श्लोक · Shlok 42
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु | एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्॥
yaccāvahāsārthamasatkṛto.asi vihāraśayyāsanabhojaneṣu. eko.athavāpyacyuta tatsamakṣaṃ tatkṣāmaye tvāmahamaprameyam.
Translation · अर्थ
English
In whatever way I may have insulted Thee for the sake of fun, while at play, reposing, sitting or at meals, when alone (with Thee), O Krishna, or in company that I implore Thee, immeasurable one, to forgive.
Sūtradhāra Vichār
Classical commentaries
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A.C. Bhaktivedanta Swami PrabhupadaEnglish Commentary+
Although Kṛṣṇa is manifested before Arjuna in His universal form, Arjuna remembers his friendly relationship with Kṛṣṇa and is therefore asking pardon and requesting Kṛṣṇa to excuse him for the many informal gestures which arise out of friendship. He is admitting that formerly he did not know that Kṛṣṇa could assume such a universal form, although Kṛṣṇa explained it as his intimate friend. Arjuna did not know how many times he may have dishonored Kṛṣṇa by addressing Him “O my friend,” “O Kṛṣṇa,” “O Yādava,” etc., without acknowledging His opulence. But Kṛṣṇa is so kind and merciful that in spite of such opulence He played with Arjuna as a friend. Such is the transcendental loving reciprocation between the devotee and the Lord. The relationship between the living entity and Kṛṣṇa is fixed eternally; it cannot be forgotten, as we can see from the behavior of Arjuna. Although Arjuna has seen the opulence in the universal form, he cannot forget his friendly relationship with Kṛṣṇa.
Swami SivanandaEnglish Commentary+
यत् whatever? च and? अवहासार्थम् for the sake of fun? असत्कृतः disrespected? असि (Thou) art? विहारशय्यासनभोजनेषु while at play? on bed? while sitting or at meals? एकः (when) one? अथवा or? अपि even? अच्युत O Krishna? तत् so? समक्षम् in company? तत् that? क्षामये implore to forgive? त्वाम् Thee? अहम् I? अप्रमेयम् immeasurable.Commentary Arjuna? beholding the Cosmic Form of Lord Krishna? seeks forgiveness for his past familiar conduct. He says? I have been stupid. I have treated Thee with familiarity? not knowing Thy greatness. I have taken Thee as my friend on account of misconception. I have behaved badly with Thee. Thou art the origin of this universe and yet I have joked with Thee. I have taken undue liberties with Thee. Kindly forgive me? O Lord.Tat All those offences.Achyuta He who is unchanging.In company In the presence of others.Aprameyam Immeasurable. He Who has unthinkable glory and splendour.
Swami ChinmayanandaHindi Commentary+
जब कोई सामान्य व्यक्ति अकस्मात् ही परमात्मा के महात्म्य का परिचय पाता है? तब उसके मन में जिन भावनाओं का निश्चित रूप से उदय होता है? उन्हें इन दो सुन्दर श्लोकों के द्वारा नाटकीय यथार्थता के साथ सामने लाया गया है। अब तक अर्जुन? भगवान् श्रीकृष्ण को एक बुद्धिमान् गोपाल से अधिक कुछ नहीं समझता था? जिसे उसने बड़ी उदारता से अपनी राजमैत्री का आश्रय लाभ दिया था। परन्तु? अब श्रीकृष्ण के अनन्तस्वरूप का वास्तविक परिचय पाकर अर्जुन में स्थित जीवभाव उनके समक्ष दृढ़ निष्ठा एवं सम्मान के साथ प्रणिपात करके उनसे दया और क्षमा की याचना करता है।इन दो श्लोकों में अत्यन्त घनिष्ठता का स्पर्श है। यहाँ बौद्धिक दार्शनिक चिन्तन का घनिष्ठ परिचय के भावुक पक्ष के साथ सुन्दर संयोग हुआ है। गीता का प्रयोजन ही यह है कि वेद प्रतिपादित सत्यों की सुमधुर ध्वनि का व्यावहारिक जगत् की सुखद लय के साथ मिलन कराया जाये। घनिष्ठ परिचय के इन भावुक स्पर्शों के द्वारा व्यासजी की कुशल लेखनी? वेदान्त के विचारोत्तेजक महान् सत्यों को? अचानक? अपने घर की बैठक में होने वाले वार्तालाप के परिचित वातावरण में ले आती है। एक घनिष्ठ मित्र के रूप में प्रमाद या प्रेमवश अर्जुन ने भगवान् श्रीकृष्ण की महिमा को न जानते हुए उन्हें प्रिय नामों से सम्बोधित किया होगा? जिसके लिए उनसे अब्ा वह क्षमायाचना करता है।क्योंकि
Swami RamsukhdasHindi Commentary+
व्याख्या--[जब अर्जुन विराट् भगवान्के अत्युग्र रूपको देखकर भयभीत होते हैं, तब वे भगवान्के कृष्णरूपको भूल जाते हैं और पूछ बैठते हैं कि उग्ररूपवाले आप कौन हैं परन्तु जब उनको भगवान् श्रीकृष्णकी स्मृति आती है कि वे ये ही हैं, तब भगवान्के प्रभाव आदिको देखकर उनको सखाभावसे किये हुए पुराने व्यवहारकी याद आ जाती है और उसके लिये वे भगवान्से क्षमा माँगते हैं।] 'सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति'--जो बड़े आदमी होते हैं, श्रेष्ठ पुरुष होते हैं, उनको साक्षात् नामसे नहीं पुकारा जाता। उनके लिये तो 'आप', महाराज आदि शब्दोंका प्रयोग होता है। परन्तु मैंने आपको कभी 'हे कृष्ण' कह दिया, कभी 'हे यादव' कह दिया और कभी हे सखे कह दिया। इसका कारण क्या था? 'अजानता महिमानं तवेदम्' (टिप्पणी प0 603.1) इसका कारण यह था कि मैंने आपकी ऐसी महिमाको और स्वरूपको जाना नहीं कि आप ऐसे विलक्षण हैं। आपके किसी एक अंशमें अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड विराजमान हैं--ऐसा मैं पहले नहीं जानता था। आपके प्रभावकी तरफ मेरी दृष्टि ही नहीं गयी। मैंने कभी सोचा-समझा ही नहीं कि आप कौन हैं और कैसे हैं। यद्यपि अर्जुन भगवान्के स्वरूपको, महिमाको, प्रभावको पहले भी जानते थे, तभी तो उन्होंने एक अक्षौहिणी सेनाको छोड़कर निःशस्त्र भगवान्को स्वीकार किया था; तथापि भगवान्के शरीरके किसी एक अंशमें अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड यथावकाश स्थित हैं -- ऐसे प्रभावको, स्वरूपको, महिमाको अर्जुनने पहले नहीं जाना था। जब भगवान्ने कृपा करके विश्वरूप दिखाया, तब उसको देखकर ही अर्जुनकी दृष्टि भगवान्के प्रभावकी तरफ गयी और वे भगवान्को कुछ जानने लगे। उनका यह विचित्र भाव हो गया कि ''कहाँ तो मैं और कहाँ ये देवोंके देव! परन्तु मैंने प्रमादसे अथवा प्रेमसे हठपूर्वक, बिना सोचेसमझे, जो मनमें आया, वह कह दिया--'मया प्रमादात्प्रणयेन वापि।।' बोलनेमें मैंने बिलकुल ही सावधानी नहीं बरती!' वास्तवमें भगवान्की महिमाको सर्वथा कोई जान ही नहीं सकता; क्योंकि भगवान्की महिमा अनन्त है। अगर वह सर्वथा जाननेमें आ जायगी तो उसकी अनन्तता नहीं रहेगी, वह सीमित हो जायगी। जब भगवान्की सामर्थ्यसे उत्पन्न होनेवाली विभूतियोंका भी अन्त नहीं है, तब भगवान् और उनकी महिमाका अन्त आ ही कैसे सकता है? अर्थात् आ ही नहीं सकता। 'यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु'-- मैंने आपको बराबरीका साधारण मित्र समझकर हँसी-दिल्लगी करते समय, रास्तेमें चलते-फिरते समय, शय्यापर सोते-जागते समय, आसनपर उठते-बैठते समय, भोजन करते समय जो कुछ अपमानके शब्द कहे, आपका असत्कार किया अथवा हे अच्युत! आप अकेले थे, उस समय या उन सखाओं, कुटुम्बीजनों सभ्य व्यक्तियों आदिके सामने मैंने आपका जो कुछ तिरस्कार किया है, वह सब मैं आपसे क्षमा करवाता हूँ -- 'एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्'। अर्जुन और भगवान्की मित्रताका ऐसा वर्णन आता है कि जैसे दो मित्र आपसमें खेलते हैं, ऐसे ही अर्जुन भगवान्के साथ खेलते थे। कभी स्नान करते तो अर्जुन हाथोंसे भगवान्के ऊपर जल फेंकते और भगवान् अर्जुनके ऊपर। कभी अर्जुन भगवान्के पीछे दौड़ते तो कभी भगवान् अर्जुनके पीछे दौड़ते। कभी दोनों आपसमें हँसते-हँसाते। कभी दोनों परस्पर अपनी-अपनी विशेष कलाएँ दिखाते। कभी भगवान् सो जाते तो अर्जुन कहते -- 'तुम इतने फैलकर सो गये हो, क्या कोई दूसरा नहीं सोयेगा? तुम अकेले ही हो क्या? कभी भगवान् आसनपर बैठ जाते तो अर्जुन कहते -- 'आसनपर तुम अकेले ही बैठोगे क्या? और किसीको बैठने दोगे कि नहीं?अकेले ही आधिपत्य जमा लिया! जरा एक तरफ तो खिसक जाओ।' इस प्रकार अर्जुन भगवान्के साथ बहुत ही घनिष्ठताका व्यवहार करते थे (टिप्पणी प0 603.2)। अब अर्जुन उन बातोंको याद करके कहते हैं कि हे भगवन्! मैंने आपके न जाने कितने-कितने तिरस्कार किये हैं। मेरेको तो सब याद भी नहीं हैं। यद्यपि आपने मेरे तिरस्कारोंकी तरफ खयाल नहीं किया, तथापि मेरे द्वारा आपके बहुत-से तिरस्कार हुए हैं, इसलिये मैं अप्रमेयस्वरूप आपसे सब तिरस्कार क्षमा करवाता हूँ।' भगवान्को'अप्रमेय' कहनेका तात्पर्य है कि दिव्यदृष्टि होनेपर भी आप दिव्यदृष्टिके अन्तर्गत नहीं आते हैं।, सम्बन्ध--अब आगेके दो श्लोकोंमें अर्जुन भगवान्की महत्ता और प्रभावका वर्णन करके पुनः क्षमा करनेके लिये प्रार्थना करते हैं।
Sri Abhinav GuptaSanskrit Commentary+
No commentary.
Sri AnandgiriSanskrit Commentary+
यदयुक्तमुक्तं तत्क्षन्तव्यमित्येव न किंतु यत्परीहासार्थं क्रीडादिषु त्वयि तिरस्करणं कृतं तदपि सोढव्यमित्याह -- यच्चेति। विहरणं क्रीडा व्यायामो वा। शयनं तल्पादिकमासनमास्थायिका सिंहासनादेरुपलक्षणम्। एतेषु विषयभूतेष्विति यावत्। एकशब्दो रहसि स्थितमेकाकिनं कथयतीत्याह -- परोक्षः सन्निति। प्रत्यक्षं परोक्षं वा तदसत्करणं परिभवनं यथा स्यात्तथा यन्मया त्वमसत्कृतोऽसि तत्सर्वमिति योजनामङ्गीकृत्याह -- तच्छब्द इति। क्षमा कारयितव्येत्यत्रापरिमितत्वं हेतुमाह -- अप्रमेयमिति।
Sri DhanpatiSanskrit Commentary+
यच्चावहासार्थं परिहासप्रयोजनायासत्कृतोऽसि परिभूतोऽसि। विहरणं विहारः क्रीडा पादव्यायमो वा? शयनं शय्या? आसनमास्थायिका सिंहासनादि? भोजनमदनमित्येतेषु विहारदिषु असत्करणं चोत्कृष्टेन सह निकृष्टस्य समानतया प्रवृत्तिः। एक परोक्षः रहसि सन्नसत्कृतोऽसि। अथवा समक्षं प्रत्यक्षमपि यत् असत्कृतोसि परोक्षं वा प्रत्यक्षं वा तदसत्करणं यन्मया परिभूतोऽसि तत्सर्वमपराधजाते त्वामहं क्षामये क्षमां कारये। पूर्वं मातुलोयं स्वसमानं ज्ञात्वाऽसत्कृत्येदानीमप्रमेयं बुद्ध्वा क्षामय इत्याशयेनाह -- अप्रमेयमिति। असत्कृतोऽहं क्षमां न करोमीति न वाच्यम्। यतोऽसत्करणएन स्वपदात्सर्वोत्तमात् सदैवाप्रच्युत इति ध्वनयन् संबोधयति -- हेऽच्युतेति।
Sri JayatrithaSanskrit Commentary+
एकः परोक्ष इति क्लिष्टं व्याख्यानमिति ज्ञापयितुं तदर्थमन्वयं च दर्शयति -- एक इति। आद्याक्षरग्रहणेन एशब्दः एकस्य द्योतकः। कशब्दः कारयितृत्वद्योतकः। अन्तर्णीतण्यर्थात्करोतेर्डः। अथापि एवमसत्कारानर्होऽप्यसत्कृतोऽसि।
Sri MadhavacharyaSanskrit Commentary+
एकस्त्वमेव कारयिता? नान्योऽस्त्यथापि।
Sri Madhusudan SaraswatiSanskrit Commentary+
यच्चावहासार्थं परिहासार्थं विहारशय्यासनभोजनेषु विहारः क्रीडा व्यायामो वा? शय्या तूलिकाद्यास्तरणविशेषः? आसनं सिंहासनादि? भोजनं बहूनां पङ्क्तावशनं तेषु विषयभूतेषु असत्कृतोऽसि मया परिभूतोऽसि। एकः सखीन्विहाय रहसि स्थितो वा त्वं। अथवा तत्समक्षं तेषां सखीनां परिहसतां समक्षं वा। हे अच्युत सर्वदा निर्विकार? तत्सर्ववचनरूपमसत्करणरूपं चापराधजातं क्षामये क्षमयामि। त्वामप्रमेयं अचिन्त्यप्रभावं। अचिन्त्यप्रभावेन निर्विकारेण च परमकारुणिकेन भगवता त्वन्माहात्म्यानभिज्ञस्य ममापराधाः क्षन्तव्या इत्यर्थः।
Sri NeelkanthSanskrit Commentary+
तथा यच्च अवहासार्थं विहारादिष्वसत्कृतोऽसि परिभूतोऽसि। एको वा सखीनां वियोगकाले वा तत्समक्षं सखिजनसमक्षं वाऽसत्कृतोऽसि तत्क्षामये क्षमापये। यतस्त्वमप्रमेयोऽचिन्त्यस्वभावः करुणापरः। यतः शत्रुभ्योऽपि शिशुपालादिभ्य उत्तमां गतिं दत्तवानसीत्यर्थः।
Sri PurushottamjiSanskrit Commentary+
च पुनः। सखेति मत्वा अवहासार्थं मिथ्यावादादिभिः एकः केवलो मां विहाय विहारादिकं करोषीत्यादिभिः। अथवा मत्समक्षं विहारे द्यूतमृगयादिषु स्वजनत्वमुद्भावयता? शय्यायां सहशयनेन? आसने सहोपवेशेन? भोजने सहभुञ्जता? इत्यादिषु यत् असत्कृतोऽसि अवमानितोऽसि हे अच्युत च्युतिरहित स्वाङ्गीकृतपरिपालक। अहं त्वामप्रमेयं प्रमातुमयोग्यं तत्सर्वं क्षामये क्षमां कारयामि अप्रमेयत्वेनाऽज्ञानजापराधनिवृत्तिः सूचिता।
Sri RamanujaSanskrit Commentary+
तव अनन्तवीर्यत्वामितविक्रमत्वसर्वान्तरात्मत्वस्रष्टृत्वादिको यो महिमा तम् इमम् अजानतया मया प्रमादात् मोहात् प्रणयेन चिरपरिचयेन वा सखा इतिमम वयस्यः इति मत्वा हे कृष्ण हे यादव हे सखे इति त्वयि प्रसभं विनयापेतं यद् उक्तं यत् च परिहासार्थं सर्वदा एव सत्कारार्हः त्वम् असत्कृतः असि? विहारशय्यासनभोजनेषु च सहकृतेषु एकान्ते वा समक्षं वा यद् असत्कृतः असि? तत् सर्वं त्वाम् अप्रमेयम् अहं क्षामये।
Sri ShankaracharyaSanskrit Commentary+
--,यच्च अवहासार्थं परिहासप्रयोजनाय असत्कृतः परिभूतः असि भवसि क्व विहारशय्यासनभोजनेषु? विहरणं विहारः पादव्यायामः? शयनं शय्या? आसनम् आस्थायिका? भोजनम् अदनम्? इति एतेषु विहारशय्यासनभोजनेषु? एकः परोक्षः सन् असत्कृतः असि परिभूतः असि अथवापि हे अच्युत? तत् समक्षम्? तच्छब्दः क्रियाविशेषणार्थः? प्रत्यक्षं वा असत्कृतः असि तत् सर्वम् अपराधजातं क्षामये क्षमां कारये त्वाम् अहम् अप्रमेयं प्रमाणातीतम्।।यतः त्वम् --,
Sri Sridhara SwamiSanskrit Commentary+
किंच -- यच्चेति। हे अच्युत? यच्च परिहासार्थं क्रीडादिषु तिरस्कृतोऽसि। एकः केवलः। सखीन्विना रहसि स्थित इत्यर्थः। अथवा तत्समक्षं तेषां परिहसतां सखीनां समक्षं पुरतोऽपि तत्सर्वमपराधजातं त्वामप्रमेयचिन्त्यप्रभावं क्षामये क्षमां कारयामि।
Sri VallabhacharyaSanskrit Commentary+
किञ्च तामसकर्मसु मृगयाविहारादिषु स्थितं त्वां तमोगुणयुक्तं पूर्वं ज्ञात्वा मया यदसत्कृतोऽसि तदप्येकोऽहं त्वां साम्प्रतं क्षमां कारयामि।
Vedantadeshikacharya VenkatanathaSanskrit Commentary+
।। 11.42 इदंशब्दविशेषितमहिमशब्दः प्रकृतमहिमानुवादीत्यभिप्रयन्नाह -- अनन्तवीर्यत्वामितविक्रमत्वेत्यादि। प्रमादशब्दस्याज्ञानपरत्वेअजानता इत्यनेन पौनरुक्त्यात् सजातीयत्वभ्रमपरत्वमभिप्रेत्यप्रमादान्मोहादित्युक्तम्। सखेति बुद्धिहेतुत्वस्वारस्यात्प्रीतिवाचिनापि प्रणयशब्देन तदौपयिकचिरपरिचयोपचारो युक्त इत्याशयेनाहप्रणयेन चिरपरिचयेनेति सयुजा सखाया [ऋक्सं.2।3।17।5मुं.उ.3।1श्वे.उ.4।6] इति श्रुतिप्रतिपन्नसखित्वबुद्धेर्मोहादिजन्यत्वासम्भवेनसखेति मत्वा इत्येतल्लौकिकवयस्यत्वबुद्धिपरमित्याशयेनाहमम वयस्य इति मत्वेति।हे कृष्ण इत्यादिकं प्रसभोक्त्याकारसमर्पकमित्याशयेनान्वयं दर्शयन् प्रकृतोचितविनयाभावपरत्वमाहहे कृष्णेत्यादि।यच्च इत्यत्र चशब्दाभिप्रेतासत्कारबहुत्वसिद्ध्यर्थंयदसत्कृतोऽसि इत्यस्यावृत्त्या वाक्यभेदमङ्गीकृत्य अर्थमाहयच्च परिहासार्थमित्यादिना। तत एवतत्सर्वम् इति तस्य बहुत्वमुच्यते। परिहासार्थमप्यसत्कारो महद्विषयेऽपराध एवेत्यभिप्रायेण मध्यमपुरुषाक्षिप्तार्थमाहसर्वदैव सत्कारार्हस्त्वमिति। एकशब्दफलितोक्तिःएकान्त इति।