श्लोक · Shlok 54
अर्जुन उवाच | स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव | स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥
arjuna uvāca. sthitaprajñasya kā bhāṣā samādhisthasya keśava. sthitadhīḥ kiṃ prabhāṣeta kimāsīta vrajeta kim.
Translation · अर्थ
English
Arjuna said What, O Krishna, is the description of him who has steady wisdom, and is merged in the superconscious state? How does one of steady wisdom speak, how does he sit, how does he walk?
Sūtradhāra Vichār
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A.C. Bhaktivedanta Swami PrabhupadaEnglish Commentary+
As there are symptoms for each and every man, in terms of his particular situation, similarly one who is Kṛṣṇa conscious has his particular nature – talking, walking, thinking, feeling, etc. As a rich man has his symptoms by which he is known as a rich man, as a diseased man has his symptoms by which he is known as diseased, or as a learned man has his symptoms, so a man in transcendental consciousness of Kṛṣṇa has specific symptoms in various dealings. One can know his specific symptoms from the Bhagavad-gītā. Most important is how the man in Kṛṣṇa consciousness speaks; for speech is the most important quality of any man. It is said that a fool is undiscovered as long as he does not speak, and certainly a well-dressed fool cannot be identified unless he speaks, but as soon as he speaks, he reveals himself at once. The immediate symptom of a Kṛṣṇa conscious man is that he speaks only of Kṛṣṇa and of matters relating to Him. Other symptoms then automatically follow, as stated below.
Swami SivanandaEnglish Commentary+
स्थितप्रज्ञस्य of the (sage of) steady wisdom? का what? भाषा description? समाधिस्थस्य of the (man) merged in the superconscious state? केशव O Kesava? स्थितधीः the sage of steady wisdom? किम् what (how)? प्रभाषेत speaks? किम् what (how)? आसीत sits? व्रजेत walks? किम् what (how).Commentary Arjuna wants to know from Lord Krishna the characteristic marks of one who is established in the Self in Samadhi how he speaks? how he sits? how he moves about.The characteristic marks of the sage of steady wisdom and the means of attaining that steady knowledge of the Self are described in the verses from 55 to 72 of this chapter.Steady wisdom is settled knowledge of ones identity with Brahman attained by direct realisation. (Cf.XIV.21? 27).
Swami ChinmayanandaHindi Commentary+
इसके पूर्व के दो श्लोकों में कर्मयोग पर विचार करते हुये सहज रूप से कर्म योगी के परम लक्ष्य की ओर भगवान् ने संकेत किया है। यह सिद्धान्त बुद्धि ग्राह्य एवं युक्तियुक्त था। भगवान् श्रीकृष्ण के मुख से सुनने पर उसके प्रामाण्य के विषय में भी कोई संदेह नहीं रह जाता। अर्जुन का स्वभाव ही ऐसा था कि उसे कर्मयोग ही ग्राह्य हो सकता था।प्रथम अध्याय का शोकाकुल अर्जुन अपने शोक को भूलकर संवाद में रुचि लेने लगा। कर्मशील स्वभाव के कारण उसे शंका थी कि बुद्धियोग के द्वारा जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर लेने पर इस जगत् में कर्ममय जीवन संभव होगा अथवा नहीं।समाधि आदि शब्दों के प्रचलित अर्थ से तो कोई यही समझेगा कि योगी पुरुष आत्मानुभूति में अपने ही एकान्त में रमा रहता है। प्रचलित वर्णनों के अनुसार नये जिज्ञासु साधक की कल्पना होती है कि ज्ञानी पुरुष इस व्यावहारिक जगत् के योग्य नहीं रह जाता। ऐसी धारणाओं वाले घृणा और कूटिनीति के युग में पला अर्जुन इस ज्ञान को स्वीकार करने के पूर्व ज्ञानी पुरुष के लक्षणों को जानना चाहता था।स्थितप्रज्ञ के लक्षणों को पूर्णत समझने की उसकी अत्यन्त उत्सुकता स्पष्ट झलकती है जब वह कुछ अनावश्यक सा यह प्रश्न पूछता है कि वह पुरुष कैसे बोलता है कैसे बैठता है आदि। उन्माद की अवस्था से बाहर आये अर्जुन का ऐसा प्रश्न उचित ही है। श्लोक की पहली पंक्ति में स्थितप्रज्ञ के आन्तरिक स्वभाव के विषय में प्रश्न है तो दूसरी पंक्ति में वाह्य जगत् में उसके व्यवहार को जानने की जिज्ञासा है।इस प्रकरण में स्थितप्रज्ञ का अर्थ है वह पुरुष जिसे आत्मा का अपरोक्ष अनुभव हुआ हो।अब भगवान् ज्ञानी पुरुष के उन लक्षणों का वर्णन करते हैं जो उसके लिये स्वाभाविक हैं और एक साधक के लिये साधन रूप हैं
Swami RamsukhdasHindi Commentary+
।। व्याख्या -- [यहाँ अर्जुनने स्थितप्रज्ञके विषयमें जो प्रश्न किये हैं, इन प्रश्नोंके पहले अर्जुनके मनमें कर्म और बुद्धि (2। 47 50) को लेकर शङ्का पैदा हुई थी। परन्तु भगवान्ने बावनवें-तिरपनवें श्लोकोंमें कहा कि जब तेरी बुद्धि मोहकलिल और श्रुतिविप्रतिपत्तिको तर जायगी, तब तू योगको प्राप्त हो जायगा--यह सुनकर अर्जुनके मनमें शंङ्का हुई कि जब मैं योगको प्राप्त हो जाऊँगा, स्थितप्रज्ञ हो जाऊँगा तब मेरे क्या लक्षण होंगे? अतः अर्जुनने इस अपनी व्यक्तिगत शङ्काको पहले पूछ लिया और कर्म तथा बुद्धिको लेकर अर्थात् सिद्धान्तको लेकर जो दूसरी शङ्का थी, उसको अर्जुनने स्थितप्रज्ञके लक्षणोंका वर्णन होनेके बाद (3। 12 में) पूछ लिया। अगर अर्जुन सिद्धान्तका प्रश्न यहाँ चौवनवें श्लोकमें ही कर लेते तो स्थितप्रज्ञके विषयमें प्रश्न करनेका अवसर बहुत दूर पड़ जाता।] 'समाधिस्थस्य' (टिप्पणी प0 92.1) --जो मनुष्य परमात्माको प्राप्त हो चुका है, उसके लिये यहाँ 'समाधिस्थ' पद आया है। 'स्थितप्रज्ञस्य'-- यह पद साधक और सिद्ध दोनोंका वाचक है। जिसका विचार दृढ़ है, जो साधनसे कभी विचलित नहीं होता, ऐसा साधक भी स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धिवाला) है और परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेसे जिसकी बुद्धि स्थिर हो चुकी है, ऐसा सिद्ध भी स्थितप्रज्ञ है। अतः यहाँ 'स्थितप्रज्ञ' शब्दसे साधक और सिद्ध दोनों लिये गये हैं। पहले इकतालीसवेंसे पैंतालीसवें श्लोकतक और सैंतालीसवेंसे तिरपनवें श्लोकतक साधकोंका वर्णन हुआ हैं; अतः आगेके श्लोकोंमें सिद्धके लक्षणोंमें साधकोंका भी वर्णन हुआ है। यहाँ शङ्का होती है कि अर्जुनने तो 'समाधिस्थस्य' पदसे सिद्ध स्थितप्रज्ञकी बात ही पूछी थी, पर भगवान्ने स्थितप्रज्ञके लक्षणोंमें साधकोंकी बातें क्यों कहीं? इसका समाधान है कि ज्ञानयोगी साधककी तो प्रायः साधन-अवस्थामें ही कर्मोंसे उपरति हो जाती है। सिद्धअवस्थामें वह कर्मोंसे विशेष उपराम हो जाता है। भक्तियोगी साधककी भी साधन-अवस्थामें जप, ध्यान, सत्सङ्ग, स्वाध्याय आदि भगवत्सम्बन्धी कर्म करनेकी रुचि होती है और इनकी बहुलता भी होती है। सिद्ध-अवस्थामें तो भगवत्सम्बन्धी कर्म विशेषतासे होते हैं। इस तरह ज्ञानयोगी और भक्तियोगी--दोनोंकी साधन और सिद्ध-अवस्थामें अन्तर आ जाता है, पर कर्मयोगीकी साधन और सिद्ध-अवस्थामें अन्तर नहीं आता। उसका दोनों अवस्थाओंमें कर्म करनेका प्रवाह ज्यों-का-त्यों चलता रहता है। कारण कि साधन-अवस्थामें उसका कर्म करनेका प्रवाह रहा है और उसके योगपर आरूढ़ होनेमें भी कर्म ही खास कारण रहे हैं। अतः भगवान्ने सिद्धके लक्षणोंमें, साधक जिस तरह सिद्ध हो सके, उसके साधन भी बता दिये हैं, और जो सिद्ध हो गये हैं उनके लक्षण भी बता दिये हैं। 'का भाषा' (टिप्पणी प0 92.2) परमात्मामें स्थित स्थिर बुद्धिवाले मनुष्यको किस वाणीसे कहा जाता है अर्थात् उसके क्या लक्षण होते हैं? (इसका उत्तर भगवान्ने आगेके श्लोकमें दिया है।) 'स्थितधीः किं प्रभाषेत'-- वह स्थिर बुद्धिवाला मनुष्य कैसे बोलता है? (इसका उत्तर भगवान्ने छप्पनवें-सत्तानवें श्लोकमें दिया है।) 'किमासीत'-- वह कैसे बैठता है अर्थात् संसारसे किस तरह उपराम होता है? (इसका उत्तर भगवान्ने अट्ठावनवें श्लोकसे तिरसठवें श्लोकतक दिया है।) 'व्रजेत किम्'-- वह कैसे चलता है अर्थात् व्यवहार कैसे करता है?(इसका उत्तर भगवान्ने चौंसठवेंसे इकहत्तरवें श्लोकतक दिया है।)सम्बन्ध-- अब भगवान् आगेके श्लोकमें अर्जुनके पहले प्रश्नका उत्तर देते हैं।
Sri Abhinav GuptaSanskrit Commentary+
।।2.54 2.55।।यदा ते इति। श्रुतीति। तत्र च योगबुद्धिप्राप्त्यबसरे तव स्फुटमेवेदमभिज्ञानम् श्रोतव्यस्य (S omits श्रोतव्यस्य) श्रुतस्य अभिलष्यमाणस्य च (N वा instead of च) आगमस्य उभस्यापि निर्वेदभावत्वम् (SK भाक्त्वम्)। अनेन चेदमुक्तम् अविद्यापद ( N अविद्यमद) निपतितप्रमात्रनुग्राहकशास्त्रश्रवणसंस्कारविप्रलम्भमहिमा अयं यत् तवास्थाने कुलक्षयादिदोषदर्शनम्। तत्तु तथाशासनबहुमानविगलने विगलिष्यति इति।
Sri AnandgiriSanskrit Commentary+
संन्यासिनो ज्ञाननिष्ठातत्प्राप्तिवचनं प्रश्नबीजं पृच्छतोऽर्जुनस्याभिप्रायमाह लब्धेति। लब्धा समाधावात्मनि समाधानेन वा प्रज्ञा परमार्थदर्शनलक्षणा येन तस्येति यावत्। ननु तस्य भाषा तत्कार्यानुरोधिनी भविष्यति किमित्यसौ विजिज्ञास्यते तत्राह कथमिति। ज्ञाननिष्ठस्य लक्षणविवक्षया प्रश्नमवतार्य तन्निष्ठासाधनबुभुत्सया विशिनष्टि समाधिस्थस्येति। तस्यैवार्थक्रियां पृच्छति स्थितधीरिति।
Sri DhanpatiSanskrit Commentary+
तत्त्वविल्लक्षणानि जिज्ञासुरर्जुन उवाच स्थितेति। स्थिता प्रतिष्ठताहंब्रह्मास्मीति प्रज्ञा यस्य स एव समाधिस्थः। नत्वात्मज्ञानशून्यस्य मुख्यसमाधिरस्तीति भावः। तस्य का भाषा कथमसौ लोकैर्भाष्यते। कैर्लक्षणैर्लक्षितः सन् लोकैः स्थितप्रज्ञ इत्युच्यत इत्यर्थः। यथा भवानपि केशिहननादिकर्मणा केशव इत्युच्यते तथेति सूचयन्नाह हे केशवेति। एतेनावस्थाद्वयवान्समाधिस्थो व्युत्थितचेताश्चेति अतो विशिनष्टि समाधिस्थस्य स्थितप्रज्ञस्येत्यादि प्रत्युक्तम्। योगिनोऽप्रक्रान्तत्वेन तस्य लक्षणप्रश्नानौचित्यात्। तत्त्वज्ञानरुपसमाधिस्थस्यैव प्रक्रान्तत्वात् उत्तरे प्राणनिरोधं यदा करोति तदा समाधिस्थ इत्यनुक्तत्वाच्च ज्ञानिनः प्राणायामानपेक्षसमाधेर्वासिष्ठे स्पष्टमुक्तत्वाच्च। तथाहि परिध उवाच। यद्यत्संसारजालेऽस्मिन्क्रियते कर्म भूमिप। तत्समाहितचित्तस्य सुखायान्यस्य नानघ क्वचित्संकल्परहितं परं विश्रमणास्पदम्। परमोपशमं श्रेयः समाधिमनुतिष्ठसि रघुरुवाच। एतन्मे ब्रूहि भगवन्त्सर्वसंकल्पवर्जितम्। परमोपशमं श्रेयः समाधिर्हि किमुच्यते योऽज्ञो महात्मन्सततं तिष्ठन्व्यवहरंश्च वा। असमाहितचित्तोऽसो कदा भवति कः किल नित्यप्रबुद्धचित्तास्तु कुर्वन्तोऽपि जगत्क्रियाः। आत्मैकतत्त्वसंनिष्ठाः सदैव सुसमाधयः बद्धपद्मासनस्यापि कृतब्रह्माञ्जलेरपि। अविश्रान्तस्वभावस्य कः समाधिः कथं च वा तत्त्वावबोधो भगवन्त्सर्वाशातृणपावकः। प्रोक्तः समाधिशब्देन नतु तूष्णीमवस्थितिः समाहिता नित्यतृप्ता यथाभूतार्थदर्शिनी। साधो समाधिशब्देन परा प्रज्ञोच्यते बुधैः अक्षुब्धा निरहंकारा द्वन्द्वेष्वननुपातिनी। प्रोक्ता समाधिशब्देन मेरोः स्थिरतराकृतिः निश्चिताभिगताभीष्टा हेयोपादेयवर्जिता। प्रोक्ता समाधिशब्देन परिपूर्णा मनोगतिः यतःप्रभृति बोधेन युक्तमात्यन्तिकं मनः। तदारभ्य समाधानमव्युच्छिन्नं महात्मनः इत्यादि। स्थितधीः स्वयं वा किं प्रभाषेत। किं प्रभाषणमासनं ब्रजनं वा तस्य कथमित्यर्थः। आत्मनि स्थितस्य स्थितप्रज्ञस्य लक्षणं ब्रूहीति प्रश्नार्थः। तथाच भाष्यं। स्थितप्रज्ञस्य लक्षणमनेन श्लोकेन पृच्छ्यते। यो ह्यादित एव संन्यस्य कर्माणि ज्ञानयोगनिष्ठायां प्रवृत्तः यञ्च कर्मयोगेन तयोः स्थितप्रज्ञस्य प्रजहातीत्यारभ्याध्यायपरिसमाप्तिपर्यन्तं स्थितप्रज्ञलक्षणं साधनं चोपदिश्यते। सर्वत्र ह्यध्यात्मशास्त्रे कृतार्थलक्षणानि यानि तान्येव साधनान्युपदिश्यन्ते यत्नसाध्यत्वादिति।
Sri JayatrithaSanskrit Commentary+
ज्ञानिनि प्रकृते लब्धावसरोऽर्जुनः पृच्छतीति प्रसङ्गतः स्पष्टं ह्यनुक्त्वा प्रज्ञाशब्दस्य बुद्धिमात्रार्थत्वप्रतीतिनिरासाय स्थितप्रज्ञशब्दार्थमाह स्थिते ति। प्रतिष्ठां प्राप्ता। ज्ञानमपरोक्षम्।किं प्रभाषेत इत्यतः का भाषेत्यस्यार्थान्तरमाह भाष्यत इति। ज्ञानीति व्यवह्रियत इत्यर्थः। भाषे ति। भाषाशब्दस्य स्त्रीलिङ्गत्वात्अनया इत्युक्तम्। व्यवहारकारणानामनेकत्वात्। कस्यायं प्रश्न इति न ज्ञायतेऽत आह लक्षण मिति। सास्नादिमत्त्वं लक्षणं दृष्ट्वा हि गौरिति व्यवह्रियते। ज्ञानिमात्रव्युदासाय समाधिस्थस्येति विशेषणमिति प्रतीयते। समाधिं कुर्वत इति। यथाऽऽह शङ्करः लब्धसमाधिप्रज्ञस्य लक्षणत्वबुभुत्सया अर्जुन उवाच इति तदसदिति भावेनाह उक्त मिति। ज्ञानिसामान्यलक्षणविषय एवायं प्रश्नः किमर्थं तर्हि समाधिस्थस्य इत्युक्तमिति चेत्समाधावचला बुद्धिः 2।53 इत्यनेनोक्तं ज्ञानिसामान्यलक्षणमनेनावदतीति ब्रूमः। न हीदं न लक्षणं ज्ञानिमात्रनिष्ठधर्मत्वात्। किमर्थोऽनुवादः इति चेत् तज्ज्ञातं ममेति ज्ञापनायेति। वदामः। एतज्ज्ञापने किं प्रयोजनं इति चेत् लक्षणान्तरं पृच्छामी ति ज्ञापयितुम्। अन्यथा सिद्धप्रश्नोऽयमित्युपेक्ष्यः प्रसज्येतेति भावः। लक्षणान्तरप्रश्नस्य चेदं प्रयोजनम्। अयावल्लक्ष्यभावित्वान्न तत्सम्यग्व्यवहारोपयोगि यावल्लक्ष्यभावि तु सार्वत्रिकव्यवहारोपयोगि ज्ञास्यामीति। अत एव प्रसिद्धलक्षणपदपरित्यागेन अप्रसिद्धभाषापदोपादानमिति।कश्चाश्चेशश्च केशाः ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ते यस्यावयवभूताः स केशवः परमात्मा इति भास्करो निरुक्तवान्एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य 11।35 इत्यत्र तदसदिति भावेनाह क मिति।कुत इयं निरुक्तिरित्यत आह तथाही ति।को ब्रह्मेति समाख्यात ईशोऽहं सर्वदेहिषु। आवां तवाङ्गे सम्भूतौ ततः केशवनामवान् इति हरिवंशवचनं वचनान्तराच्चेयमेव निरुक्तिः स्वीकार्येत्याह हिरण्यगर्भ इति। अत इति लभ्यते। तेन एवशब्दस्यान्वयः। हिरण्यगर्भ एव न त्वन्यः प्रजापतिः। शङ्कर एव न त्वन्यः समर्थ इति वा। अनेन केशयोः कर्मणोरुपपदयोरन्तर्णीतण्यर्थात्वृतु वर्तने इत्यस्माद्धातोःडोऽन्यत्रापि दृश्यते इति डप्रत्यय इत्युक्तं भवति। आसेरकर्मकत्वात् कथं कर्मप्रश्न इत्यत आह किमासी तेति। अध्याहृतप्रतियोगनिमित्तांत् द्वितीया न कर्मणीत्यर्थः। प्रश्नकरणादर्जुनस्याज्ञत्वं प्रतीतं तन्निवारयति न चे ति। तल्लक्षणादिकं ज्ञानिलक्षणं तत्प्रवृत्त्यनुपपत्तिसमाधानं च। प्रश्नस्यान्यथोपपत्तेरिति भावः। कुत इत्यत आह जानन्ती ति। समासान्तो विधिरनित्यः अतः पूर्वराजान इति साधु। देवर्षयश्च तथैव जानन्त्येव धर्मानित्युपलक्षणम्। वार्तायै गुरोरात्मनां च ख्यात्यै। लोकस्य गुह्यार्थवित्तये। एतेषां प्रश्नकरणं लोकानां कथं गुह्यार्थवित्तये भवतीत्यतो व्यतिरेकमुखेनोपपादयति न त इति।छन्दस्युभयथा अष्टा.3।4।117 इत्यतोऽल्पबुद्धीनामिति दीर्घत्वाभावः। गुह्यास्तेऽर्थाः पुराणादिषु प्रश्नोत्तरोपनिबन्धनेन विनोक्तिमात्रेणाल्पबुद्धीनां व्यक्तं न प्रकाशन्ते। न च प्रश्नाकरणे तदुपनिबन्धनं सम्भवतीति भावः। एतेनमोहादिस्त्वभिभवादेः इत्येतत्प्रपञ्चितं भवति।
Sri MadhavacharyaSanskrit Commentary+
स्थिता प्रज्ञा ज्ञानं यस्य स स्थितप्रज्ञः। भाष्यतेऽनयेति भाषा लक्षणमित्यर्थः। उक्तं लक्षणमनुवदति लक्षणानन्तरं पृच्छामीति ज्ञापयितुम्।समाधिस्थस्येति। कं ब्रह्माणं ईशं रुद्रं च वर्तयतीति केशवः। तथाहि निरुक्तिः कृता हरिवंशेषु रुद्रेण कैलासयात्रायाम् हिरण्यगर्भः कः प्रोक्त ईशः शङ्कर एव च। सृष्ट्यादिना वर्तयति तौ यतः केशवो भवान् इतिवचनान्तराच्च। किमासीत किं प्रत्यासीत। न चार्जुनो न जानाति तल्लक्षणादिकम्।जानन्ति पूर्वराजानो देवर्षयस्तथैव च। तथाहि धर्मान्पृच्छन्ति वार्तायै गुह्यवित्तये। न ते गुह्याः प्रतीयन्ते पुराणेष्वल्पबुद्धिनाम् इति वचनात्।
Sri Madhusudan SaraswatiSanskrit Commentary+
एवं लब्धावसरः स्थितप्रज्ञलक्षणं ज्ञातुमर्जुन उवाच यान्येव हि जीवन्मुक्तानां लक्षणानि तान्येव मुमुक्षूणां मोक्षोपायभूतानीति मन्वानः स्थिता निश्चलाहंब्रह्मास्मीति प्रज्ञा यस्य स स्थितप्रज्ञोऽवस्थाद्वयवान् समाधिस्थो व्युत्थितश्चेति। अतो विशिनष्टि समाधिस्थस्य स्थितप्रज्ञस्य का भाषा। कर्मणि षष्ठी। भाष्यतेऽनयेतिभाषा लक्षणम्। समाधिस्थः स्थितप्रज्ञः केन लक्षणेनान्यैर्व्यवह्रियत इत्यर्थः। सच व्युत्थितचित्तः स्थितधीः स्थितप्रज्ञः स्वयं किं प्रभाषेत स्तुतिनिन्दादावभिनन्दनद्वेषादिलक्षणं किं कथं प्रभाषेतेति सर्वत्र संभावनायां लिङ्। तथा किमासीत व्युत्थितचित्तनिग्रहाय कथं बहिरिन्द्रियाणां निग्रहं करोति तन्निग्रहाभावकाले च किं व्रजेत कथं विषयान्प्राप्नोति। तत्कर्तृकभाषणासनव्रजनानि मूढजनविलक्षणानि कीदृशानीत्यर्थः। तदेवं चत्वारः प्रश्नाः समाधिस्थे स्थितप्रज्ञे एकः व्युत्थिते स्थितप्रज्ञे त्रय इति। केशवेति संबोधयन्सर्वान्तर्यामितया त्वमेवैतादृशं रहस्यं वक्तुं समर्थोऽसीति सूचयति।
Sri NeelkanthSanskrit Commentary+
लब्धसमाधेः स्थितप्रज्ञापरनाम्नो लक्षणानि बुभुत्सुरर्जुन उवाच स्थितप्रज्ञस्येति। स्थिता प्रत्यगात्मनि प्रतिष्ठिता प्रज्ञा यस्य तस्य स्थितप्रज्ञस्य समाधिस्थस्य समाधौ स्थितस्य का भाषा भाषणं वचनं। कथमसौ परैर्भाष्यते इत्येकः प्रश्नः। स्थितधीः स्थितप्रज्ञः अर्थाद्व्युत्थितः सन् किं प्रभाषेत कथं वदति कथमास्ते कथं वा व्रजति विषयान्भुङ्क्ते इति प्रश्नत्रयम्।
Sri PurushottamjiSanskrit Commentary+
एतदुक्त्वा भगवांस्तूष्णीं स्थितस्तदाऽर्जुनस्तादृग्बुद्धिज्ञानाथ पृच्छति स्थितप्रज्ञस्येति। स्थितप्रज्ञस्य निश्चलबुद्धेः का भाषा का परिभाषेत्यर्थः। कथा परिभाषया स ज्ञेयः। हे केशव दुष्टगुणव्याप्तयोरपि मोक्षदायक मम मोक्षा र्थं৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷ याथातथ्येन कथयेति भावः। समाधिस्थस्य च का भाषा तदपि कथय। स्थितधीः किं प्रभाषेत। श्रोतव्यं चेन्न किञ्चित्तदा किं ब्रूयादित्यर्थः। स्वोच्चरितवाक्यम्यापि श्रवणसम्भवात्। किमासीत कथमुपतिष्ठेत् किं व्रजेत कथं गच्छेत् इत्यर्थः।
Sri RamanujaSanskrit Commentary+
अर्जुन उवाच समाधिस्थस्य स्थितप्रज्ञस्य का भाषा को वाचकः शब्दः तस्य स्वरूपं कीदृशम् इत्यर्थः। स्थितप्रज्ञः किं च भाषणादिकं करोति।वृत्तिविशेषकथनेन स्वरूपम् अपि उक्तं भवति इति वृत्तिविशेष उच्यते
Sri ShankaracharyaSanskrit Commentary+
स्थिता प्रतिष्ठिता अहमस्मि परं ब्रह्म इति प्रज्ञा यस्य सः स्थितप्रज्ञः तस्य स्थितप्रज्ञस्य का भाषा किं भाषणं वचनं कथमसौ परैर्भाष्यते समाधिस्थस्य समाधौ स्थितस्य हे केशव। स्थितधीः स्थितप्रज्ञः स्वयं वा किं प्रभाषेत। किम् आसीत व्रजेत किम् आसनं व्रजनं वा तस्य कथमित्यर्थः। स्थितप्रज्ञस्य लक्षणमनेन श्लोकेन पृच्छ्यते।।यो ह्यादित एव संन्यस्य कर्माणि ज्ञानयोगनिष्ठायां प्रवृत्तः यश्च कर्मयोगेन तयोः प्रजहाति इत्यारभ्य आ अध्यायपरिसमाप्तेः स्थितप्रज्ञलक्षणं साधनं चोपदिश्यते। सर्वत्रैव हि अध्यात्मशास्त्रे कृतार्थलक्षणानि यानि तान्येव साधनानि उपदिश्यन्ते यत्नसाध्यत्वात्। यानि यत्नसाध्यानि साधनानि लक्षणानि च भवन्ति तानि श्रीभगवानुवाच श्रीभगवानुवाच
Sri Sridhara SwamiSanskrit Commentary+
पूर्वश्लोकोक्तस्यात्मतत्त्वज्ञस्य लक्षणं जिज्ञासुः अर्जुन उवाच स्थितप्रज्ञस्येति। स्वाभाविके समाधौ स्थितस्यातएव स्थिता निश्चला प्रज्ञा बुद्धिर्यस्य तस्य का भाषा। भाष्यतेऽनयेति भाषा लक्षणमिति यावत्। केन लक्षणेन स्थितप्रज्ञ उच्यत इत्यर्थः। तथा स्थितधीः किं कथं भाषणमासनं व्रजनं च कुर्यादित्यर्थः।
Sri VallabhacharyaSanskrit Commentary+
एवमुक्तेऽर्जुनः पूर्वश्लोकोक्तस्थिरप्रज्ञस्य स्वरूपमनुष्ठानप्रकारं च पृच्छति स्थितप्रज्ञस्येति। समाधिस्थस्येति पूर्वोक्तानुवादविशेषणम्। का भाषा कस्तद्वाचकः शब्दः कीदृशं तत्स्वरूपमिति प्रश्नः।
Vedantadeshikacharya VenkatanathaSanskrit Commentary+
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