श्लोक · Shlok 5
गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके | हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्॥
gurūnahatvā hi mahānubhāvān śreyo bhoktuṃ bhaikṣyamapīha loke. hatvārthakāmāṃstu gurūnihaiva bhuñjīya bhogān rudhirapradigdhān.
Translation · अर्थ
English
Better it is, indeed, in this world to accept alms than to slay the most noble teachers. But if I kill them, even in this world all my enjoyments of wealth and fulfilled desires will be stained with (their) blood.
Sūtradhāra Vichār
Classical commentaries
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A.C. Bhaktivedanta Swami PrabhupadaEnglish Commentary+
According to scriptural codes, a teacher who engages in an abominable action and has lost his sense of discrimination is fit to be abandoned. Bhīṣma and Droṇa were obliged to take the side of Duryodhana because of his financial assistance, although they should not have accepted such a position simply on financial considerations. Under the circumstances, they have lost the respectability of teachers. But Arjuna thinks that nevertheless they remain his superiors, and therefore to enjoy material profits after killing them would mean to enjoy spoils tainted with blood.
Swami SivanandaEnglish Commentary+
गुरून् the Gurus (teachers)? अहत्वा instead of slaying? हि indeed? महानुभावान् most noble? श्रेयः better? भोक्तुम् to eat? भैक्ष्यम् alms? अपि even? इह here? लोके in the world? हत्वा having slain? अर्थकामान् desirous of wealth? तु indeed? गुरून् Gurus? इह here? एव also? भुञ्जीय enjoy? भोगान् enjoyments? रुधिरप्रदिग्धान् stained with blood.No commentary.
Swami ChinmayanandaHindi Commentary+
अत्यन्त उच्च प्रतीत होने वाले परन्तु वास्तव में अर्थशून्य तर्क अर्जुन पुन प्रस्तुत करता है क्योंकि स्वयं को न समझने के कारण वह अपनी समस्या को भी नहीं समझ पाया है।यहाँ उसने अपने गुरुओं अर्थात् भीष्म और द्रोण को महानुभाव कहा है जिसका अर्थ है अपने युग के आदर्श पुरुष। अपनी संस्कृति में जो कुछ उच्च और श्रेष्ठ है उसके वे प्रतीक स्वरूप हैं जिन्होंने विशाल और उदार अन्तकरण से सनातन धर्म के लिये अनेक प्रकार के त्याग किये। अपनी संस्कृति के ऐसे श्रेष्ठ आदर्श युगपुरुषों का नाश केवल व्यक्तिगत शक्ति एवं पदलिप्सा के लिये करना किसी प्रकार उचित नहीं प्रतीत होता है। केवल वह युग विशेष ही नहीं बल्कि इन महापुरुषों के अमूल्य जीवनोच्छेद होने से भावी पीढ़ियाँ भी दरिद्र हो जायेंगी।अर्जुन कहता है कि संस्कृति के उपवन के सुन्दरतम् सुमनों को विनष्ट करने का विचार त्याग कर पाण्डवों के लिये भिक्षान्न पर जीवन यापन करना अधिक उचित होगा। इन गुरुजनों को मारकर प्राप्त किये गये राज्य का उपभोग भी वह नहीं कर सकेगा क्योंकि वे सब उनकी कटु स्मृतियों और मूल्यवान रक्त से सने होंगे जिनको विस्मृत कर पाना कठिन होगा।एक बार यदि हम परिस्थिति का त्रुटिपूर्ण आकलन कर लेते हैं तो भावनाओं के कारण हमारी बुद्धि पर आवरण पड़ जाता है और तब हम भी जीवन में अर्जुन के समान व्यवहार करने लगते हैं। इसका स्पष्ट संकेत व्यास जी द्वारा इस घटना में किये गये विस्तृत वर्णन में देखने को मिलता है।
Swami RamsukhdasHindi Commentary+
व्याख्या -- [इस श्लोकसे ऐसा प्रतीत होता है कि दूसरे-तीसरे श्लोकोंमें भगवान्के कहे हुए वचन अब अर्जुनके भीतर असर कर रहे हैं। इससे अर्जुनके मनमें यह विचार आ रहा है कि भीष्म, द्रोण आदि गुरुजनोंको मारना धर्मयुक्त नहीं है--ऐसा जानते हुए भी भगवान् मुझे बिना किसी सन्देहके युद्धके लिये आज्ञा दे रहे हैं, तो कहीं-न-कहीं मेरी समझमें ही गलती है! इसलिये अर्जुन अब पूर्वश्लोककी तरह उत्तेजित होकर नहीं बोलते, प्रत्युत कुछ ढिलाईसे बोलते हैं।] 'गुरुनहत्वा ৷৷. भैक्ष्यमपीह लोके'-- अब अर्जुन पहले अपने पक्षको सामने रखते हुए कहते हैं कि अगर मैं भीष्म, द्रोण आदि पूज्यजनोंके साथ युद्ध नहीं करूँगा, तो दुर्योधन भी अकेला मेरे साथ युद्ध नहीं करेगा। इस तरह युद्ध न होनेसे मेरेको राज्य नहीं मिलेगा, जिससे मेरेको दुःख पाना पड़ेगा। मेरा जीवननिर्वाह भी कठिनतासे होगा। यहाँतक कि क्षत्रियके लिये निषिद्ध जो भिक्षावृत्ति है, उसको ही जीवन-निर्वाहके लिये ग्रहण करना पड़ सकता है। परन्तु गुरुजनोंको मारनेकी अपेक्षा मैं उस कष्टदायक भिक्षा-वृत्तिको भी ग्रहण करना श्रेष्ठ मानता हूँ। 'इह लोके' कहनेका तात्पर्य है कि यद्यपि भिक्षा माँगकर खानेसे इस संसारमें मेरा अपमान-तिरस्कार होगा, लोग मेरी निन्दा करेंगे, तथापि गुरुजनोंको मारनेकी अपेक्षा भिक्षा माँगना श्रेष्ठ है। 'अपि' कहनेका तात्पर्य है कि मेरे लिये गुरुजनोंको मारना भी निषिद्ध है; और भिक्षा माँगना भी निषिद्ध है परन्तु इन दोनोंमें भी गुरुजनोंको मारना मुझे अधिक निषिद्ध दीखता है। 'हत्वार्थकामांस्तु ৷৷. रुधिरप्रदिग्धान्'-- अब अर्जुन भगवान्के वचनोंकी तरफ दृष्टि करते हुए कहते हैं कि अगर मैं आपकी आज्ञाके अनुसार युद्ध करूँ, तो युद्धमें गुरुजनोंकी हत्याके परिणाममें मैं उनके खूनसे सने हुए और जिनमें धन आदिकी कामना ही मुख्य है, ऐसे भोगोंको ही तो भोगूँगा। मेरेको भोग ही तो मिलेंगे। उन भोगोंके मिलनेसे मुक्ति थोड़े ही होगी! शान्ति थोड़े ही मिलेगी! यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि भीष्म, द्रोण आदि गुरुजन धनके द्वारा ही कौरवोंसे बँधे थे; अतः यहाँ अर्थकामान्' पदको 'गुरुन्' पदका विशेषण मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है? इसका उत्तर यह है कि 'अर्थकी कामनावाले गुरुजन'--ऐसा अर्थ करना उचित नहीं है। कारण कि पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण आदि गुरुजन धनकी कामनावाले नहीं थे। वे तो दुर्योधनके वृत्तिभोगी थे उन्होंने दुर्योधनका अन्न खाया था। अतः युद्धके समय दुर्योधनका साथ छो़ड़ना कर्तव्य न समझकर ही वे कौरवोंके पक्षमें खड़े हुए थे। दूसरी बात अर्जुनने भीष्म द्रोण आदिके लिये 'महानुभावान' पदका प्रयोग किया है। अतः ऐसे श्रेष्ठ भाववालोंको अर्थकी कामनावाले कैसे कहा जा सकता है तात्पर्य है कि जो महानुभाव हैं, वे अर्थकी कामनावाले नहीं हो सकते; और जो अर्थकी कामनावाले हैं वे महानुभाव नहीं हो सकते। अतः यहाँ 'अर्थकामान्' पद 'भोगान्' पदका ही विशेषण हो सकता है। विशेष बात भगवान्ने दूसरे-तीसरे श्लोकोंमें अर्जुनके कल्याणकी दृष्टिसे ही उन्हें कायरताको छोड़कर युद्धके लिये खड़ा होनेकी आज्ञा दी थी। परन्तु अर्जुन उलटा ही समझे अर्थात् वे समझे कि भगवान् राज्यका भोग करनेकी दृष्टिसे ही युद्धकी आज्ञा देते हैं। (टिप्पणी प0 42) पहले तो अर्जुनका युद्ध न करनेका एक ही पक्ष था, जिससे वे धनुषबाण छोड़कर और शोकाविष्ट होकर रथके मध्यभागमें बैठ गये थे (1। 47)। परंतु युद्ध करनेका पक्ष तो भगवान्के कहनेसे ही हुआ है। तात्पर्य है कि अर्जुनका भाव था कि हमलोग तो धर्मको जानते हैं, पर दुर्योधन आदि धर्मको नहीं जानते, इसलिये वे धन, राज्य आदिके लोभसे युद्ध करनेके लिये तैयार खड़े हैं। अब वही बात अर्जुन यहाँ अपने लिये कहते हैं कि अगर मैं भी आपकी आज्ञाके अनुसार युद्ध करूँ, तो परिणाममें गुरुजनोंके रक्तसे सने हुए धन, राज्य आदिको ही तो प्राप्त करूँगा! इस तरह अर्जुनको युद्ध करनेमें बुराई-ही-बुराई दिखायी दे रही है। जो बुराई बुराईके रूपमें आती है, उसको मिटाना बड़ा सुगम होता है। परन्तु जो बुराई अच्छाईके रूपमें आती है, उसको मिटाना बड़ा कठिन होता है; जैसे--सीताजीके सामने रावण और हनुमान्जीके सामने कालनेमि राक्षस आये तो उनको सीताजी और हनुमान्जी पहचान नहीं सके; क्योंकि उन दोनोंका वेश साधुओंका था। अर्जुनकी मान्यतामें युद्धरूप कर्तव्य-कर्म करना बुराई है और युद्ध न करना भलाई है अर्थात् अर्जुनके मनमें धर्म (हिंसा-त्याग-) रूप भलाईके वेशमें कर्तव्य-त्यागरूप बुराई आयी है। उनको कर्तव्यत्यागरूप बुराई बुराईके रूपमें नहीं दीख रही है; क्योंकि उनके भीतर शरीरोंको लेकर मोह है। अतः इस बुराईको मिटानेमें भगवान्को भी बड़ा जोर पड़ रहा है और समय लग रहा है। आजकल समाजमें एकताके बहाने वर्ण-आश्रमकी मर्यादाको मिटानेकी कोशिश की जा रही है, तो यह बुराई एकतारूप अच्छाईके वेशमें आनेसे बुराईरूपसे नहीं दीख रही है। अतः वर्ण-आश्रमकी मर्यादा मिटनेसे परिणाममें लोगोंका कितना पतन होगा, लोगोंमें कितना आसुरभाव आयेगा--इस तरफ दृष्टि ही नहीं जाती। ऐसे ही धनके बहाने लोग झूठ, कपट, बेईमानी, ठगी, विश्वासघात आदि-आदि दोषोंको भी दोषरूपसे नहीं जानते। यहाँ अर्जुनमें धर्मके रूपमें बुराई आयी है कि हम भीष्म, द्रोण आदि महानुभावोंको कैसे मार सकते हैं? क्योंकि हम धर्मको जाननेवाले हैं। तात्पर्य है कि अर्जुनने जिसको अच्छाई माना है, वह वास्तवमें बुराई ही है; परन्तु उसमें मान्यता अच्छाईकी होनेसे वह बुराईरूपसे नहीं दीख रही है। सम्बन्ध-- भगवान्के वचनोंमें ऐसी विलक्षणता है कि वे अर्जुनके भीतर अपना प्रभाव डालते जा रहे हैं जिससे अर्जुनको अपने युद्ध न करनेके निर्णयमें अधिक सन्देह होता जा रहा है। ऐसी अवस्थाको प्राप्त हुए अर्जुन कहते हैं--
Sri Abhinav GuptaSanskrit Commentary+
।।2.4 2.6।।क्लैव्यादिभिर्निर्भर्त्सनमभिदधत् अधर्मे तव धर्माभिमानोऽयम् (N K (n) omit अयम् S omits the entire sentence) इत्यादि दर्शयति कथमित्यादि। कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च इत्यादिना भुञ्जीय भोगान् इत्यनेन च कर्मविशेषानुसन्धानं फलविशेषानुसन्धानं च हेयतया पूर्वपक्षे ( N omit पूर्वपक्षे) सूचयति। नैतद्विद्मः इत्यनेन च कर्मविशेषानुसन्धानमाह। निरनुसन्धानं (S K निरभिसन्धानं) तावत् कर्म नोपपद्यते। न च पराजयमभिसन्धाय युद्धे प्रवर्तते। जयोऽपि नश्चायमनर्थ (S k omit नः) एव। तदाह अहत्वा गुरून् भैक्षमपि चर्तुं श्रेयः। एतच्च निश्चेतुमशक्यं किं जयं कांक्षामः किं वा पराजयम् जयेऽपि बन्धूनां विनाशात्।
Sri AnandgiriSanskrit Commentary+
राज्ञां धर्मेऽपि युद्धे गुर्वादिवधे वृत्तिमात्रफलत्वं गृहीत्वा पापमारोप्य ब्रूते गुरूनिति। गुरून्भीष्मद्रोणादीन्भ्रात्रादींश्चात्र प्राप्तानहिंसित्वा महानुभावान्महामाहात्म्याञ्श्रुताध्ययनसंपन्नान् श्रेयः प्रशस्यतरं युक्तं भोक्तुमभ्यवहर्तुं भैक्षं भिक्षाणां समूहः भिक्षाशनं नृपादीनां निषिद्धमपीह लोके व्यवहारभूमौ। नहि गुर्वादिहिंसया राज्यभोगोऽपेक्ष्यते। किञ्च हत्वा गुर्वादीनर्थकामानेव भुञ्जीय न मोक्षमनुभवेयमिहैव भोगो न स्वर्गे। अर्थकामानेव विशिनष्टि भोगानिति। भुज्यन्त इति भोगास्तान्रुधिरप्रदिग्धांल्लोहितलिप्तानिवात्यन्तगर्हितान् अतोभोगान्गुरुवधादिसाध्यान्परित्यज्य भिक्षाशनमेव युक्तमित्यर्थः।
Sri DhanpatiSanskrit Commentary+
एवं तर्हि राज्यालाभेन भोगाभावे भिक्षाटनं कर्तव्यं भविष्यतीत्याशङ्कामिष्टापत्त्या परिहरति गुरुनिति। गुरुन्भीष्मद्रोणादीन्महानुभावानहत्वाहिंसित्वा इहास्िमँल्लोके भैक्षमपि भिक्षया लब्धमन्नं क्षत्रियस्य निषिद्धमपि भोक्तुमशितुं श्रेयः प्रशस्यम्। गुरुहिंसावर्जनार्थस्य भिक्षाशनस्य प्रत्यवायाजनकत्वात्। गुर्वहननेन नरकाभावं महानतिप्रसिद्धोऽनुभावः प्रभावो येषामिति विशेषणेनापकीर्त्यभावं च गुणमुक्त्वा हनने दोषमाह हत्वेति। महानुभावानित्यस्यात्रापि संबन्धः। गुरुन्महानुभावान्हत्वा भोगानर्थकामानिहैव भुञ्जीय नतु परलोके इहापि रुधिरप्रदिग्धान्। अपकीर्तिव्याप्तत्वेनात्यन्तजुगुप्सितानित्यर्थः। अर्थकामानिति गुरुविशेषणम्। तथाचार्थतृष्णाकुलत्वेनैते तावद्युद्धान्न निवर्तेरन् तस्मादेतद्वधः प्रसज्येतैवेत्यर्थः। तथाचोक्तं भीष्मेणअर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित्। इति सत्यं महाराज बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः।। इत्यपरे। केचित्तु ननुगुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः। उत्पथप्रतिपन्नस्य परित्यागो विधायते।। इति स्मृतेस्तेषां युद्धगर्वेणावलिप्तानामन्यायराज्यग्रहणेन शिष्यद्रोहेण च कार्याकार्यविवेकशून्यानामुत्पथनिष्ठानां च वधएव श्रेयानित्याशङ्क्याह गुरुनिति। महान् श्रुताध्ययनादिनिबन्धनः प्रभावो येषां तान्। तथाच कालकामादयोऽपि यैर्वशीकृतास्तेषां पुण्यातिशायिनां नावलिप्तत्वादिक्षुद्रपाप्मसंश्लेष इत्यर्थः। हिमहानुभावानित्येकं वा पदम्। हिमं जाड्यमपहन्तीति हिमहा आदित्योऽग्निर्वा तस्येवानुभावः सामर्थ्यं येषां तान्। तथाचातितेजस्वित्वात्तेषामवलिप्तत्वादिदोषो नास्त्येवधर्मव्यतिक्रमो दृष्ट ईश्वराणां च साहसम्। तेजीयसां न दोषाय वह्नेः सर्वभुजो यथा।। इत्युक्तेरिति वर्णयन्ति तत्रैतदीयोत्थापनोक्तस्मृतौ अवलिप्तत्वादिदोषप्रयुक्तत्यागविधानेन वधानुत्त्या तच्छ्रेयस्त्वस्य दूरापास्तत्वमस्ति नवेति विद्वद्भिर्विचार्यम्। किंच यत्तु ननु पदार्थलुब्धाः सन्तो युद्धे प्रवृत्तास्तदैषां विक्रीतात्मनां कुतस्त्यं पूर्वोक्तं माहात्म्यम्। तथाचोक्तं भीष्मेण युधिष्ठिरं प्रतिअर्थस्य पुरुषो दासः इत्यादीत्याशङ्क्याहहत्वेतीत्युत्तरार्धं तैरवतारितं तत्राप्येतन्मूलकावलिप्तत्वादिदोषाणां तैरेव तदीयातिप्रसिद्धमहानुभावत्वातितेजस्वित्ववर्णनेन समाहितत्वात्पुनरीदृक्शङ्काया उत्थानमस्ति नवेति विचारणीयम्।
Sri JayatrithaSanskrit Commentary+
Sri Jayatirtha did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11.
Sri MadhavacharyaSanskrit Commentary+
Sri Madhvacharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11.
Sri Madhusudan SaraswatiSanskrit Commentary+
ननु भीष्मद्रोणयोः पूजार्हत्वं गुरुत्वेनैव एवमन्येषामपि कृपादीनां। नच तेषां गुरुत्वेन स्वीकारः सांप्रतमुचितःगुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः। उत्पथप्रतिपन्नस्य परित्यागो विधीयते।। इति स्मृतेः। तस्मादेषां युद्धगर्वेणावलिप्तानामन्यायराज्यग्रहणेन शिष्यद्रोहेण च कार्याकार्यविवेकशून्यानामुत्पथनिष्ठानां वधएव श्रेयानित्याशङ्क्याह गुरूनहत्वा परलोकस्तावदस्त्येव अस्मिंस्तु लोके तैर्हृतराज्यानां नो नृपादीनां निषिद्धं भैक्षमपि भोक्तुं श्रेयः प्रशस्यतरमुचितं नतु तद्वधेन राज्यमपि श्रेय इति धर्मेऽपि युद्धे वृत्तिमात्रफलत्वं गृहीत्वा पापमारोप्य ब्रूते नत्ववलिप्तत्वादिना तेषां गुरुत्वाभाव उक्त इत्याशङ्क्याह महानुभावानिति। महाननुभावः श्रुताध्ययनतपआचारादिनिबन्धनः प्रभावो येषां तान्। तथाच कालकामादयोऽपि यैर्वशीकृतास्तेषां पुण्यातिशयशालिनां नावलिप्तत्वादिक्षुद्रपाप्मसंश्लेष इत्यर्थः। हिमहानुभावानित्येकं वा पदम्। हिमं जाड्यमप्नहन्तीति हिमहा आदित्योऽग्निर्वा तस्येवानुभावः सामर्थ्यं येषां तान्। तथाचातितेजस्वित्वात्तेषामवलिप्तत्वादिदोषो नास्त्येवधर्मव्यतिक्रमो दृष्ट ईश्वराणां च साहसम्। तेजीयसां न दोषाय वह्नेः सर्वभुजो यथा।। इत्युक्तेः। ननु यदार्थलुब्धाः सन्तो युद्धे प्रवृत्तास्तदैषां विक्रीतात्मनां कुतस्त्यं पूर्वोक्तं माहात्म्यम्। तथाचोक्तं भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रतिअर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित्। इति सत्यं महाराज बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः।। इत्याशड्क्याह हत्वेति। अर्थलुब्धा अपि ते मदपेक्षया गुरवो भवन्त्येवेति पुनर्गुरुग्रहणेनोक्तम्। तुशब्दोऽप्यर्थे। ईदृशानपि गुरून्हत्वा भोगानेव भुञ्जीय नतु मोक्षं लभेय। भुज्यन्त इति भोगा विषयाः। कर्मणि घञ्। ते च भोगा इहैव न परलोके। इहापि च रुधिरप्रदिग्धा इव अपयशोव्याप्तत्वेनात्यन्तजुगुप्सिता इत्यर्थः। यदेहाप्येवं तदा परलोकदुःखं कियद्वर्णनीयमिति भावः। अथवा गुरून्हत्वार्थकामात्मकान्भोगानेव भुञ्जीय नतु धर्ममोक्षावित्यर्थकामपदस्य भोगविशेषणतया व्याख्यानान्तरं द्रष्टव्यम्।
Sri NeelkanthSanskrit Commentary+
ननु युद्धोद्यतानां गुरूणामपि वधः श्रेयानित्याशङ्क्याह गुरूनिति। यद्यपि त्वदुक्तं प्रशस्तमेव तथापि महानुभावान् गुरूनहत्वा भैक्षमेव भोक्तुं श्रेयः प्रशस्ततरम्। एवं तर्हि गुरूंस्त्यक्त्वा दुर्योधनादीनेव दुष्टान् जहीत्याशङ्क्याह अर्थकामानिति। धनार्थिनो गुरवोऽवश्यं दुर्योधनसाहाय्यं करिष्यन्ति तेन तद्वधोऽपि प्रसक्त एवेत्यर्थः। तुशब्दः पक्षान्तरोपन्यासार्थः। इहैव न तु परलोके। भुञ्जीयेति संप्रश्ने लिङ्। गुरूनहत्वा भैक्षं श्रेयः उत हत्वा भोगसंपादनं श्रेय इति संप्रश्ने स्वयमेवान्त्यपक्षे दूषणमाह रुधिरप्रदिग्धानिति।
Sri PurushottamjiSanskrit Commentary+
गुरूणां मारणा द्रि৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷ क्षाटनं श्रेयः न तु तन्मारणेन राज्यभोग इत्याह गुरूनिति। गुरून्भीष्मद्रोणादीन् अहत्वा इह लोके भैक्षं भिक्षान्नमपि भोक्तुं श्रेयः श्रेयोरूपमित्यर्थः। यतस्ते महानुभावाः महतो भगवतोऽनुभावका इत्यर्थः। इह लोके तथा भोगेन परलोके सुखं स्यादितीह लोकपदेन ज्ञापितम्। एतेषां मारणेन तु परलोक एव दुःखं भविष्यतीति न किन्त्विह लोक एव नरकादिसमं दुःखं भविष्यतीत्याह हत्वेति। अर्थकामान् अर्थात्मकान् गुरून् हत्वा तु इहैव रुधिरप्रदिग्धान् रुधिरावलिप्तान् भोगान् भुञ्जीय अश्नीयाम्।
Sri RamanujaSanskrit Commentary+
अर्जुन उवाच पुनरपि पार्थः स्नेहकारुण्यधर्माधर्मभयाकुलो भगवदुक्तं हिततमम् अजानन् इदम् उवाच। भीष्मद्रोणादिकान् बहुमन्तव्यान् गुरून् कथम् अहं हनिष्यामि कथन्तरां भोगेष्वतिमात्रसक्तान् तान् हत्वा तैः भुज्यमानान् तान् एव भोगान् तद्रुधिरेण उपसिच्य तेषु आसनेषु उपविश्य भुञ्जीय।
Sri ShankaracharyaSanskrit Commentary+
Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.
Sri Sridhara SwamiSanskrit Commentary+
तर्हि तव देहयात्रापि न स्यादिति चेत्तत्राह गुरूनिति। गुरून्द्रोणादीनहत्वा परलोकविरुद्धो गुरुवधस्तमकृत्वा इह लोके भिक्षान्नमपि भोक्तुं श्रेयः उचितम्। विपक्षे तु न केवलं परत्र दुःखं इहैव तु नरकदुःखमनुभवेयमित्याह हत्वेति। गुरून्हत्वा इहैव तु रुधिरेण प्रदिग्धान्प्रकर्षेण लिप्तानर्थकामात्मकान्भोगानहं भुञ्जीय अश्नीयाम्। यद्वा अर्थकामानिति गुरूणां विशेषणम्। अर्थतृष्णाकुलत्वादेते तावद्युद्धान्न निवर्तेरन्। तस्मादेतद्वधः प्रसज्येतैवेत्यर्थः। तथाच युधिष्ठिरं प्रति भीष्मेणोक्तम्अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित्। इति सत्यं महाराज बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः।। इति।
Sri VallabhacharyaSanskrit Commentary+
अतो गुर्वादिहननं लोकवेदविरुद्धमित्याह गुरूनिति। महानुभावान्गुरूनहत्वा भैक्ष्यं भिक्षालब्धमन्नं भोक्तुं सन्न्यासिनेव लोके श्रेष्ठम्। तान् रुधिरप्रदिग्धान्भोगानहं भुञ्जीयेति हि काकुः। नैतद्युक्तमिति भावः।
Vedantadeshikacharya VenkatanathaSanskrit Commentary+
।। 2.5अथ भगवदुक्तयुद्धारम्भस्य परम्परया परमनिश्श्रेयसहेतुत्वरूपहिततमत्वाज्ञानात् तत्प्रतिक्षेपरूपस्यार्जुनवाक्यस्योत्थानं तथाविधाज्ञानस्य चास्थानस्नेहाद्याकुलतामूलत्वं वदन्नुत्तरमवतारयति पुनरपीति। उक्तार्थविषयतयापुनरपीदमुवाचेत्युक्तम्।कथम् इत्यादिश्लोके चकारस्यानुक्तसमुच्चयार्थत्वप्रदर्शनायआदिशब्दः उपात्तस्यानुपात्तोपलक्षणतया वा। पूजार्हशब्दविवक्षितबहुमन्तव्यत्वहेतुतयोत्तरश्लोकस्थमत्राकृष्योक्तंगुरूनिति।बहुमन्तव्यानिति महानुभावान् इत्युत्तरश्लोकस्थानुसन्धानाद्वा ते स्वत एव बहुमन्तव्याः। पितामहत्वधनुर्वेदाचार्यत्वादिभिरत्यन्तबहुमन्तव्या इति भावः। पुष्पादिभिः पूजार्हाणां पूजादिनिवृत्तिरेव साहसम् हननं त्वतिसाहसम् गुरुभक्त्या च तद्विरोधिभिः सह योद्धव्यम् न पुनर्गुरुभिरितिकथं गुरूनिषुभिः प्रतियोत्स्यामि इत्यस्य भावः।अहंशब्देन प्रख्यातवंशत्वादिकमभिप्रेतम्।इषुभिः प्रतियोत्स्यामि इत्यस्य हननपर्यन्तप्रतियुद्धाभिप्रायत्वमुत्तरश्लोकेन विवृतमितिहनिष्यामीत्युक्तम्। मधुसूदनारिसूदनशब्दाभ्यां नहि त्वमपि सान्दीपिन्यादिसूदन इति सूचितम्।चर्तुम् इत्यत्र भावमात्रार्थस्तुमुन् न तु क्रियार्थोपपदिकः। यद्यपि या काचिज्जीविकाऽऽश्रयणीया तथापि गुरुवधलब्धभोगेभ्य इह लोके परधर्मरूपभैक्षाचरणमपि श्रेयः प्रशस्यतरम्। महाप्रभावगुरुवधसाध्यपारलौकिकदुःखस्यातिमहत्त्वादिति भावः। प्रकृतविरुद्धार्थत्वभ्रमव्युदासायपूर्वश्लोकस्थकथंशब्दानुषङ्गादतिनृशंसत्वसामर्थ्यात् तुशब्दद्योतितवैषम्याच्चकथन्तराम् इत्युक्तम्।गर्हायां ल़डपिजात्वोः अष्टा.3।3।142विभाषा कथमि लिङ् च अष्टा.3।3।143 इति गर्हार्थ इह लिङ्प्रत्ययः। अत्रअर्थकामान् इत्यत्र द्वन्द्वादिभ्रान्तिनिवर्तनाय समासतदंशद्वयार्थोभोगेष्वतिमात्रप्रसक्तान् इत्युक्तः। अर्थेषु कामो येषामिति विग्रहःअवर्ज्यो हि व्यधिकरणो बहुव्रीहिर्जन्माद्युत्तरपदः। अर्थ्यन्त इत्यर्था भोगाः कामश्चातिमात्रसङ्गो वक्ष्यते। यद्वा अर्थं कामयन्त इत्यर्थकामाः ते निष्कामाश्चेत् तद्भोगहरणमपि सह्येत इदं तु क्षुधितानामोदनहरणवदिति भावः। हननादप्यतिनृशंसत्वसूचनायभोगरुधिरादिशब्दैरर्थसिद्धिः।तुशब्देन च द्योतितो विशेषस्तैरित्यादिना उक्तः।इहैव इत्यनेन विवक्षितोनृशंसत्वातिशयस्तेषु इत्यादिना दर्शितः। गुरुवधसाध्यभोगा रुधिरप्रदिग्धगुरुस्मृतिहेतुत्वात् स्वयमपि तथाविधा इव दुर्भोजा भवन्तीत्यैहलौकिकसुखमपि नास्तीति रुधिरप्रदिग्धशब्दाभिप्राय इत्याह तद्रुधिरेणोपसिच्येति। उपसेचनं हि स्वयमद्यमानं सदन्यस्यादनहेतुः इह तदुभयमपि विपरीतमिति भावः।