श्लोक · Shlok 27
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च | तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥
jātasya hi dhruvo mṛtyurdhruvaṃ janma mṛtasya ca. tasmādaparihārye.arthe na tvaṃ śocitumarhasi.
Translation · अर्थ
English
For certain is death for the born, and certain is birth for the dead; therefore, over the inevitable thou shouldst not grieve.
Sūtradhāra Vichār
Classical commentaries
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A.C. Bhaktivedanta Swami PrabhupadaEnglish Commentary+
One has to take birth according to one’s activities of life. And after finishing one term of activities, one has to die to take birth for the next. In this way one is going through one cycle of birth and death after another without liberation. This cycle of birth and death does not, however, support unnecessary murder, slaughter and war. But at the same time, violence and war are inevitable factors in human society for keeping law and order. The Battle of Kurukṣetra, being the will of the Supreme, was an inevitable event, and to fight for the right cause is the duty of a kṣatriya. Why should he be afraid of or aggrieved at the death of his relatives since he was discharging his proper duty? He did not deserve to break the law, thereby becoming subjected to the reactions of sinful acts, of which he was so afraid. By avoiding the discharge of his proper duty, he would not be able to stop the death of his relatives, and he would be degraded due to his selection of the wrong path of action.
Swami SivanandaEnglish Commentary+
जातस्य of the born? हि for? ध्रुवः certain? मृत्युः death? ध्रुवम् certain? जन्म birth? मृतस्य of the dead? च and? तस्मात् therefore? अपरिहार्ये inevritable? अर्थे in matter? न not? त्वम् thou? शोचितुम् to grieve? अर्हसि (thou) oughtest.Commentary Birth is sure to happen to that which is dead death is sure to happen to what which is born. Birth and death are certainly unavoidable. Therefore? you should not grieve over an inevitable matter.
Swami ChinmayanandaHindi Commentary+
भौतिकवादी नास्तिक लोगों का मत है कि बिना किसी पूर्वापर कारण के वस्तुएँ उत्पन्न नहीं होती हैं। आस्तिक लोग देह से भिन्न जीव का अस्तित्व स्वीकार करते हुए कहते हैं कि एक ही जीव विकास की दृष्टि से अनेक शरीर धारण करता है जिससे वह इस दृश्य जगत् के पीछे जो परम सत्य है उनको पहचान सकें। दोनों ही प्रकार के विचारों में एक सामान्य बात यह है कि दोनों ही यह मानते हैं कि जीवन जीवनमृत्यु की एक शृंखला है।इस प्रकार जीवन के स्वरूप को समझ लेने पर निरन्तर होने वाले जन्म और मृत्यु पर किसी विवेकी पुरुष को शोक नहीं करना चाहिए। गर्मियों के दिनों में सूर्य के प्रखर ताप में बाहर खड़े होकर यदि कोई सूर्य के ताप और चमक की शिकायत करे तो वास्तव में यह मूढ़ता का लक्षण है। इसी प्रकार यदि जीवन को प्राप्त कर उसके परिवर्तनशील स्वभाव की कोई शिकायत करता है तो यह एक अक्षम्य मूढ़ता है।उपर्युक्त कारण से शोक करना अपने अज्ञान का ही परिचायक है। श्रीकृष्ण का जीवन तो आनन्द और उत्साह का संदेश देता है। उनका जीवनसंदेश है रुदन अज्ञान का लक्षण है और हँसना बुद्धिमत्ता का। हँसते रहो इन दो शब्दों में श्रीकृष्ण के उपदेश को बताया जा सकता है। इसी कारण जब वे अपने मित्र को शोकाकुल देखते है तो उसकी शोक और मोह से रक्षा करने के लिए और इस प्रकार उसके जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कराने के लिए वे तत्पर हो जाते हैं।अब आगे के दस श्लोक सामान्य मनुष्य का दृष्टिकोण बताते हैं। भगवान् शंकराचार्य अपने भाष्य में कहते हैं कार्यकारण के सम्बन्ध से युक्त वस्तुओं के लिए शोक करना उचित नहीं क्योंकि
Swami RamsukhdasHindi Commentary+
।। व्याख्या-- 'जातस्य हि ध्रुवो मृत्युध्रुवं जन्म मृतस्य च'-- पूर्वश्लोकके अनुसार अगर शरीरीको नित्य जन्मने और मरनेवाला भी मान लिया जाय, तो भी वह शोकका विषय नहीं हो सकता। कारण कि जिसका जन्म हो गया है, वह जरूर मरेगा और जो मर गया है, वह जरूर जन्मेगा। 'तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि'-- इसलिये कोई भी इस जन्म-मृत्युरूप प्रवाहका परिहार (निवारण) नहीं कर सकता; क्योंकि इसमें किसीका किञ्चिन्मात्र भी वश नहीं चलता। यह जन्म-मृत्युरूप प्रवाह तो अनादिकालसे चला आ रहा है और अनन्तकालतक चलता रहेगा। इस दृष्टिसे तुम्हारे लिये शोक करना उचित नहीं है। ये धृतराष्ट्रके पुत्र जन्में हैं, तो जरूर मरेंगे। तुम्हारे पास ऐसा कोई उपाय नहीं है, जिससे तुम उनको बचा सको। जो मर जायेंगे, वे जरूर जन्मेंगे। उनको भी तुम रोक नहीं सकते। फिर शोक किस बातका?शोक उसीका कीजिये जो अनहोनी होय। अनहोनी होती नहीं होनी है सो होय।।जैसे, इस बातको सब जानते हैं कि सूर्यका उदय हुआ है, तो उसका अस्त होगा ही और अस्त होगा तो उसका उदय होगा ही। इसलिये मनुष्य सूर्यका अस्त होनेपर शोक-चिन्ता नहीं करते। ऐसे ही हे अर्जुन! अगर तुम ऐसा मानते हो कि शरीरके साथ ये भीष्म, द्रोण आदि सभी मर जायँगे, तो फिर शरीरके साथ जन्म भी जायँगे। अतः इस दृष्टिसे भी शोक नहीं हो सकता।भगवान्ने इन दो (छब्बीसवें-सत्ताईसवें) श्लोकोंमें जो बात कही है, वह भगवान्का कोई वास्तविक सिद्धान्त नहीं है। अतः 'अथ च' पद देकर भगवान्ने दूसरे (शरीर-शरीरीको एक माननेवाले) पक्षकी बात कही है कि ऐसा सिद्धान्त तो है नहीं, पर अगर तू ऐसा भी मान ले, तो भी शोक करना उचित नहीं है। इन दो श्लोकोंका तात्पर्य यह हुआ कि संसारकी मात्र चीजें प्रतिक्षण परिवर्तनशील होनेसे पहले रूपको छोड़कर दूसरे रूपको धारण करती रहती हैं। इसमें पहले रूपको छोड़ना--यह मरना हो गया और दूसरे रूपको धारण करना--यह जन्मना हो गया। इस प्रकार जो जन्मता है, उसकी मृत्यु होती है और जिसकी मृत्यु होती है, वह फिर जन्मता है--यह प्रवाह तो हरदम चलता ही रहता है। इस दृष्टिसे भी क्या शोक करेंसम्बन्ध -- पीछेके दो श्लोकोंमें पक्षान्तरकी बात कहकर अब भगवान् आगेके श्लोकमें बिलकुल साधारण दृष्टिकी बात कहते हैं।
Sri Abhinav GuptaSanskrit Commentary+
अथ वैनमिति। अथाप्येनं देहं मन्यसे नित्यजातं प्रवाहस्याविनाशात् तथापि न शोच्यता। क्षणिकप्रक्रियया वा नित्यविनाशिनम् तथापि का शोच्यता एवं यद्यात्मनः तत्तद्देहयोगवियोगाभ्यां (S K तद्देहयोग (K संयोग) नित्यजातत्वं नित्यमृतत्वं वा मन्यसे तथापि सर्वथा शोचनं प्रामाणिकानामयुक्तम् ( N प्राकरणि )।
Sri AnandgiriSanskrit Commentary+
तयोरवश्यंभावित्वे सत्यनु शोकस्याकर्तव्यत्वे हेत्वन्तरमाह तथाचेति।
Sri DhanpatiSanskrit Commentary+
अस्मिन्पक्षे शोकाभावं स्फुटयति जातस्येति। नन्वात्मन आभूतसंप्लवस्थायित्वपक्षेनित्यत्वपक्षे च दृष्टादृष्टदुःखसंभवात्तद्भयेन शोचामीत्यत आहेति तु यथाश्रुततमूलाननुगुणत्वादाचार्यैर्नावतरितं तस्मादपरिहार्येऽवश्यंभाविनि जन्ममरणलक्षणेऽर्थे यत्त्वेवं अदृष्टनिमित्तेऽपि शोके तस्मादपरिहार्येऽर्थे इत्येवोत्तरम्। युद्धाख्यं हि कर्मक्षत्रियस्यापरिहार्यमित्यादि तदुपेक्ष्यम् प्रकरणविरोधात् जन्ममरणलक्षणस्यार्थस्य ध्रुवताया एव पूर्वार्धे प्रस्तुतत्वात्। यत्तु अथवा आत्मनित्यत्वपक्ष एव श्लोकद्वयमर्जुनस्य परमास्तिकस्य वेदबाह्यमताभ्युपगमासंभवात्। अक्षरयोजना तु नित्यश्चासौ देहेन्द्रियसंबन्धवशाज्जातश्चेति नित्यजातस्तमेनमात्मानं नित्यमपि सन्तं जातं चेन्मन्यसे तथा नित्यमपि सन्तं मृतं चेन्मन्यसे तथापि त्वं नामुशोचितुमर्हसि इति प्रतिज्ञाय हेतुमाह जातस्य हीत्यादिना। मृत्युः शरीरादिविच्छेदः तत्संयोगो जन्म। भाष्यमप्यस्मिन्पक्षे योजनीयमिति तद्विचार्यम्। समासैकदेशस्य क्रियायामन्वयायोगात् प्रयोजनशून्यक्लिष्टकल्पनाया अन्याय्यत्वाच्च। ननूक्तमेवार्जुनस्य परमास्तिकस्य वेदबाह्यताभ्युपगमासंभवरुपं प्रयोजनमितिचेन्न। भगवतैवाभ्युपगभ्य कैमुत्यन्यायः प्रदर्शित इत्युक्तत्वात्। तथाच परमास्तिकं श्रीरामचन्द्रं प्रति भगवतो वसिष्ठस्य वचनंत्वं चेदबभूविथ पुरा तथेदानीं भविष्यसि। अद्य चेह स्थितोऽसीति ज्ञातवानसि निश्चयम् तदानन्तरगानन्यान्प्राणादीन्निकटस्थितान्। बन्धूनतीतान्सुबहून्कस्मात्त्वं नानुशोचसि पूर्वमन्यस्तथेदानीं बभूविथ भविष्यसि। यदि राम तथापि त्वं सद्रूपः किं विमुह्यसि पुरा भूत्वाथ भूत्वा च भूयश्चेन्न भविष्यसि। तथापि क्षीणसंसारः किमर्थमनुशोचसि तस्मान्न दुःखिता युक्ता प्राकृते जागते भ्रमे। तथैव मुदिता युक्ता युक्तं कार्यानुवर्तनम् इति। विवृतं चेदं टीकाकारैः। एवमात्मनोऽसङ्गत्वाद्वितीयत्वदर्शने शोकसंभव उक्तः। इदानीमस्त्वासङगी तथापि स किं नित्य उत क्षणिक उत प्रागभाववद्धटादिवद्वा कालान्तरेण नश्वरः। सर्वेष्वपि पक्षेषु बन्धुशोको न युक्त इति प्रौढ्या समाधित्सुराद्ये कल्पे तावदाह त्वं चेदिति। इति यदि निश्चयं ज्ञातवानसि बन्धून्प्राणादीनिवेत्यध्याहारः विनिगमनाविरहात्सर्वशोकाशक्तेः क्वापि शोको न युक्त इति भावः द्वितीयेऽप्याह पूर्वमिति। इदानीमन्यः अग्रेऽप्यन्यः क्षणिकमात्मानं यदि जानासि तथापि किं सद्रूपमालम्ब्य विमुह्यसि द्वितीयक्षणे शोच्यस्य शोचितुश्चासत्त्वेन शोकावसराभावादित्यर्थः तृतीयेऽप्याह पुरेति। तथाप्यात्मनाशादेव क्षीणसंसारः यदात्मनो जन्मादिसङ्गित्वेन शोको न युक्तस्तदा किंवाच्यमसङ्गोदासीनकूटस्थस्वप्रकाशपूर्णानन्दैकरसत्वे स न युक्त इत्याशयेनोपसंहरति तस्मादिति। मुदिता सहजसंतोषवृत्तिः इति। यत्तु भाष्यमपीत्यादि तदपि न। आत्मनो नित्यत्वमभ्युपगम्येदमुच्यत इति भाष्यस्यास्मिन्पक्षे योजनाया अशक्यत्वात् नित्यत्वच्छेदेऽभ्युपगम्येति न संगच्छते नित्यत्वस्य स्वसिद्धान्तत्वात्। देहादिसंबन्धेनानित्यत्वमिति शेषपूरणे तु जातत्वादिकमभ्युपगम्येति वक्तव्यं स्यात्। अथचेत्यभ्युपगमार्थः। एनं प्रकृतमात्मानं नित्यजातं लोकप्रसिद्य्धा प्रत्येनकशरीरोत्पत्तिं जातो जात इति वा मन्यसे तथा प्रतिताद्विनाशं नित्यं वा मन्यसे मृतो मृत इति भाष्यस्य जातादौ नित्यशब्दान्वयप्रतिपादनपरस्योक्तपक्षे योजयितुमशक्यत्वाच्चेति दिक्।
Sri JayatrithaSanskrit Commentary+
अनेनैव अभिप्रायेण एतदेकवाक्यतयोत्तरं श्लोकद्वयं क्रमेणावतारयति कुत इति। शङ्कामनूद्य तथापि न शोचितुमर्हसीत्युक्तम् तत्र को हेतुरित्यर्थः।
Sri MadhavacharyaSanskrit Commentary+
कुतोऽशोकः नियतत्वदित्याह जातस्येति।
Sri Madhusudan SaraswatiSanskrit Commentary+
युद्ध्यस्य नन्वात्मन आभूतसंप्लवस्थायित्वपक्षे नित्यत्वपक्षे दृष्टादृष्टदुःखसंभवात्तद्भयेन शोचामीत्यत आह द्वितीयश्लोकेन हि यस्मात् जातस्य स्वकृतधर्माधर्मादिवशाल्लब्धशरीरेन्द्रियसंबन्धनस्य स्थिरस्यात्मनो ध्रुव आवश्यको मृत्युस्तच्छरीरादिविच्छेदस्तदारम्भककर्मक्षयनिमित्तः। संयोगस्य वियोगावसानत्वात्। तथा ध्रुवं जन्म मृतस्य च प्राग्देहकृतकर्मफलोपभोगार्थं सानुशयस्यैव प्रस्तुतत्वान्न जीवन्मुक्तेर्व्यभिचारः। तस्मादेवमपरिहार्ये परिहर्तुमशक्येऽस्मिञ्जन्ममरणलक्षणेऽर्थे विषये त्वमेवं विद्वान्न शोचितुमर्हसि। तथाच वक्ष्यतिऋतेऽपि त्वां नभविष्यन्ति सर्वे इति। यदि हि त्वया युद्धेनाहन्यमाना एते जीवेयुरेव तदा युद्धाय शोकस्तवोचितः स्यात् एते तु कर्मक्षयात्स्वयमेव म्रियन्त इति तत्परिहारासमर्थस्य तव दृष्टदुःखनिमित्तः शोको नोचित इति भावः। एवमदृष्टदुःखनिमित्तेपि शोकेतस्मादपरिहार्येऽर्थे इत्येवोत्तरम्। युद्धाख्यं हि कर्म क्षत्रियस्य नियतमग्निहोत्रादिवत्। तच्चयुध संप्रहारे इत्यस्माद्धातोर्निष्पन्नं शत्रुप्राणवियोगानुकूलशस्त्रप्रहाररूपं विहितत्वादग्नीषोमीयादिहिंसावन्न प्रत्यवायजनकम्। तथाच गौतमः स्मरतिन दोषो हिंसायामाहवेऽन्यत्र व्यश्वासारथ्यनायुधकृताञ्जलिप्रकीर्णकेशपराङ्भुखोपविष्टस्थलवृक्षारूढदूतगोब्राह्मणवादिभ्यः इति। ब्राह्मणग्रहणं चात्रायोद्धृब्राह्मणविषयम्। गवादिप्रायपाठादिति स्थितम्। एतच्च सर्वंस्वधर्ममपि चावेक्ष्य इत्यत्र स्पष्टीकरिष्यते। तथाच युद्धलक्षणेऽर्थेऽग्निहोत्रादिवद्विहितत्वादपरिहार्ये परिहर्तुमशक्ये तदकरणे प्रत्यवायप्रसङ्गात् त्वमदृष्टदुःखभयेन शोचितुं नार्हसीति पूर्ववत्। यदि तु युद्धाख्यं कर्म काम्यमेवय आहवेषु युध्यन्ते भूम्यर्थमपराङ्मुखाः। अकूटैरायुधैर्यान्ति ते स्वर्गं योगिनो यथा।। इति याज्ञवल्क्यवचनात्हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् इति भगवद्वचनाच्च तदापि प्रारब्धस्य काम्यस्याप्यवश्यपरिसमापनीयत्यवे नित्यतुल्यत्वात् त्वयाच युद्धस्य प्रारब्धत्वादपरिहार्यत्वं तुल्यमेव। अथवा आत्मनित्यत्वपक्ष एव श्लोकद्वयं अर्जुनस्य परमास्तिकस्य वेदबाह्यमताभ्युपगमासंभवात्। अक्षरयोजना तु नित्यश्चासौ देहेन्द्रियादिसंबन्धवशाज्जातश्चेति। नित्यजातस्तमेनमात्मानं नित्यमपि सन्तं जातं चेन्मन्यसे तथा नित्यमपि सन्तं मृतं चेन्मन्यसे तथापि त्वं नानुशोचितुमर्हसीति प्रतिज्ञाय हेतुमाह जातस्य हीत्यादिना। नित्यस्य जातत्वं मृतत्वं च प्राग्व्याख्यातम्। स्पष्टमन्यम्। भाष्यमप्यस्मिन्पक्षे योजनीयम्।
Sri NeelkanthSanskrit Commentary+
शोचितुं नार्हसीत्युक्तं तत्र हेतुमाह जातस्येति। ध्रुवोऽपरिहार्यः मृत्युर्मरणम्। अपरिहार्ये अर्थे मरणाख्ये त्वदुद्योगं विनापि अवश्यंभाविनि विषये न त्वं शोचितुमर्हसि। वक्ष्यति चमयैवैते निहताः पूर्वमेव इति।
Sri PurushottamjiSanskrit Commentary+
ननु स्वसमानाभावान्निर्बले तु शोकः कर्तव्य एवेति चेत्तत्राह जातस्येति। जातस्य देहस्य मृत्युर्ध्रुवः मृतस्य ध्रुवं जन्म भवतीत्यर्थः।अत्रायमर्थः जातस्य गृहीतजन्मनो येन मृत्युर्निर्मितस्तस्य तेनैव मृत्युर्ध्रुवो निश्चितस्तस्माद्येषां मृत्युस्त्वयैव निर्मितः स च तथैव भविष्यति। तस्माद्यद्यथा ईश्वरनिर्मितं तत्तथैव भविष्यतीत्यपरिहार्ये सर्वथा भाव्येऽर्थे त्वं न शोचितुं योग्योऽसीत्यर्थः। हीति युक्तोऽयमर्थः। ईश्वरकृतं कोऽन्यथा कर्तुं समर्थः।
Sri RamanujaSanskrit Commentary+
उत्पन्नस्य विनाशो ध्रुवः अवर्जनीय उपलभ्यते। तथा विनष्टस्य अपि जन्म अवर्जनीयम्।कथम् इदम् उपलभ्यते विनष्टस्य उत्पत्तिः इति।सत एव उत्पत्त्युपलब्धेः असतः च अनुपलब्धेः। उत्पत्तिविनाशादयः सतो द्रव्यस्य अवस्थाविशेषाः। तन्तुप्रभृतीनि द्रव्याणि सन्ति एव रचनाविशेषयुक्तानि पटादीनि उच्यन्ते।असत्कार्यवादिना अपि एतावद् एव उपलभ्यते। न हि तत्र तन्तुसंस्थानविशेषातिरेकेण द्रव्यान्तरं प्रतीयते।कारकव्यापारनामान्तरभजनव्यवहारविशेषाणाम् एतावता एव उपपत्तेः न च द्रव्यान्तरकल्पना युक्ता। अत उत्पत्तिविनाशादयः सतो द्रव्यस्य अवस्थाविशेषाः।उत्पत्त्याख्याम् अवस्थाम् उपयातस्य द्रव्यस्य तद्विरोध्यवस्थान्तरप्राप्तिः विनाश इति उच्यते।मृद्द्रव्यस्य पिण्डत्वघटत्वकपालत्वचूर्णत्वादिवत् परिणामिद्रव्यस्य परिणामपरम्परा अवर्जनीया। तत्र पूर्वावस्थस्य द्रव्यस्य उत्तरावस्थाप्राप्तिः विनाशः सा एव तदवस्थस्य उत्पत्तिः। एवम् उत्पत्तिविनाशाख्यपरिणामपरम्परा परिणामिनो द्रव्यस्य अपरिहार्या इति न तत्र शोचितुम् अर्हसि।सतो द्रव्यस्य पूर्वावस्थाविरोध्यवस्थान्तरप्राप्तिदर्शनेन यः अल्पीयान् शोकः सोऽपि मनुष्यादिभूतेषु न संभवति इत्याह।
Sri ShankaracharyaSanskrit Commentary+
जातस्य हि लब्धजन्मनः ध्रुवः अव्यभिचारी मृत्युः मरणं ध्रुवं जन्म मृतस्य च। तस्मादपरिहार्योऽयं जन्ममरणलक्षणोऽर्थः। तस्मिन्नपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि।।कार्यकरणसंघातात्मकान्यपि भूतान्युद्दिश्य शोको न युक्तः कर्तुम् यतः
Sri Sridhara SwamiSanskrit Commentary+
कुत इत्यत आह जातस्येति। हि यस्माज्जातस्य स्वारम्भककर्मक्षये मृत्युर्धुवो निश्चितः। मृतस्य तत्तद्देहकृतेन कर्मणा जन्मापि ध्रुवमेव। तत्तस्मादेवमपरिहार्येऽर्थेऽवश्यंभाविनि जन्ममरणलक्षणेऽर्थे त्वं विद्वाञ्शोचितुं नार्हसि। योग्यो न भवसीत्यर्थः।
Sri VallabhacharyaSanskrit Commentary+
कुत इत्यत आह। हि यतः। जातस्येति। मृत्युर्ध्रुवो मृतस्य च ध्रुवमवर्जनीयं जन्म। एवमवर्जनीयेऽर्थे न शोचितुमर्हसि।
Vedantadeshikacharya VenkatanathaSanskrit Commentary+
ध्रुवमृत्युमृतादिशब्दानां अर्थान्तरव्युदासाय प्रकृतोपपादकंजातस्य इत्यादिकं व्याख्याति उत्पन्नस्येत्यादि।उपलभ्यते इतिहिशब्दसूचितप्रमाणप्रसिद्धिरुच्यते। हेतुपरत्वेऽपि हिशब्दस्यार्थात्तत्सिद्धिः। मृतस्य जन्मव्याघाताभिप्रायेण चोदयति कथमिति। यदि केवलमौपदेशिकोऽयमर्थः स्यात् तथाऽभ्युपगम्येत। अत्र तुजातस्य हि इति लोकसिद्धानुवादेनोच्यते। लोके च प्रागसत एवोत्पत्तिर्दृष्टा। न तु कदाचिदुत्पद्य निरुद्धस्य। यदि च नष्टं पुनर्जायेत तदा दुःखात्यन्तनिवृत्तेरशक्यत्वादपवर्गशास्त्रमखिलमप्रमाणं स्यात् व्याधिशत्रुविजयादिप्रयासश्च निरर्थकः स्यात्। पुत्रादिमरणे च न शोचनीयम् अतो नेदमुपपत्तिमदिति भावः। परिहरति सत एवेति। नन्विदमुभयमप्ययुक्तम् सत उत्पत्तिनैरपेक्ष्यात् प्रागसतामेव च घटादीनामुत्पत्तिदर्शनादित्याशङ्क्याह उत्पत्तीति। निदर्शयति तन्तुप्रभृतीनि हीति। अन्त्यतन्तुसंयोगात्पूर्वं दीर्घैकतन्त्वारब्धे च त्वयाऽप्येवमिष्यत इति भावः। उक्तं च नारायणाचार्यैः एकस्माद्दीर्घतमात्तन्तोः पटादेरुत्पत्तिर्दृष्टा नी.मा. इति। असत्कार्यत्वादिनं प्रति किमवयवीति कश्चिदवयवसमुदायातिरिक्तः पदार्थो दृश्यते कल्प्यते वेति विकल्पमभिप्रेत्य प्रथमकल्पे दूषणमाह असदिति।एतावत् रचनाविशेषयुक्तत्वमात्रमित्यर्थः।वादिनोपलभ्यत इति पदाभ्यां वाङ्मनसविसंवादमभिप्रैति। एतावदेवेत्युक्तमर्थं प्रपञ्चयति नहीति। द्वितीयकल्पं दूषयति कारकेति। यदि साङ्ख्यवद्द्वयमपि सर्वस्याप्यनागन्तुकत्वं वदामः तदा भवेदेव कारकव्यापारादिनैरर्थक्यादिदोषः। वयं हि द्रव्याणां सर्वेषामनागन्तुकत्वं तदवस्थानां चागन्तुकत्वं ब्रूमः। घटादिवत् प्रदीपादिष्वपि अवस्थान्तरापत्तिरनुमीयते। चूर्णितविशीर्णघटस्येव तु सूक्ष्मावस्थाप्राप्त्यानुपलम्भः। अतो न कश्चिद्दोष इति भावः। व्यवहारविशेषोऽत्र उदकाहरणादिरभि मतः नामान्तरभजनस्य पृथगुक्तत्वात्। एतेन कारणसङ्ख्यापरिमाणादिबुद्धिसंस्थानादिभेदः पूर्वत्वोत्तरत्वनष्टत्वानष्टत्वादिरपि निर्व्यूढः। द्रव्यान्तरत्वकल्पनायां गुरुत्वान्तरकार्यादिप्रसङ्गस्य अवयवावयविगुरुत्वयोरन्यतरप्रतिबन्धादिना निर्वाहश्च अतिक्लिष्ट इत्यभइप्रायेणाह न च द्रव्यान्तरेति। आहुश्च यदि द्रव्यान्तरं कार्यं कारणेभ्यो भवेदिह। गुरुत्वमतिरिच्येत कार्ये तच्च न दृश्यते। द्विपलं घट इत्येतद्व्यपदेशो न युज्यते म.भा. इति। निगमयति अत इति। तावत एवोपलम्भादन्यस्यानुपलम्भात् कल्पकानां चान्यथैवोपपन्नत्वादित्यर्थः।ननु भवतु नामोत्पत्तिर्द्रव्यस्यावस्थाविशेषः विनाशस्त्वभावरूपः तद्विरुद्धश्च कथं तदवस्थेत्युच्यत इत्यत्राह उत्पत्त्याख्यामिति। अयमभिप्रायः न तावदभावाख्यं किञ्चित्पदार्थान्तरं विविच्योपलभामहे नापि नास्तिव्यवहारादिना कल्पयितुं युक्तम् उभयसम्प्रतिपन्नावस्थान्तरादिनैव निर्वाहात्। न च श्यामावस्थाप्रहाणेन रक्तावस्थापरिग्रहे घटनाशव्यवहारप्रसङ्गः कपालाद्यवस्थावत् रक्तावस्थाया घटावस्थाविरोधित्वस्य भवताप्यनभ्युपगमात्। न च भावत्वेनैकराश्यनुप्रविष्टानां विरोधो युज्यत इति वाच्यम् तेजस्तिमिरशीतोष्णतृणदहनादीनां भावानामेव सहानवस्थानवध्यघातुकत्वलक्षणविरोधदर्शनात् अभावाभावस्य च भावत्वस्वीकारात्। अन्यथा पदार्थत्वेनैकराशेरभावस्यापि भावविरोधो न कथञ्चिदुपपद्यते। तदेवं विरोध्युत्तरावस्था प्रध्वंसः। विरोधिपूर्वावस्था प्रागभावः। वस्त्वन्तरगतासाधारणविरोधिधर्म एव समानाधिकरणव्यधिकरणनिषेधभेदेनान्योन्याभावोऽत्यन्ताभावश्च। देशकालसम्भेदविशेषस्तत्कृतावस्थाविशेषो वा संसर्गाभावः। प्रतियोग्यादिभेदाच्च पितृत्वपुत्रत्वादिव्यहारवत् अस्तिनास्तीत्यादिव्यवहारवैचित्र्यमिति।ननु यदि कपालत्वाद्युत्तरावस्थाप्राप्तिर्विनाशः तर्हि कपालविनाशे घटविनाश एव विनष्टः स्यादिति चूर्णावस्थायां घटोन्मज्जनप्रसङ्गः यदि च पिण्डावस्था घटप्रागभावः तदा पिण्डीकारात्पूर्वं प्रागभावाभावाद्धटसिद्धिर्घटात्यन्ताभावो वा स्यादित्यत्राह मृद्द्रव्यस्येति। अयमभिप्रायः न तावदेकैव कपालत्वावस्था घटत्वावस्थाविरोधिनी। चूर्णत्वाद्यवस्थानामपि तद्विरोधित्वादभावरूपं प्रध्वंसमभ्युपगच्छतोऽपि विरोध्यवस्थापरम्परा अवर्जनीया। ततः कपालत्वचूर्णत्वादीनां विरोध्युत्तरावस्थात्वाविशेषात्तासु सर्वास्ववस्थासु घटविनाशाव्यवहारोपपत्तिः। एवं प्रागभावेऽपि विरोधिपूर्वावस्थापरम्परया निर्वाहः। एवमनभ्युपगमे व्यतिरिक्ताभावपक्षेऽप्युक्तदोषो दुर्वारः। तत्रापि हि यदि घटाख्यं द्रव्यं घटप्रागभावनिवृत्तिः तर्हि घटनिवृत्तौ घटप्रागभावनिवृत्तिरेव निवृत्तेति पुनः घटप्रागभावोन्मज्जनप्रसङ्गः। तथाच सति मध्ये प्रागभावस्य विच्छेदायोगाद्धट एव न स्यात्। प्रागभावस्य च सामग्रीसम्पत्तौ भावशिरस्कत्वान्नष्टाया एव घटव्यक्तेः पुनरुन्मज्जनं स्यात्। एवं यदि प्रध्वंसस्य घट एव प्रागभावस्तदा घटोत्पत्तेः पूर्वं प्रध्वंसप्रागभावाभावात्पिण्डावस्थायां घटप्रध्वंसः स्यात्। तथा च सति घट एव कदाचिदपि नोत्पद्येत स्वप्रध्वंसे वर्तमाने स्वोत्पत्त्ययोगात् अन्यथा कपालाद्यवस्थायामपि तदुन्मज्जनप्रसङ्गात्। एवं च पिण्डावस्थायां घटविनाशप्रसङ्गे विनाशस्य भावोत्तरकालीनत्वात्पिण्डात्प्रागेव घटसिद्धिः स्यात्। ततश्च तत्सिद्धिनाशकालयोर्द्वयोरपि कारकव्यापारानर्थक्यं स्यादित्यादि दूषणशतं देयम्। अतः सुष्ठूक्तंविरोध्यवस्थापरम्परैव प्रागभावप्रध्वंसौ इति।पिण्डत्वघटत्वेत्यादिनामही घटत्वं घटतः कपालिका कपालिकाचूर्णरजस्ततोऽणुः वि.पु.2।12।42 इति भगवत्पराशरवचनं स्मारयति। तत्र हि प्रकरणे नास्त्यवस्त्वसत्यादिशब्दानामवस्थान्तरापत्तिनिबन्धनत्वं स्पष्टम्। व्याख्यातं च शारीरकभाष्ये।नन्वेवमपिजातस्य हि ध्रुवो मृत्युः इत्येतावदुपद्यताम् उत्पन्नस्य घटादेर्नाशदर्शनात्।ध्रुवं जन्म मृतस्य च इति तु नोपपद्यते नष्टस्य घटादेः पुनरुत्पत्त्यदर्शनात् न च पुनरुत्पत्तिरस्य शोकनिमित्तं येन तस्यावर्जनीयत्वं प्रतिपाद्येतेत्यत्राह तत्रेति। अयमभिप्रायः यदवस्थस्य द्रव्यस्य विनाशः न तदवस्थस्यैव पुनरुत्पत्तिरुच्यते किन्तु तस्यैव द्रव्यस्यावस्थान्तरविशिष्टस्य। एकमेव हि द्रव्यं घटाकारेण नष्टं कापालाकारेणोत्पद्यते। एकैव हि कपालावस्था घटावस्थस्य द्रव्यस्य नाशः कपालावस्थस्य तस्यैवोत्पत्तिः। अत एवोपपन्नं नष्टस्यैवोत्पत्तिरिति।सैव उत्तरावस्थाप्राप्तिरित्यर्थः। अत्र प्राप्तिशब्देन प्रथमक्षणागमस्य विवक्षितत्वादुत्तरेषु क्षणेषूत्पत्तिशब्दप्रयोगाभाव उपपन्न इति सूचितम्। एवं सति पुनरुत्पत्तेरवर्जनीयत्वप्रतिपादनं च नाशावर्जनीयत्वप्रतिपादनमेव। तत एव शोकापनोदनार्थताऽपि युक्ता। यद्वा यदीदमचिद्द्रव्यं नष्टमिति शोचसि तर्हि तदेव हि द्रव्यं तदुत्तरावस्थं तथोत्पन्नमिति किं न प्रीयस इति भावः। एकस्यैव परिणामस्य निरूपणभेदादुत्पत्त्याख्या विनाशाख्या चेतिउत्पत्तिविनाशाख्यपरिणामेत्युक्तम्। एवं प्रलयापेक्षया सृष्टेर्विनाशत्वेऽपि पुरुषार्थयोगायोगादिविवक्षया व्यवहारव्यवस्था।परिणामिन इति अपरिहार्यत्वकारणं तत्स्वभावत्वमुक्तम्। इतिशब्देनापरिहार्यपदं हेत्वभिप्रायमिति व्यञ्जयति।