श्लोक · Shlok 20
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः | दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्॥
dyāvāpṛthivyoridamantaraṃ hi vyāptaṃ tvayaikena diśaśca sarvāḥ. dṛṣṭvādbhutaṃ rūpamugraṃ tavedaṃ lokatrayaṃ pravyathitaṃ mahātman.
Translation · अर्थ
English
This space between the earth and the heaven and all the arters are filled by Thee alone; having seen this, Thy wonderful and teriible form, the three worlds are trembling with fear, O great-souled Being.
Sūtradhāra Vichār
Classical commentaries
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A.C. Bhaktivedanta Swami PrabhupadaEnglish Commentary+
Dyāv ā-pṛthivyoḥ (“the space between heaven and earth”) and loka-trayam (“the three worlds”) are significant words in this verse because it appears that not only did Arjuna see this universal form of the Lord, but others in other planetary systems saw it also. Arjuna’s seeing of the universal form was not a dream. All whom the Lord endowed with divine vision saw that universal form on the battlefield.
Swami SivanandaEnglish Commentary+
द्यावापृथिव्योः of heaven and earth? इदम् this? अन्तरम् interspace? हि indeed? व्याप्तम् is filled? त्वया by Thee? एकेन alone? दिशः arters? च and? सर्वाः all? दृष्ट्वा having seen? अद्भुतम् wonderful? रूपम् form? उग्रम् terrible? तव Thy? इदम् this? लोकत्रयम् the three worlds? प्रव्यथितम् are trembling with fear? महात्मन् O greatsouled Being.Commentary Thee In Thy Cosmic Form.The space and the arters This denotes that the Lord has filled the whole universe of animate and inanimate objects.In order to remove the doubt entertained by Arjuna as to his success (Cf.II.6) Lord Krishna makes him feel now that victoyr for the Pandavas is certain.
Swami ChinmayanandaHindi Commentary+
विराट् पुरुष समस्त जगत् को व्याप्त किये हुए है? और देशकाल का भी अपना स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। वे भी इस सत्य पर ही आश्रित हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यहाँ वर्णित विषयवस्तु अनन्त है? सनातन है। इसीलिए यहाँ अर्जुन कहता है? अकेले आपके द्वारा स्वर्ग और पृथ्वी के मध्य का आकाश और समस्त दिशाएं व्याप्त हैं।विश्व की एकता को सरलता से ग्रहण नहीं किया जा सकता। जो जितना ही अधिक उसे समझता है? उसका वर्णन करने में उतना ही अधिक वह लड़खड़ाता है। इतने विशाल और भव्य सत्य को देखकर परिच्छिन्न बुद्धि का कम्पित हो जाना स्वाभाविक ही है।अर्जुन कहता है? इस अद्भुत और भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक भय कम्पित हो रहे हैं। यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि प्रत्येक मनुष्य जगत् को उसी रूप में देखता है जैसा कि वह स्वयं होता है। यथा दृष्टि तथा सृष्टि। विराट् का दर्शन करके अर्जुन भयभीत हुआ और उस मनस्थिति में जब वह जगत् को देखता है? तो तीनों लोक भी विस्मित और भय कम्पित दिखाई देते हैं। व्यासजी की यह विशेषता है कि विशाल और गम्भीर विषयवस्तु के वर्णन में व्यस्त होते हुए भी वे मनुष्य के मूलभूत आचरण को भूलते नहीं हैं और उनके ये सूक्ष्म निरीक्षण ही इस अतुलनीय सौन्दर्य और अपरिमेय गम्भीर चित्र को वास्तविकता की आभा प्रदान करते हैं।
Swami RamsukhdasHindi Commentary+
व्याख्या--'महात्मन्'-- इस सम्बोधनका तात्पर्य है कि आपके स्वरूपके समान किसीका स्वरूप हुआ नहीं, है नहीं, होगा नहीं और हो सकता भी नहीं। इसलिये आप महात्मा अर्थात् महान् स्वरूपवाले हैं। 'द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः'-- स्वर्ग और पृथ्वीके बीचमें जितना अवकाश है, पोलाहट है, वह सब पोलाहट आपसे परिपूर्ण हो रही है।पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण पूर्वउत्तरके बीचमें 'ईशान', उत्तर-पश्चिमके बीचमें 'वायव्य', पश्चिम-दक्षिणके बीचमें 'नैऋर््त्य' और दक्षिण-पूर्वके बीचमें 'आग्नेय' तथा ऊपर और नीचे -- ये दसों दिशाएँ आपसे व्याप्त हैं अर्थात् इन सबमें आप-ही-आप विराजमान हैं। 'दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितम्' -- [उन्नीसवें श्लोकमें तथा बीसवें श्लोकके पूर्वार्धमें उग्ररूपका वर्णन करके अब बीसवें श्लोकके उत्तरार्धसे बाईसवें श्लोकतक अर्जुन उग्ररूपके परिणामका वर्णन करते हैं -- ] आपके इस अद्भुत, विलक्षण, अलौकिक, आश्चर्यजनक, महान् देदीप्यमान और भयंकर उग्ररूपको देखकर स्वर्ग, मृत्यु और पाताललोकमें रहनेवाले सभी प्राणी व्यथित हो रहे हैं, भयभीत हो रहे हैं। यद्यपि इस श्लोकमें स्वर्ग और पृथ्वीकी ही बात आयी है (द्यावापृथिव्योः), तथापि अर्जुनद्वारा 'लोकत्रयम्' कहनेके अनुसार यहाँ पाताल भी ले सकते हैं। कारण कि अर्जुनकी दृष्टि भगवान्के शरीरके किसी एक देशमें जा रही है और वहाँ अर्जुनको जो दीख रहा है, वह दृश्य कभी पातालका है, कभी मृत्युलोकका है और कभी स्वर्गका है। इस तरह अर्जुनकी दृष्टिके सामने सब दृश्य बिना क्रमके आ रहे हैं (टिप्पणी प0 586.2)।,यहाँपर एक शङ्का होती है कि अगर विराट्रूपको देखकर त्रिलोकी व्यथित हो रही है, तो दिव्यदृष्टिके बिना त्रिलोकीने विराट्रूपको कैसे देखा? भगवान्ने तो केवल अर्जुनको दिव्यदृष्टि दी थी। त्रिलोकीको विराट्रूप देखनेके लिये दिव्यदृष्टि किसने दी? कारण कि प्राकृत चर्मचक्षुओंसे यह विराट्रूप नहीं देखा जा सकता, जबकि 'विश्वमिदं तपन्तम्' (11। 19) और 'लोकत्रयं प्रव्यथितम्' पदोंसे विराट्रूपको देखकर त्रिलोकीके संतप्त और व्यथित होनेकी बात अर्जुनने कही है। इसका समाधान यह है कि संतप्त और व्यथित होनेवाली त्रिलोकी भी उस विराट्रूपके अन्तर्गत ही है अर्थात् विराट्रूपका ही अङ्ग है। सञ्जयने और भगवान्ने विराट्रूपको एक देशमें देखनेकी बात (एकस्थम्) कही, पर अर्जुनने एक देशमें देखनेकी बात नहीं कही। कारण कि विराट्रूप देखते हुए भगवान्के शरीरकी तरफ अर्जुनका खयाल ही नहीं गया। उनकी दृष्टि केवल विराट्रूपकी तरफ ही बह गयी। जब सारथिरूप भगवान्के शरीरकी तरफ भी अर्जुनकी दृष्टि नहीं गयी, तब संतप्त और व्यथित होनेवाले इस लौकिक संसारकी तरफ अर्जुनकी दृष्टि कैसे जा सकती है? इससे सिद्ध होता है कि संतप्त होनेवाला और संतप्त करनेवाला तथा व्यथित होनेवाला और व्यथित करनेवाला -- ये चारों उस विराट्रूपके ही अङ्ग हैं। अर्जुनको ऐसा दीख रहा है कि त्रिलोकी विराट्रूपको देखकर व्यथित, भयभीत हो रही है, पर वास्तवमें (विराट्रूपके अन्तर्गत) भयानक सिंह, व्याघ्र, साँप आदि जन्तुओंको और मृत्युको देखकर त्रिलोकी भयभीत हो रही है। मार्मिक बात देखने, सुनने और समझनेमें आनेवाला सम्पूर्ण संसार भगवान्के दिव्य विराट्रूपका ही एक छोटा-सा अङ्ग है। संसारमें जो जडता, परिवर्तनशीलता, अदिव्यता दीखती है, वह वस्तुतः दिव्य विराट्रूपकी ही एक झलक है, एक लीला है। विराट्रूपकी जो दिव्यता है, उसकी तो स्वतन्त्र सत्ता है, पर संसारकी जो अदिव्यता है, उसकी स्ववतन्त्र सत्ता नहीं है। अर्जुनको तो दिव्यदृष्टिसे भगवान्का विराट्रूप दीखा, पर भक्तोंको भावदृष्टिसे यह संसार भगवत्स्वरूप दीखता है --'वासुदेवः सर्वम्।' तात्पर्य है कि जैसे बचपनमें बालकका,कंकड़-पत्थरोंमें जो भाव रहता है, वैसा भाव बड़े होनेपर नहीं रहता; बड़े होनेपर कंकड़-पत्थर उसे आकृष्ट नहीं करते, ऐसे ही भोगदृष्टि रहनेपर संसारमें जो भाव रहता है, वह भाव भोगदृष्टिके मिटनेपर नहीं रहता।जिनकी भोगदृष्टि होती है, उनको तो संसार सत्य दीखता है, पर जिनकी भोगदृष्टि नहीं है, ऐसे महापुरुषोंको संसार भगवत्स्वरूप ही दीखता है। जैसे एक ही स्त्री बालकको माँके रूपमें, पिताको पुत्रीके रूपमें, पतिको पत्नीके रूपमें और सिंहको भोजनके रूपमें दीखती है, ऐसे ही यह संसार 'चर्मदृष्टि'से सच्चा, 'विवेकदृष्टि'से परिवर्तनशील, 'भावदृष्टि'से भगवत्स्वरूप और 'दिव्यदृष्टि'से विराट्रूपका ही एक छोटा-सा अङ्ग दीखता है। सम्बन्ध--अब अर्जुनकी दृष्टिके सामने (विराट्रूपमें) स्वर्गादि लोकोंका दृश्य आता है और वे उसका वर्णन आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।
Sri Abhinav GuptaSanskrit Commentary+
No commentary.
Sri AnandgiriSanskrit Commentary+
प्रकृतभगवद्रूपस्य व्याप्तिं व्यनक्ति -- द्यावापृथिव्योरिति। तस्यैव भयंकरत्वमाचष्टे -- दृष्ट्वेति।
Sri DhanpatiSanskrit Commentary+
द्यावुृथिव्योरन्तमन्तरिक्षं त्वयैकेन विश्वरुपधरेण व्याप्तं दिशश्च सर्वाः त्वया व्याप्ताः। हि यस्मात्तस्मात्तवेदमुघ्रं,रुपं दृष्ट्वा लोकत्रयं प्रव्यथितं पीडितम्। अत इदमुपसंहर। महात्मनोऽक्षुद्रस्वभावस्य तव निर्दोषलोकपीडनं नोचितमित्याशयेनाह -- हे महात्मन्निति।
Sri JayatrithaSanskrit Commentary+
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि इत्यत्रत्वया इत्यनेनैवैकत्वस्य सिद्धत्वात्एकेन इति व्यर्थमित्यतः प्रमाणपूर्वकं तदभिप्रायमाह -- मातापित्रोरिति। बहुत्वेऽपि स एकोऽभिन्नः अनेनदिशश्च सर्वाः रूपान्तरैरित्युक्तं भवति। तदयुक्तम्। विश्वरूपस्यद्रष्टुमिच्छामि ते रूपं [11।3] इत्यादिना एकत्वावगतेरित्यत आह पश्येति। ऐक्यापेक्षयैकवचनमिति भावः। मातापित्रोः इति श्रुतिः प्रकृतानुपयोगिनी कथमुदाहृताद्यावापृथिव्योः इत्यनभिधानादित्यत आह -- मातापितरौ चेति। माता पृथिवी? नोऽस्मान्दुर्मतौ माधात् न दध्यात्। नोऽस्माकं मधु सुखहेतुरस्तु।दृष्ट्वाऽद्भुतं इत्यादिना विश्वरूपदर्शनस्य भयहेतुत्वमुच्यते। तन्न सर्वेषां सर्वदा? किन्तु केषाञ्चित्कारणविशेषात्कदाचिदेवेति सप्रमाणकं तदभिप्रायमाह -- न त्विति। अभ्यसेऽभ्यासे सति सर्वेषां तृप्तिरानन्द एवेत्यर्थः। एवं तद्दर्शनस्य भयहेतुत्वनियमाभावमभिधाय लोकत्रयस्य दर्शनाभावं चाह -- न त्विति। किन्तु त्रिलोकेषु स्थितैर्भक्तैरित्युक्तप्रकारेण कैश्चिदेव। तदभिप्रायश्च लोकत्रयशब्द इति भावः। प्रकारान्तरेणलोकत्रयं इत्यस्याभिप्रायमाह -- अदृष्ट्वाऽपीति। विश्वरूपदर्शनार्थं यतमानानां लोकत्रयस्थानां पुंसां तददृष्ट्वाऽपि चेतसि निरूप्य स्थितानां भये जाते सति तद्द्रष्टुरर्जुनस्य तथाऽहमिवैतेऽपि दृष्ट्वा बिभ्यतीति प्रतिभातीत्यतःलोकत्रयं दृष्ट्वा प्रव्यथितं इत्याहेत्यर्थः। अत्र श्रुतिसम्मतिमाह -- दृष्ट्वेति। देवं विश्वरूपं दृष्ट्वा मोदमानास्त एतेऽर्जुनादयस्तद्ध्यायिनः पश्यन्ति। कथम्भूतान् अदृष्ट्वापि तन्निरूप्यैतद्भयाद्बिभ्यतो भयचिह्नवतस्तस्मिन्नेव विश्वरूपे मनसो गतत्वात्तन्न्यस्तचक्षुर्मुखांश्च दृष्टवत् दृष्टवन्त इवेत्यर्थः।
Sri MadhavacharyaSanskrit Commentary+
मातापित्रोरन्तरङ्गः स एकः? रूपेण चान्यैः सर्वगतः स एकः इति वारुणश्रुतेरेकेनैव द्यावापृथिव्योरन्तरं व्याप्तो भवति।पश्य मे पार्थ रूपाणि [1।6।18] इति बहूनि रूपाणि प्रतिज्ञातानि मातापितरौ च पृथिवीद्यावौ। मा नो माता पृथिवी दुर्मतौ धात् मधु द्यौरस्तु नः पिता [ऋक्सं.बृ.उ.6।3।6] इत्यादिप्रयोगात्। न तु नियमतो भयप्रदं तत्स्वरूपम्। नारदस्य तदभावात्। केषाञ्चित्तथा दर्शयति भगवान् -- प्रियन्ति केचित्तस्य रूपस्य दृष्टौ बिभेति कश्चिदभ्यसे सर्वतृप्तिः इति वारुणशाखायाम्। न तु तं सर्वे पश्यन्ति। अदृष्ट्वाऽपि तान्निरूप्य भयेन द्रष्टुस्तथा प्रतिभाति। तथा च गौतमखिलेषु -- दृष्ट्वा देवं मोदमाना अदृष्ट्वाऽप्येतद्भयाद्बिभ्यतो दृष्टवत्ते। पश्यन्ति ते न्यस्तचक्षुर्मुखांस्तु तस्मिन्नेवैते मनसो गतत्वात् इति।
Sri Madhusudan SaraswatiSanskrit Commentary+
प्रकृतस्य भगवद्रूपस्य व्याप्तिमाह -- द्यावेति। द्यावापृथिव्योरिदमन्तरिक्षं हि एव त्वयैवैकेन व्याप्तं। दिशश्च सर्वा व्याप्ताः। दृष्ट्वाद्भुतमत्यन्तविस्मयकरमिदमुग्रं दुरधिगमं महातेजस्वित्वात्तव रूपमुपलभ्य लोकत्रयं प्रव्यथितं अत्यन्तभीतं जातं। हे महात्मन्साधूनामभयदायक? इतः परमिदमुपसंहरेत्यभिप्रायः।
Sri NeelkanthSanskrit Commentary+
एवं स्वयंकृतविश्वरूपदर्शनेन कृतकृत्यो भूत्वा तदुपसंहारमिच्छन्स्तौति -- द्यावापृथिव्योरिति। हे महात्मन्? हि प्रत्यक्षं त्वयैकेनेदं द्यावापृथिव्योरन्तरं मध्यं सर्वाः दिशश्च व्याप्ताः। अतस्तवेदमद्भुतमुग्रं रूपं दृष्ट्वा लोकत्रयं प्रकर्षेण व्यथितम्। अतः परमिदमुपसंहरेत्यभिप्रायः।
Sri PurushottamjiSanskrit Commentary+
किञ्चद्यावापृथिव्योरिति। इदं द्यावापृथिव्योः अन्तरमन्तरिक्षं एकेन त्वया व्याप्तम्। च पुनः? दिशः सर्वास्त्वया व्याप्ताः पश्यामि। किञ्च हे महात्मन् इतोऽप्यधिकप्रकटनसमर्थ तव इदमद्भुतमलौकिकं उग्रं अदृष्टं रूपं दृष्ट्वा लोकत्रयं प्रव्यथितं प्रकर्षेण व्यथितं भीतं पश्यामीति पूर्वेणान्वयः।
Sri RamanujaSanskrit Commentary+
द्युशब्दः पृथिवीशब्दश्च उभौ उपरितनानाम् अधस्तनानां च लोकानां प्रदर्शनार्थौ? द्यावापृथिव्योः अन्तरम् अवकाशः? यस्मिन् अवकाशे सर्वे लोकाः तिष्ठन्ति? सर्वः अयम् अवकाशः दिशश्च सर्वाः त्वया एकेन व्याप्ताः।दृष्ट्वा अद्भूतं रूपम् उग्रं तव इदम् अनन्तायामविस्तारम् अत्यद्भुतम् अति उग्रं तव रूपं दृष्ट्वा लोकत्रयं प्रव्यथितम् -- युद्धदिदृक्षया आगतेषु ब्रह्मादिदेवासुरपितृगणसिद्धगन्धर्वयक्षराक्षसेषु प्रतिकूलानुकूलमध्यस्थरूपं लोकत्रयं सर्वं प्रव्यथितम्? अत्यन्तभीतम् महात्मन् अपरिच्छेद्यमनोवृत्ते।ऐतेषाम् अपि अर्जुनस्य इव विश्वाश्रयरूपसाक्षात्कारसाधनं दिव्यं चक्षुः भगवता दत्तम्। किमर्थम् इति चेत् अर्जुनाय स्वैश्वर्यं सर्वं प्रदर्शयितुम् अत इदम् उच्यते -- दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् इति।
Sri ShankaracharyaSanskrit Commentary+
--,द्यावापृथिव्योः इदम् अन्तरं हि अन्तरिक्षं व्याप्तं त्वया एकेन विश्वरूपधरेण दिशश्च सर्वाः व्याप्ताः। दृष्ट्वा उपलभ्य अद्भुतं विस्मापकं रूपम् इदं तव उग्रं क्रूरं लोकानां त्रयं लोकत्रयं प्रव्यथितं भीतं प्रचलितं वा हे महात्मन् अक्षुद्रस्वभाव।।अथ अधुना पुरा यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः (गीता 2।6) इति अर्जुनस्य यः संशयः आसीत्? तन्निर्णयाय पाण्डवजयम् ऐकान्तिकं दर्शयामि इति प्रवृत्तो भगवान्। तं पश्यन् आह --,किञ्च --,
Sri Sridhara SwamiSanskrit Commentary+
किंच -- द्यावापृथिव्योरिति। द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि अन्तरिक्षं त्वयैकेन व्याप्तम्। दिशश्च सर्वा व्याप्ताः। अद्भुतमदृष्टपूर्वं त्वदीयमिदमुग्नं घोरं रूपं दृष्ट्वा लोकत्रयं प्रव्यथितमतिभीतं पश्यामीति पूर्वस्यैवानुषङ्गः।
Sri VallabhacharyaSanskrit Commentary+
द्यावापृथिव्योः इत्यारभ्यचूर्णितैरुत्तमाङ्गैः [11।27] इत्यन्तं स्पष्टार्थम्।
Vedantadeshikacharya VenkatanathaSanskrit Commentary+
एवम्भूतमिति अत्युग्ररूपमित्यर्थः। प्रव्यथितविशेषणानुसारेण लोकशब्दोऽत्र जनविषय इत्याह -- देवादय इति।दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाऽहम् [11।23] इति वक्ष्यमाणावेक्षणेनअहं चेत्युक्तम्। अनन्तत्वस्य बहुशोऽभिहितत्वादवच्छिन्नलोकद्वयव्याप्तिवचनं तदुपलक्षितलोकवर्गद्वयप्रदर्शनार्थमित्यभिप्रायेणाहद्युशब्द इति।अन्तरमवकाशावधिपरिधानान्तर्धिभेदतादर्थ्ये [अमरः3।3।186] इत्यनेकार्थान्तरशब्दस्य प्रस्तुतानुगुणमर्थमाहअवकाश इति। शक्तिविशेषादिवशात्सप्रतिघत्वविरोधाद्यभावाभिप्रायेणावकाशं विवृण्वन्विपण्डितार्थमाहयस्मिन्निति।अनन्तायामविस्तारमिति पूर्वोक्तस्यानुकर्षणम्। अयमभिप्रायः -- पूर्वापरवाक्ययोर्विग्रहेकविषयतया मध्ये स्वरूपव्याप्तिकथनप्रयोजनाभावाद्विग्रहस्य चातिमहत्त्वेन कण्ठोक्तत्वात्तद्विषयोऽयं व्याप्तिव्यपदेश इति। नात्र लोकत्रयशब्देन पृथिव्यादिकं विवक्षितम्? तत्र प्रव्यथितत्ववचनायोगात्। अतोमञ्चाः क्रोशन्ति इतिवत्तद्वर्तिनः प्राणिनो वक्तव्याः। ततश्च लक्षणातोऽपि लोकशब्दस्यैव मुख्यत्वेन जनविषयत्वं वरम्। जनस्य त्रित्वं च शत्रुमित्रोदासीनरूपेण सुप्रसिद्धम् तस्य च सर्वस्य जनस्यात्र समवायो युद्धदिदृक्षया सिद्धः अत एव लोकत्रयवर्तिकतिपयपुरुषव्यथादर्शनेन लोकत्रयनिर्देश इति न भ्रमितव्यम् नापीदमर्जुनस्योत्प्रेक्षणं? दृष्टस्यैव सर्वस्य वचनात् तदेतदाह -- युद्धेति। अत्र देवासुरादिग्रहणं मानुषव्यवच्छेदार्थं? युद्धायागतानां सर्वेषां भगवद्विग्रहादर्शनात्। सोपसर्गस्य धातोर्विवक्षितमाह -- अत्यन्तभीतमिति। महात्मशब्दस्य गम्भीरबुद्धिविशेषवत्सु प्रसिद्धत्वात्? विग्रहस्योग्रत्ववदाशयापरिच्छेदस्यापि भयहेतुत्वादत्रायमेवार्थ उचित इत्यभिप्रायेणाहअपरिच्छेद्येति। ननुदर्शयामास पार्थाय [11।9] इति ह्युपक्रान्तम् तत्कथं देवासुरादीनामपि मानुषवन्मांसचक्षुषां भगवद्विग्रहसाक्षात्कार उच्यते इत्यत्राह -- एतेषामपीति। अर्जुनस्य शिष्यभूतस्यात्यन्तोपसन्नस्य निरतिशयभक्तेः स्वविग्रहप्रकाशनं प्राप्तम् तदर्थं च तस्यैव दिव्यचक्षुर्दत्तम् वक्ष्यति चदेवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः [11।52] इति अतः सामान्येन सर्वस्य जनस्य दिव्यचक्षुःप्रदाने कारणं न पश्याम इत्यभिप्रायेण शङ्कते -- किमर्थमिति। परिहरति -- अर्जुनायेति। देवादीनामपि दिदृक्षासम्भवात्सर्वेषामवतारसाक्षात्कारवत्सुकृतविपाकसन्निपातात्क्षुद्राणामिव महतामपि भयावहत्वादिना निरङ्कुशैश्वर्यप्रकाशनेन प्रकृतोपयोगाच्च दिव्यचक्षुर्दानमिति भावः। तदेवार्जुनवाक्येन संवादयति -- अत इदमिति।