श्लोक · Shlok 5
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः | दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥
aśāstravihitaṃ ghoraṃ tapyante ye tapo janāḥ. dambhāhaṃkārasaṃyuktāḥ kāmarāgabalānvitāḥ.
Translation · अर्थ
English
Those men who practise terrific austerities not enjoined by the scriptures, given to hypocrisy and egoism, impelled by the force of lust and attachment.
Sūtradhāra Vichār
Classical commentaries
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A.C. Bhaktivedanta Swami PrabhupadaEnglish Commentary+
There are persons who manufacture modes of austerity and penance which are not mentioned in the scriptural injunctions. For instance, fasting for some ulterior purpose, such as to promote a purely political end, is not mentioned in the scriptural directions. The scriptures recommend fasting for spiritual advancement, not for some political end or social purpose. Persons who take to such austerities are, according to Bhagavad-gītā, certainly demoniac. Their acts are against the scriptural injunctions and are not beneficial for the people in general. Actually, they act out of pride, false ego, lust and attachment for material enjoyment. By such activities, not only is the combination of material elements of which the body is constructed disturbed, but also the Supreme Personality of Godhead Himself living within the body. Such unauthorized fasting or austerities for some political end are certainly very disturbing to others. They are not mentioned in the Vedic literature. A demoniac person may think that he can force his enemy or other parties to comply with his desire by this method, but sometimes one dies by such fasting. These acts are not approved by the Supreme Personality of Godhead, and He says that those who engage in them are demons. Such demonstrations are insults to the Supreme Personality of Godhead because they are enacted in disobedience to the Vedic scriptural injunctions. The word acetasaḥ is significant in this connection. Persons of normal mental condition must obey the scriptural injunctions. Those who are not in such a position neglect and disobey the scriptures and manufacture their own way of austerities and penances. One should always remember the ultimate end of the demoniac people, as described in the previous chapter. The Lord forces them to take birth in the wombs of demoniac persons. Consequently they will live by demoniac principles life after life without knowing their relationship with the Supreme Personality of Godhead. If, however, such persons are fortunate enough to be guided by a spiritual master who can direct them to the path of Vedic wisdom, they can get out of this entanglement and ultimately achieve the supreme goal.
Swami SivanandaEnglish Commentary+
अशास्त्रविहितम् not enjoined by the scriptures? घोरम् terrific? तप्यन्ते practise? ये who? तपः austerity? जनाः men? दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः given to hypocrisy and egoism? कामरागबलान्विताः by the force of lust and attachment.Commentary There are some who think that the mortification of the body is the proper means to attain the goal of life. They do this in order to attract the people and get money for the gratification of their senses. They stand on one leg with raised hands. This is not real Tapas. This is Tamasic Tapas. Bodily torture will not bring emancipation. These men are not acainted with even the first elements of the scriptures. They mock at the religious practices of the wise? elderly persons and jeer at learned men. They are puffed up with the vanity of their own greatness. They are proud of their wealth. They perform unauthorised austerities. These persons do severe austerities contrary to the scriptures on the strength of desire and attachment.They take even the lives of children to propitiate their deity. Instead of killing their egoism? they kill many innocent animals in the name of sacrifice but in reality they kill them to satisfy their own palate. Most horrible indeed They speak ill of the scriptures and wander about in the forest of delusion and infatuation. They follow the dictates of passion. They inflict pain on themselves and on others. They practise austerities which cause pain to themselves and to other living beings. Pitiable indeed is their lot. They are doomed to destruction.Kamaragabalanvitah may also be interpreted as possessed of lust? attachment and power.Dambha Ostentation The man of Dambha is desirous that all people should take him for a virtuous man and so he expresses to others his righteous nature. In reality he is not virtuous. He pretends to be what he is not.Ahankara Egoism The egoistic man thinks and feels that he is superior to others in the possession of all virtuous alities.Raga Extreme attachment to sensual objects.Bala Great power of enduring severe pain on account of Raga for sensual objects (pain that accrues from exertion in attaining and preserving the objects).Kama Lust Desire for any object.
Swami ChinmayanandaHindi Commentary+
See Commentary under 17.6
Swami RamsukhdasHindi Commentary+
व्याख्या -- अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः -- शास्त्रमें जिसका विधान नहीं है? प्रत्युत निषेध है? ऐसे घोर तपको करनेमें उनकी रुचि होती है अर्थात् उनकी रुचि सदा शास्त्रसे विपरीत ही होती है। कारण कि तामसी बुद्धि (गीता 18। 32) होनेसे वे स्वयं तो शास्त्रोंको जानते नहीं और दूसरा कोई बता भी दे तो वे न उसको मानना चाहते हैं तथा न वैसा करना ही चाहते हैं।दम्भाहंकारसंयुक्ताः -- उनके भीतर यह बात गहरी बैठी हुई रहती है कि आज संसारमें जितने भजन? ध्यान? स्वाध्याय आदि करते हैं? वे सब दम्भ करते हैं? दम्भके बिना दूसरा कुछ है ही नहीं। अतः वे खुद भी दम्भ करते हैं। उनके भीतर अपनी बुद्धिमानीका? चतुराईका? जानकारीका अभिमान रहता है कि हम बड़े जानकार आदमी हैं हम लोगोंको समझा सकते हैं? उनको रास्तेपर ला सकते हैं हम शास्त्रोंकी बातें क्यों सुनें हम कोई कम जानते हैं क्या हमारी बातें सुनो तो तुम्हारेको पता चले आदिआदि।कामरागबलान्विताः -- काम शब्द भोगपदार्थोंका वाचक है। उन पदार्थोंमें रँग जाना? तल्लीन हो जाना? एकरस हो जाना राग है और उनको प्राप्त करनेका अथवा उनको बनाये रखनेका जो हठ? दुराग्रह है? वह बल है। इनसे वे सदा युक्त रहते हैं। उन आसुर स्वभाववाले लोगोंमें यह भाव रहता है कि मनुष्यशरीर पाकर इन भोगोंको नहीं भोगा तो मनुष्यशरीर पशुकी तरह ही है। सांसारिक भोगसामग्रीको मनुष्यने प्राप्त नहीं किया? तो फिर उसने क्या किया मनुष्यशरीर पाकर मनचाही भोगसामग्री नहीं मिली? तो फिर उसका जीवन ही व्यर्थ है? आदिआदि। इस प्रकार वे प्राप्त सामग्रीको भोगनेमें सदा तल्लीन रहते हैं और धनसम्पत्ति आदि भोगसामग्रीको प्राप्त करनेके लिये हठपूर्वक? जिदसे तप किया करते हैं।कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्रामम् -- वे शरीरमें स्थित पाँच भूतों(पृथ्वी? जल? तेज? वायु और आकाश) को कृश करते हैं? शरीरको सुखाते हैं और इसीको तप समझते हैं। शरीरको कष्ट दिये बिना तप नहीं होता -- ऐसी उनकी स्वाभाविक धारणा रहती है।आगे चौदहवें? पन्द्रहवें और सोलहवें श्लोकमें जहाँ शरीर? वाणी और मनके तपका वर्णन हुआ है? वहाँ शरीरको कष्ट देनकी बात नहीं है। वह तप बड़ी शान्तिसे होता है। परन्तु यहाँ जिस तपकी बात है? वह शास्त्रविरुद्ध घोर तप है और अविधिपूर्वक शरीरको कष्ट देकर किया जाता है।मां चैवान्तःशरीरस्थम् -- भगवान् कहते हैं कि ऐसे लोग अन्तःकरणमें स्थित मुझ परमात्माको भी कृश करते हैं? दुःख देते हैं। कैसे वे मेरी आज्ञा? मेरे मतके अनुसार नहीं चलते? प्रत्युत उसके विपरीत चलते हैं।अर्जुनने पूछा था कि वे कौनसी निष्ठावाले हैं -- सात्त्विक हैं कि राजसतामस दैवीसम्पत्तिवाले हैं कि आसुरीसम्पत्तिवाले तो भगवान् कहते हैं कि उनको आसुर निश्चयवाले समझो -- तान्विद्धि आसुरनिश्चयान्। यहाँ आसुरनिश्चयान् पद सामान्य आसुरीसम्पत्तिवालोंका वाचक नहीं है? प्रत्युत उनमें भी जो अत्यन्तनीच -- विशेष नास्तिक हैं? उनका वाचक है।विशेष बातचौथे श्लोकमें शास्त्रविधिको न जाननेवाले श्रद्धायुक्त मनुष्योंके द्वारा किये जानेवाले पूजनके लिये यजन्ते पद आया है परन्तु यहाँ शास्त्रविधिका त्याग करनेवाले श्रद्धारहित मनुष्योंके द्वारा किये जानेवाले पूजनके लिये तप्यन्ते पद आया है। इसका कारण यह है कि आसुर निश्चयवाले मनुष्योंकी तप करनेमें ही पूज्यबुद्धि होती है -- तप ही उनका यज्ञ होता है और वे मनगढ़ंत रीतिसे शरीरको कष्ट देनेको ही तप मानते हैं। उनके,तपका लक्षण है -- शरीरको सुखाना? कष्ट देना। वे तपको बहुत महत्त्व देते हैं? उसे बहुत अच्छा मानते हैं परन्तु भगवान्को? शास्त्रको नहीं मानते। तप भी वही करते हैं? जो शास्त्रके विरुद्ध है। बहुत ज्यादा भूखे रहना? काँटोंपर सोना? उलटे लटकना? एक पैरसे खड़े होना? शास्त्राज्ञासे विरुद्ध अग्नि तपना? अपने शरीर? मन? इन्द्रियोंको किसी तरह कष्ट पहुँचाना आदि -- ये सब आसुर निश्चयवालोंके तप होते हैं।सोलहवें अध्यायके तेईसवें श्लोकमें शास्त्रविधिको जानते हुए भी उसकी उपक्षा करके दानसेवा? उपकार आदि शुभकर्मोंको करनेकी बात आयी है? जो इतनी बुरी नहीं है क्योंकि उनके दान आदि कर्म शास्त्रविधियुक्त तो नहीं हैं? पर शास्त्रनिषिद्ध भी नहीं हैं। परन्तु यहाँ जो शास्त्रोंमें विहित नहीं हैं? उनको ही श्रेष्ठ मानकर मनमाने ढंगसे विपरीत कर्म करनेकी बात है। दोनोंमें फरक क्या हुआ तेईसवें श्लोकमें कहे लोगोंको सिद्धि? सुख और परमगति नहीं मिलेगी अर्थात् उनके नाममात्रके शुभकर्मोंका पूरा फल नहीं मिलेगा। परन्तु यहाँ कहे लोगोंको तो नीच योनियों तथा नरकोंकी प्राप्ति होगी क्योंकि इनमें दम्भ? अभिमान आदि हैं। ये शास्त्रोंको मानते भी नहीं? सुनते भी नहीं और कोई सुनाना चाहे तो सुनना चाहते भी नहीं। सोलहवें अध्यायके तेईसवें श्लोकमें शास्त्रका उपेक्षापूर्वक त्याग है? इसी अध्यायके पहले श्लोकमें शास्त्रका अज्ञतापूर्वक त्याग है और यहाँ शास्त्रका विरोधपूर्वक त्याग है। आगे तामस यज्ञादिमें भी शास्त्रकी उपेक्षा है। परन्तु यहाँ श्रद्धा? शास्त्रविधि? प्राणिसमुदाय और भगवान् -- इन चारोंके साथ विरोध है। ऐसा विरोध दूसरी जगह आये राजसीतामसी वर्णनमें नहीं है। सम्बन्ध -- अगर कोई मनुष्य किसी प्रकार भी यजन न करे? तो उसकी श्रद्धा कैसे पहचानी जायगी -- इसे बतानेके लिये भगवान् आहारकी रुचिसे आहारीकी निष्ठाकी पहचानका प्रकरण आरम्भ करते हैं।
Sri Abhinav GuptaSanskrit Commentary+
।।17.4 -- 17.6।।यजन्त इत्यादि आसुरनिश्चयानित्यन्तम्। अचेतनम् अविवेकित्त्वात्। मां च कर्शयन्तः शास्त्रार्थननुष्ठानात्। अत एव ते स्वबुद्धिविरचितां ( N स्वबुद्धिविचारिताम् ) तपश्चर्यां कुर्वणाः प्रत्युत तामसाः।
Sri AnandgiriSanskrit Commentary+
ननु सत्त्वादिनिष्ठाः शास्त्रेण ज्ञातुं शक्यन्ते कुतः कार्यलिङ्गकानुमानेनेति तत्राह -- एवमिति। सत्त्वादिनिष्ठानां जन्तूनामवान्तरविशेषं प्रचुरत्वाप्रचुरत्वरूपं दर्शयति -- तत्रेत्यादिना। राजसानां तामसानां च प्राचुर्यं प्रश्नद्वारा विवृणोति -- कथमित्यादिना। कामश्च काम्यमानविषयो रागश्च तद्विषयभोगाभिलाषस्तत्कृतं तत्प्रयुक्तम्। तन्निमित्तमिति यावत्।
Sri DhanpatiSanskrit Commentary+
एवं कार्यतो निर्णीतानां सत्त्वादिनिष्ठानां मध्ये देवपूजादितत्परस्य सत्त्वनिष्ठस्य दौर्लभ्यं रजस्तमोनिष्ठानां बाहुल्यं च ज्ञापयितुं आह। अशास्त्रविहितं शास्त्रविहितं श्रुतिस्मृत्यादिरुपेण शास्त्रेण विहितं न भवति तत्? शास्त्रं न भवतीत्यशास्त्रं तेन बुद्धाद्यागमेन बोधितमिति वा। घोरं प्राणिनामात्मनश्च पीडाकरं तपो ये जनास्तप्यन्ते निर्वर्तयन्ति। जनान्विशिनष्टि। दम्भाहंकारसंयुक्ताः दम्भो धर्मध्वजित्वं? अहंकारोऽहमेव सर्वोत्तम इति दुरभिमानस्ताभ्यां सम्यग्युक्ताः। कामरागबलान्विताः कामो विषयाभिलाषः कामस्य कारणीभूतो विषयाभिरञ्जनात्मको रागः कामरागाभ्यां कृतं बलं विषयसंपादनोत्साहस्तेनान्विताः? कामरागबलैरन्विता इति वा।
Sri JayatrithaSanskrit Commentary+
Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
Sri MadhavacharyaSanskrit Commentary+
Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
Sri Madhusudan SaraswatiSanskrit Commentary+
।।17.5 -- 17.6।।एवमनादृतशास्त्राणां सत्त्वादिनिष्ठा कार्यतो निर्णीता। तत्र केचिद्राजसतामसा अपि प्राग्भवीयपुण्यपरिपाकात्सात्त्विका भूत्वा शास्त्रीयसाधनेऽधिक्रियन्ते। ये तु दुराग्रहेण दुर्दैवपरिपाकप्राप्तदुर्जनसङ्गादिदोषेण च राजसतामसतां न मुञ्चन्ति ते शास्त्रीयमार्गाद्भ्रष्टा असन्मार्गानुसरणेनेह लोके परत्र च दुःखभागिन एवेत्याह द्वाभ्याम् -- अशास्त्रेत्यादिना। अशास्त्रविहितं शास्त्रेण वेदेन प्रत्यक्षेणानुमितेन वा न विहितं अशास्त्रेण बुद्धाद्यागमेन बोधितं वा घोरं परस्यात्मनः पीडाकरं तपस्तप्तशिलारोहणादि तप्यन्ते कुर्वन्ति ये जनाः। दम्भो धार्मिकत्वख्यापनं? अहंकारोऽहमेव श्रेष्ठ इति दुरभिमानस्ताभ्यां सम्यग्युक्ताः। योगस्य सम्यक्त्वमनायासेन योगजननासामर्थ्यं कामे काम्यमानविषये यो रागस्तन्निमित्तं बलमत्युग्रदुःखसहनसामर्थ्यं तेनान्विताः। कामो विषयेऽभिलाषः? रागः सदा तदभिनिविष्टत्वरूपोऽभिष्वङ्गः। बलमवश्यमिदं साधयिष्यामीत्याग्रहस्तैरन्विता इति वा। अतएव च बलवद्दुःखदर्शनेऽप्यनिवर्तमानाः कर्शयन्तः कृशीकुर्वन्तो वृथोपवासादिना शरीरस्थं भूतग्रामं देहेन्द्रियसङ्घाताकारेण परिणतं पृथिव्यादिभूतसमुदायं अचेतसो विवेकशून्याः मां चान्तःशरीरस्थं भोक्तृरूपेण स्थितं भोग्यस्य शरीरस्य कृशीकरणेन कृशीकुर्वन्त एव मामन्तर्यामित्वेन शरीरान्तःस्थितं बुद्धितद्वृत्तिसाक्षिभूतमीश्वरमाज्ञालङ्घनेन कर्शयन्त इति वा। तानैहिकसर्वभोगविमुखान् परत्र चाधमगतिभागिनः सर्वपुरुषार्थभ्रष्टानासुरनिश्चयानासुरो विपर्यासरूपो वेदार्थविरोधी निश्चयो येषां तान् मनुष्यत्वेन प्रतीयमानानप्यसुरकार्यकारित्वादसुरान्विद्धि जानीहि। परिहरणाय निश्चयस्यासुरत्वात्तत्पूर्विकाणां सर्वासामन्तःकरणवृत्तीनामासुरत्वमसुरत्वजातिरहितानां च मनुष्याणां कर्मणैवासुरत्वात्तानसुरान्विद्धीति साक्षान्नोक्तमिति च द्रष्टव्यम्।
Sri NeelkanthSanskrit Commentary+
सात्त्विकानां दौर्लभ्यमभिप्रेत्याह -- अशास्त्रेति। शास्त्रं वेदादि तद्विरोधिना कौलिकाद्यागमेन विहितं घोरं स्वमांसहोमेन ब्राह्मणलोहितादिना वा देवतासंतर्पणाद्यात्मकं ये जनास्तपस्तप्यन्ते तानासुरनिश्चयान्विद्धीति द्वयोः संबन्धः। दम्भो धर्मध्वजित्वम्? अहंकारः स्वस्मिन्पूज्यताबुद्धिः ताभ्यां संयुक्ताः। कामरागो विषयाभिलाषः? बलं साहसेनापि विषयसाधने उत्साहस्ताभ्यामन्विताः।
Sri PurushottamjiSanskrit Commentary+
अथ सात्त्विकानामपि देवादिपूजननिश्चयोऽप्यासुर एव? अनुक्तत्वादित्याह द्वयेनअशास्त्रेति। ये जनाः जननादिक्लेशेन अज्ञाः अशास्त्रविहितं अन्धपारम्पर्यागतं शास्त्रनिषिद्धं वा दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः परप्रतारणस्वोत्तमत्वख्यापनाज्ञानाभ्यां देवताप्रसादार्थं सात्त्विकवदाभासमानं निश्चयेन तपः देहक्लेशं अभोजनादिना ये तप्यन्ते कुर्वन्ति। ये च घोरं यक्षादिप्रसादरूपं राज्यधनाद्यपेक्षार्थं तपः कुर्वन्ति। कामरागबलान्विताः? कामो विषयाभिलाषः? रागो भोगासक्तिः? बलमाग्रहस्तैरन्विताः प्रेरिताः सन्तः।
Sri RamanujaSanskrit Commentary+
अशास्त्रविहितम् अति घोरम् अपि तपो ये जनाः तप्यन्ते? प्रदर्शनार्थम् इदम्? अशास्त्रविहितं बह्वायासं यागादिकं ये कुर्वते? ते दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः शरीरस्थं पृथिव्यादिभूतसमूहं कर्शयन्तो मदंशभूतं जीवं च अन्तःशरीरस्थं कर्शयन्तो ये तप्यन्ते यागादिकं च कुर्वते? तान् आसुरनिश्चयान् विद्धि।
Sri ShankaracharyaSanskrit Commentary+
--,अशास्त्रविहितं न शास्त्रविहितम् अशास्त्रविहितं घोरं पीडाकरं प्राणिनाम् आत्मनश्च तपः तप्यन्ते निर्वर्तयन्ति ये तपो जनाः ते च दम्भाहंकारसंयुक्ताः? दम्भश्च अहंकारश्च दम्भाहंकारौ? ताभ्यां संयुक्ताः दम्भाहंकारसंयुक्ताः? कामरागबलान्विताः कामश्च रागश्च कामरागौ तत्कृतं बलं कामरागबलं तेन अन्विताः कामरागबलान्विताः।।
Sri Sridhara SwamiSanskrit Commentary+
राजसतामसेषु पुनर्विशेषान्तरमाह -- अशास्त्रविहितमिति द्वाभ्याम्। शास्त्रविधिमजानन्तोऽपि केचित्प्राचीनपुण्यसंस्कारेणोत्तमाः सात्त्विका एव भवन्ति। केचित्तु मध्यमा राजसा भवन्ति। अधमास्तु तामसा भवन्ति। ये पुनरत्यन्तं मन्दभाग्याः गतानुगत्या पाखण्डसङ्गेन च तदाचारानुवर्तिनः सन्तः अशास्त्रविहितं घोरं भयंकरं तपस्तप्यन्ते कुर्वन्ति। तत्र हेतवःदम्भाहंकाराभ्यां संयुक्ताः तथा कामोऽभिलाषः? राग आसक्तिः? बलमाग्रहः? एतैरन्विताः सन्तः? तानासुरनिश्चयान्विद्धीत्युत्तरेणान्वयः।
Sri VallabhacharyaSanskrit Commentary+
तेष्वपि पूर्ववद्विशेषमाह -- अशास्त्रविहितमिति द्वाभ्याम्। शास्त्रीयं पूर्वमुक्तम्। ये तु जना शास्त्रविधिमुत्सृज्य कामकारतः येषां कामकार एव हेतुस्तत एव तपस्तप्यन्ते शम्बुकादिवत् तानासुरनिश्चयान् विद्धीत्युत्तरेणान्वयः।
Vedantadeshikacharya VenkatanathaSanskrit Commentary+
एवमर्थात्प्रश्नस्य निषेधः कृतः अथ कण्ठोक्त्येत्यभिप्रायेणाऽऽह -- एवमिति।न स सिद्धिम् [16।23] इत्यादिप्रागुक्तस्मारणायन कश्चिदपि सुखलव इत्युक्तम्।अपित्वनर्थ एवेत्यनेन पूर्वोक्तनरकपतनस्मारणम्। प्रश्नवाक्यगतश्रद्धान्वितत्वानुभाषणविवक्षया तत्कार्यातिप्रयासज्ञापनपरो घोरशब्द इत्यभिप्रायेणाऽऽहअतिघोरमपीति। ननुयजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः [9।23] इति यागविषये प्रश्ने तप्यन्त इति तपसोत्तरं कथं सङ्गच्छते इत्यत्राऽऽहप्रदर्शनार्थमिदमिति। सङ्ग्राहकाकारं दर्शयन् फलितमाहअशास्त्रविहितमिति। वेदबाह्यागमोक्तं वैदिकमप्यनधिकारिभिर्देशकालद्रव्यक्रियादिनियमानादरेणायथानुष्ठितं चाशास्त्रविहितम्। दारुणपर्यायघोरशब्दाभिप्रेतमाहबह्वायासमिति।यागादिकमित्यनेन प्रश्नेऽपि यागग्रहणं प्रदर्शनार्थमिति ज्ञापितम्। अत एव हि प्रश्नोत्तरयोरेकविषयत्वम्। शास्त्रैरचोदितानां चोदकान्तरमुच्यते -- दम्भाहङ्कारसंयुक्ता इत्यादिना। बलमत्र कामरागयुक्तत्वादसात्त्विकम्।बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् [7।11] इति हि प्रागुक्तम्। न केवलं परत्र नरकम् अपित्विहापि कायकर्शनमित्यभिप्रायेण शरीरस्थभूतसमूहकर्शनोक्तिः।अन्तर्याम्यमृतः [बृ.उ.3।7।3 -- 23] अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति [मुं.उ.3।1।1]न स्थानतोऽपि परस्योभयलिङ्गं सर्वत्र हि [ब्र.सू.3।2।11] इत्यादिभिः परमात्मनः स्वरूपतो धर्मतो वा कर्शनासम्भवात्। सम्भवे च शास्त्रविहितोपवासादिभिरपि प्रसङ्गाच्छरीरकर्शनेन च शरीरिणां क्षेत्रज्ञानां ज्ञानसुखादिसङ्कोचरूपस्य कर्शनस्य श्रुतिस्मृतिलोकसिद्धत्वात्अन्तश्शरीरस्थम् इत्यनेन शरीरावच्छिन्नक्षेत्रज्ञत्वसूचनात्क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि [13।3]ममैवांशः [15।7] इति प्रागुक्तप्रक्रियया सर्वशरीरकपरमात्मविशेषणांशभूतजीवविवक्षयाऽत्र मामिति निर्देश इत्याहमदंशभूतं जीवमिति। मच्छरीरभूतजीवपीडनं मत्पीडनतुल्यमिति दोषातिशयसूचनार्थोऽयमुपचारः। शास्त्रोल्लङ्घनेनात्मपीडनरूपमपि पापमेषामायातमित्यभिप्रायः। यज्ञस्य स्वतो याज्यभावनत्वाच्छास्त्रीयप्रकारविरहेऽपि नात्यन्तविकलता तपसस्तु स्वतः सर्वकर्शनतया शास्त्रीयप्रकाराभावे भावनत्वं न स्यादिति हैतुकप्रायाणां विभागं प्रतिक्षेप्तुमाहयागादिकं चेति। आसुरो निश्चयो येषां तेऽत्रासुरनिश्चयाः तत्र तद्धितस्येह सम्बन्धमात्रपरतामाहअसुराणामिति। तदभिप्रेतनिश्चयस्य विशेषं व्यञ्जयितुमाहअसुराहीति। आसुरनिश्चयत्वख्यापनं प्रागुक्तानर्थपर्यवसानप्रकाशनायेत्याहमदाज्ञाविपरीतकारित्वादिति।आसुरनिश्चयान् इत्येतावता कथमयमर्थः सिद्ध्येत् इत्यत्राऽऽह -- पूर्वमेवेति।