगोंको) प्राप्त करनेकी कामना पैदा हो जाती है कि वे भोग वस्तुएँ मेरेको मिलें। 'कामात्क्रोधोऽभिजायते'-- कामनाके अनुकूल पदार्थोंके मिलते रहनेसे लोभ पैदा हो जाता है और कामनापूर्तिकी सम्भावना हो रही है पर उसमें कोई बाधा देता है तो उसपर क्रोध आ जाता है। कामना एक ऐसी चीज है जिसमें बाधा पड़नेपर क्रोध पैदा हो ही जाता है। वर्ण आश्रम गुण योग्यता आदिको लेकर अपनेमें जो अच्छाईका अभिमान रहता है उस अभिमानमें भी अपने आदर सम्मान आदिकी कामना रहती है उस कामनामें किसी व्यक्तिके द्वारा बाधा पड़नेपर भी क्रोध पैदा हो जाता है। कामना रजोगुणी वृत्ति है सम्मोह तमोगुणी वृत्ति है और क्रोध रजोगुण तथा तमोगुणके बीचकी वृत्ति है। कहीं भी किसी भी बातको लेकर क्रोध आता है तो उसके मूलमें कहींनकहीं राग अवश्य होता है। जैसे नीतिन्यायसे विरुद्ध काम करनेवालेको देखकर क्रोध आता है तो नीतिन्यायमें राग है। अपमानतिरस्कार करनेवालेपर क्रोध आता है तो मानसत्कारमें राग है। निन्दा करनेवालेपर क्रोध आता है तो प्रशंसामें राग है। दोषारोपण करनेवालेपर क्रोध आता है तो निर्दोषताके अभिमानमें राग है आदिआदि। 'क्रोधाद्भवति सम्मोहः'-- क्रोधसे सम्मोह होता है अर्थात् मूढ़ता छा जाती है। वास्तवमें देखा जाय तो काम क्रोध लोभ और ममता इन चारोंसे ही सम्मोह होता है जैसे (1) कामसे जो सम्मोह होता है उसमें विवेकशक्ति ढक जानेसे मनुष्य कामके वशीभूत होकर न करनेलायक कार्य भी कर बैठता है। (2) क्रोधसे जो सम्मोह होता है उसमें मनुष्य अपने मित्रों तथा पूज्यजनोंको भी उलटीसीधी बातें कह बैठता है और न करनेलायक बर्ताव भी कर बैठता है। (3) लोभसे जो सम्मोह होता है उसमें मनुष्यको सत्यअसत्य धर्मअधर्म आदिका विचार नहीं रहता और वह कपट करके लोगोंको ठग लेता है। (4) ममतासे जो सम्मोह होता है उसमें समभाव नहीं रहता प्रत्युत पक्षपात पैदा हो जाता है। अगर काम क्रोध लोभ और ममता इन चारोंसे ही सम्मोह होता है तो फिर भगवान्ने यहाँ केवल क्रोधका ही नाम क्यों लिया इसमें गहराईसे देखा जाय तो काम लोभ और ममता इनमें तो अपने सुखभोग और स्वार्थकी वृत्ति जाग्रत रहती है पर क्रोधमें दूसरोंका अनिष्ट करनेकी वृत्ति जाग्रत् रहती है। अतः क्रोधसे जो सम्मोह होता है वह काम लोभ और ममतासे पैदा हुए सम्मोहसे भी भयंकर होता है। इस दृष्टिसे भगवान्ने यहाँ केवल क्रोधसे ही सम्मोह होना बताया है। 'सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः'-- मूढ़ता छा जानेसे स्मृति नष्ट हो जाती है अर्थात् शास्त्रोंसे सद्विचारोंसे जो निश्चय किया था कि अपनेको ऐसा काम करना है ऐसा साधन करना है अपना उद्धार करना है उसकी स्मृति नष्ट हो जाती है उसकी याद नहीं रहती। 'स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशः'-- स्मृति नष्ट होनेपर बुद्धिमें प्रकट होनेवाला विवेक लुप्त हो जाता है अर्थात् मनुष्यमें नया विचार करनेकी शक्ति नहीं रहती। 'बुद्धिनाशात्प्रणश्यति'-- विवेक लुप्त हो जानेसे मनुष्य अपनी स्थितिसे गिर जाता है। अतः इस पतनसे बचनेके लिये सभी साधकोंको भगवान्के परायण होनेकी बड़ी भारी आवश्यकता है। यहाँ विषयोंका ध्यान करनेमात्रसे राग रागसे काम कामसे क्रोध क्रोधसे सम्मोह सम्मोहसे स्मृतिनाश स्मृतिनाशसे बुद्धिनाश और बुद्धिनाशसे पतन यह जो क्रम बताया है इसका विवेचन करनेमें तो देरी लगती है पर इन सभी वृत्तियोंके पैदा होनेमें और उससे मनुष्यका पतन होनेमें देरी नहीं लगती। बिजलीके करेंटकी तरह ये सभी वृत्तियाँ तत्काल पैदा होकर मनुष्यका पतन करा देती हैं। सम्बन्ध-- अब भगवान् आगेके श्लोकमें स्थितप्रज्ञ कैसे चलता है इस चौथे प्रश्नका उत्तर देते हैं।
Sri Abhinav GuptaSanskrit Commentary+
यत्तस्यापीति। यत् यस्मात् तस्यापि तपस्विनो मन इन्द्रियैः ह्रियते। अथवा यत्तस्य सयत्नस्यापि। योगिना च मन एव जेतव्यमिति द्वितीयो निर्णीतः।
Sri AnandgiriSanskrit Commentary+
समनन्तरश्लोकद्वयतात्पर्यमाह अथेति। पुरुषार्थोपायोपदेशानन्तर्यमथशब्दार्थः। तन्निष्ठत्वराहित्यावस्थां दर्शयति इदानीमिति। पराभविष्यतो महान्तमनर्थं गमिष्यतो विवेकविज्ञानविहीनस्येति यावत् सर्वानर्थमूलं विषयाभिध्यानं तस्य तथात्वमनुभवसिद्धमिति वक्तुमिदमित्युक्तन्। विषयेषु विशेषत्वमारोपितरमणीयत्वं प्रीतिरासक्तिरिति साधारणासक्तिमात्रं गृह्यते। तृष्णेत्युद्रिका शक्तिरुक्ता प्रतिबन्धेन प्रणाशेन वा प्रतिहतिः।
Sri DhanpatiSanskrit Commentary+
।।2.62 2.63।।इन्द्रियस्य जयः प्रयत्नेन संपाद्य इत्युक्तं तत्र मनसा विषयाचिन्तनाभ्यास एवोपाय इत्याशयेन व्यतिरेके दोषमाह ध्यायत इति। विषयांश्चिन्तयतः पुरुषस्य तेषु प्रीतिरुपजायते सङ्गादभिलाषः संजायते कामात्कुतश्चित्प्रतिहतात्क्रोधोऽभिजायते क्रोधात्कर्तव्याकर्तव्यविषये विभ्रमो भवति क्रुद्धो हि संमूढो गुरुनप्याक्रोशति तस्मात् स्मृतेः शास्त्राचार्योपदेशाहितसंस्कारजनितायाः विभ्रंशः स्यात् स्मृत्युत्पत्तिनिमित्तप्राप्तावनुत्पत्तिः ततः कार्याकार्यविवेकायोग्यता बुद्धेर्नाशः तस्मात्प्रणश्यति जीवन्नेव मृतः पुरुषार्थायोग्यो भवतीति द्वयोरर्थः। विषयध्यानमेव सर्वानर्थबीजमित्यभिप्रायः।
Sri JayatrithaSanskrit Commentary+
।।2.62 2.63।।ध्यायतः इत्यादिना प्रकृतानुपयुक्तं किमेतदुच्यते इत्यत आह रागादी ति। रागादिदोषस्य कारणं रागादिदोषकारणम्। तथा रागादिदोषः कारणं यस्य तद्रागादिदोषकारणम् परिहाराय रागादिदोषस्य। इदमुक्तं भवति मत्परो युक्त आसीत 2।61 इतीन्द्रियजयस्य परमसाधनमुक्तम्। रागद्वेषपरिहारोऽप्यपरं साधनमिति वक्ष्यति। तत्र स एव कथं स्यात् इत्या(शङ्कायां) काङ्क्षायां उपोद्धातप्रक्रिययेदमुच्यत इति। सम्मोहो मूर्छाऽत्र न सङ्गच्छत इत्यतोऽन्यथा व्याचष्टे सम्मोह इति। अधर्मेच्छा अकार्येच्छा। कुतः इत्यत आह तथा ही ति। संशब्दस्तु तस्यैव विशेषक इति भावः। अदृष्टरूपाधर्मविषयम्। तद्धेतुषु पापकर्मसु च नियतं कामनं मोहसंज्ञितमित्यर्थः। स्पष्टं चात्र प्रमाणमाह तथा चे ति। यत्किञ्चिद्विषयस्य स्मृतिविभ्रमस्य प्रकृतानुपयोगात्सम्यग्व्याचष्टे स्मृतिविभ्रम इति। विभ्रमोऽनवस्थानं नाश इति यावत्। चेतनस्य कथं बुद्धिनाशः इत्यत आह बुद्धिनाश इति। स्मृतिविभ्रम एवायमित्यतः सर्वात्मनेत्युक्तम्। नित्य आत्मेत्युक्तम् तत्कथं विनश्यति इत्यत आह विनश्यती ति। उक्तार्थे प्रमाणमाह तथा ही ति। तदा दोषादृष्टेः। एतदुक्तं भवति रागद्वेषयोः परम्परयानरकाद्यनर्थप्राप्तिः कार्यमिति ज्ञानेन तत्परिजिहीर्षायां विषयध्यानपरम्परया तत्कारणमिति ज्ञानेन तदकारणात्तयोरनुत्पादो भवतीति।
Sri MadhavacharyaSanskrit Commentary+
।।2.62 2.63।।रागादिदोषकारणमाह परिहाराय श्लोकद्वयेन। सम्मोहोऽधर्मेच्छा। तथा हि मोहशब्दार्थ उक्त उपगीतासुमोहसंज्ञितम्। अधर्मलक्षणं च नियतं पापकर्मसु इति। तथाचान्यत्रसम्मोहोऽधर्मकामिता इति। स्मृतिविभ्रमः प्रतिषेधादिस्मृतिनाशः। बुद्धिनाशः सर्वात्मना दोषबुद्धिनाशः। विनश्यति नरकाद्यनर्थं प्राप्नोति। तथा ह्युक्तम् अधर्मकामिनः शास्त्रे विस्मृतिर्जायते यदा। दोषादृष्टेस्तत्कृतेश्च नरकं प्रतिपद्यते।
Sri Madhusudan SaraswatiSanskrit Commentary+
।।2.62 2.63।।ननु मनसो बाह्येन्द्रियप्रवृत्तिद्वाराऽनर्थहेतुत्वं निगृहीतबाह्येन्द्रियस्य तूत्खातदंष्ट्रोरगवन्मनस्यनिगृहीतेऽपि न कापि क्षतिर्बाह्योद्योगाभावेनैव कृतकृत्यत्वादतो युक्त आसीतेति व्यर्थमुक्तमित्याशङ्का निगृहीतबाह्येन्द्रियस्यापि युक्तत्वाभावे सर्वानर्थप्राप्तिमाह द्वाभ्याम् निगृहीतबाह्येन्द्रियस्यापि शब्दादीन्विषयान्ध्यायतो मनसा पुनःपुनश्चिन्तयतः पुंसस्तेषु विषयेषु सङ्ग आसङ्गो ममात्यन्तं सुखहेतव एत इत्येवं शोभनाध्यासलक्षणः प्रीतिविशेष उपजायते। सङ्गात्सुखहेतुत्वज्ञानलक्षणात्संजायते कामो ममैते भवन्त्विति तृष्णाविशेषः। तस्मात्कामात्कुतश्चित्प्रतिहन्यमानात्तत्प्रतिघातकविषयः क्रोधोऽभिज्वलनात्माभिजायते। क्रोधाद्भवति संमोहः कार्याकार्यविवेकाभावरूपः। संमोहात्स्मृतिविभ्रमः स्मृतेः शास्त्राचार्योपदिष्टार्थानुसन्धानस्य विभ्रमो विचलनं विभ्रंशः। तस्माच्च स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धेरैकात्म्याकारमनोवृत्तेर्नाशो विपरीतभावनोपचयदोषेण प्रतिबन्धादनुत्पत्तिरनुत्पन्नायाश्च फलायोग्यत्वेन विलयः। बुद्धिनाशात्प्रणश्यति तस्याश्च फलभूताया बुद्धेर्विलोपात्प्रणश्यति सर्वपुरुषार्थायोग्यो भवति। यो हि पुरुषार्था योग्यो जातः स मृत एवेति लोके व्यवह्रियते। अतः प्रणश्यतीत्युक्तम्। यस्मादेवं मनसो निग्रहाभावे निगृहीतबाह्येन्द्रियस्यापि परमानर्थप्राप्तिस्तस्मान्महता प्रयत्नेन मनो निगृह्णीयादित्यभिप्रायः। अतो युक्तमुक्तंतानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत इति।
Sri NeelkanthSanskrit Commentary+
यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम् इति श्रुतौ इन्द्रियमनोबुद्धीनां निग्रहे परमपदप्राप्तिरित्युक्तम्। तत्र उपसंहृतकरणस्य बाह्याञ्शब्दादीनगृह्णतो मनोमात्रेणावस्थितस्य योगिनो मनसोऽनिग्रहे किं स्यादित्याह ध्यायत इति द्वाभ्याम्। विषयाञ्शब्दादीन्ध्यायतश्चिन्तयतः पुंसः पुरुषस्य तेषु शब्दादिषु सङ्गः संबन्धो जायते। बाह्यार्थेभ्यो निगृहीतान्यपीन्द्रियाणि मनोदोषात्पुनर्बाह्यार्थान्गृह्णन्तीत्यर्थः। ततः सङ्गात्कामस्तस्मिन्विषयेऽभिलाषः संजायते। कामात्कुतश्चिद्धेतोः प्रतिहतादभिज्वलनात्मा क्रोधोऽभिजायते।
Sri PurushottamjiSanskrit Commentary+
अथकथं व्रजेत इत्यत्रोत्तरमाह ध्यायत इति। विषयान् ध्यायतः पुंसस्तेषु सङ्ग आसक्तिः स्यात्। आसक्त्या किं स्यात् इत्यत आह सङ्गादिति। सङ्गात्कामः सञ्जायते कामाच्च क्रोधोऽभिजायते। अभितः सर्वतः तदयोग्येष्वपीत्यर्थः।
Sri RamanujaSanskrit Commentary+
अनिरस्तविषयानुरागस्य हि मयि अनिवेशतिमनस इन्द्रियाणि संयम्य अवस्थितस्य अपि अनादिपापवासनया विषयध्यानम् अवर्जनीयं स्यात्। ध्यायतो विषयान् पुंसः पुनरपि सङ्गः अतिप्रवृद्धो जायते। सङ्गात् संजायते कामः। कामो नाम सङ्गस्य विपाकदशा। पुरुषो यां दशाम् आपन्नो विषयान् अभुक्त्वा स्थातुं न शक्नोति स कामः। कामात् क्रोधः अभिजायते। कामे वर्तमाने विषये च असन्निहिते सन्निहितान् पुरुषान् प्रति एभिः अस्मदिष्टं विहतम् इति क्रोधो भवति।
Sri ShankaracharyaSanskrit Commentary+
ध्यायतः चिन्तयतः विषयान् शब्दादीन् विषयविशेषान् आलोचयतः पुंसः पुरुषस्य सङ्गः आसक्तिः प्रीतिः तेषु विषयेषु उपजायते उत्पद्यते। सङ्गात् प्रीतेः संजायते समुत्पद्यते कामः तृष्णा। कामात् कुतश्चित् प्रतिहतात् क्रोधः अभिजायते।।
Sri Sridhara SwamiSanskrit Commentary+
बाह्येन्द्रियसंयमाभावे दोषमुक्त्वा मनःसंयमाभावे दोषमाह ध्यायत इति द्वाभ्याम्। गुणबुद्ध्या विषयान्ध्यायतः पुरुषस्य तेषु सङ्ग आसक्तिर्भवति। आसक्त्या त तेष्वधिकः कामो भवति। कामाच्च केनचित्प्रतिहतात्क्रोधो भवति।
Sri VallabhacharyaSanskrit Commentary+
।।2.62 2.63।।एवं बाह्येन्द्रियसंयमाभावे दोष उक्तः इदानीं मनोनिरोधाभावे योगबुद्धिभ्रंशदोष इति कथयंस्तस्य स्थिरप्रज्ञतां दर्शयति चतुर्भिः। तत्र मनःसंयमाभावे दोषमाह द्वाभ्याम् ध्यायत इति विषयानिति। विचारयतश्चिन्तयत इति यावत् आसक्तिर्भवति ततः कामाभिलाषः। ततः प्रतिहतादेव क्रोधः। ततो विवेकाभावः। ततश्च शास्त्राचार्योपदिष्टार्थः स्मृतेर्विप्लवः। ततो व्यवसायात्मिकबुद्धेर्नाशः। ततः प्रणश्यति अत्यन्तविस्मृतिं प्राप्तः प्राकृत एव भवति अविशुद्धोऽपि च।
Vedantadeshikacharya VenkatanathaSanskrit Commentary+
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