श्लोक · Shlok 1
अर्जुन उवाच | मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् | यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम॥
arjuna uvāca. madanugrahāya paramaṃ guhyamadhyātmasaṃjñitam. yattvayoktaṃ vacastena moho.ayaṃ vigato mama.
Translation · अर्थ
English
Arjuna said By this word (explanation) of the highest secret concerning the Self which Thou hast spoken, for the sake of blessing me, my delusion is gone.
Sūtradhāra Vichār
Classical commentaries
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A.C. Bhaktivedanta Swami PrabhupadaEnglish Commentary+
This chapter reveals Kṛṣṇa as the cause of all causes. He is even the cause of the Mahā-viṣṇu, from whom the material universes emanate. Kṛṣṇa is not an incarnation; He is the source of all incarnations. That has been completely explained in the last chapter. Now, as far as Arjuna is concerned, he says that his illusion is over. This means that Arjuna no longer thinks of Kṛṣṇa as a mere human being, as a friend of his, but as the source of everything. Arjuna is very enlightened and is glad that he has such a great friend as Kṛṣṇa, but now he is thinking that although he may accept Kṛṣṇa as the source of everything, others may not. So in order to establish Kṛṣṇa’s divinity for all, he is requesting Kṛṣṇa in this chapter to show His universal form. Actually when one sees the universal form of Kṛṣṇa one becomes frightened, like Arjuna, but Kṛṣṇa is so kind that after showing it He converts Himself again into His original form. Arjuna agrees to what Kṛṣṇa has several times said: Kṛṣṇa is speaking to him just for his benefit. So Arjuna acknowledges that all this is happening to him by Kṛṣṇa’s grace. He is now convinced that Kṛṣṇa is the cause of all causes and is present in everyone’s heart as the Supersoul.
Swami SivanandaEnglish Commentary+
मदनुग्रहाय for the sake of blessing me? परमम् the highest? गुह्यम् the secret? अध्यात्मसंज्ञितम् called Adhyatma? यत् which? त्वया by Thee? उक्तम् spoken? वचः word? तेन by that? मोहः delusion? अयम् this? विगतः gone? मम my.Commentary After hearing the glories of the Lord? Arjuna has an intense longing to have the wonderful vision of the Cosmic Form with his own eyes. His bewilderment and delusion have now vanished.Adhyatma That which treats of the discrimination between the Self and the notSelf metaphysics.I was worried about the sin involved in killing my relations and preceptors. I had the ideas? I am the agent in killing them they are to be killed by me.This delusion has vanished now after receiving Thy most profound and valuable instructions. Thou hast dispelled this delusion of ignorance from me.The vision of the Cosmic Form is not the ultimate goal. If that were so? the Gita would have ended with this chapter. The vision of the Cosmic Form is also one more in a series of graded experiences. It is a terrible experience too. That is the reason why Arjuna said to the Lord? stammering with fear What an awful form Thou hast I have seen that which none hath seen before. My heart is glad? yet faileth me on account of fear. Show me? O God? Thine other form again. O God of gods? support of all the worlds? let me see Thy form with the diadem? and with the mace and discus in Thy hands. Again I wish to see Thee as before assume Thy fourarmed form? O Lord of thousand arms and of forms innumerable.Arjuna heard the Lords statement? viz.? Having pervaded this whole universe with one fragment of Myself? I remain. This induced him to have the vision of the Lords Cosmic Form. He says? O Lord of compassion? Thou hast taught me the spiritual wisdom which can hardly be found in the Vedas. Thou hast saved me. My delusion has disappeared. Thou hast disclosed to me the nature of the Supreme Self? the secrets of Nature and Thy divine glories. My greatest ambition at the present moment is that I should behold with my own eyes Thy entire Cosmic Form.
Swami ChinmayanandaHindi Commentary+
पूर्व अध्याय में वर्णित भगवान् की विभूतियों को जानते से हुए अपने परम सन्तोष को? अर्जुन इस प्रारम्भिक श्लोक में व्यक्त करता है। अपने शिष्य पर केवल अनुग्रह करने और उसे मोहदशा से बाहर निकालने के लिए भगवान् ने जो इतना अधिक परिश्रम किया? अर्जुन उसकी भी प्रशंसा करता है। अनेकता में एकता का दर्शन करने का अर्थ संसार के दुख से सुरक्षित रहने के लिए रोग निरोधक टीका लगवाना है। अर्जुन की इस स्वीकारोक्ति से कि? मेरा मोह दूर हो गया है? व्यासजी? एक उत्तम विद्यार्थी पर पड़ने वाले पूर्व अध्याय के प्रभाव को बड़ी सुन्दरता से हमारे ध्यान में लाते हैं।मोह निवृत्ति? सत्य के ज्ञान का एक पक्ष है? न कि वह अपने आप में ज्ञान की प्राप्ति। अर्जुन अज्ञान के कारण नामरूपमय इस सृष्टि में अपना अलग और स्वतन्त्र अस्तित्व अनुभव कर रहा था। वह अब इस भेद के मोह से मुक्त हो चुका था। उसे वह दृष्टि मिल गयी? जिसके द्वारा वह इस भेदात्मक दृश्य जगत् में ही व्याप्त एक सत्ता को देख पाने में समर्थ हो जाता है। परन्तु फिर भी उसने अनेकता में एकता का प्रात्यक्षिक दर्शन नहीं किया था। यद्यपि सिद्धान्तत उसे इस एकत्व का ज्ञान स्वीकार्य था।राजपुत्र अर्जुन यह भलीभांति जानता है कि श्रीकृष्ण ने विभूतियोग का इतना विस्तृत वर्णन केवल उसके ऊपर अनुग्रह करने के लिए ही किया था। यह हमें इस बात का स्मरण कराता है कि किस प्रकार भगवान् अपने भक्तों के हृदय में स्थित उनके अज्ञानजनित अंधकार को नष्ट कर देते हैं।ये अध्यात्मविषयक वचन क्या थे अर्जुन कहता है
Swami RamsukhdasHindi Commentary+
व्याख्या--'मदनुग्रहाय'--मेरा भजन करनेवालोंपर कृपा करके मैं स्वयं उनके अज्ञानजन्य अन्धकारका नाश कर देता हूँ (गीता 10। 11) -- यह बात भगवान्ने केवल कृपा-परवश होकर कही। इस बातका अर्जुनपर बड़ा प्रभाव प़ड़ा, जिससे अर्जुन भगवान्की स्तुति करने लगे (10। 12 -- 15)। ऐसी स्तुति उन्होंने पहले गीतामें कहीं नहीं की। उसीका लक्ष्य करके अर्जुन यहाँ कहते हैं कि केवल मेरेपर कृपा करनेके लिये ही आपने ऐसी बात कही है (टिप्पणी प0 573.2)। 'परमं गुह्यम्'--अपनी प्रधान-प्रधान विभूतियोंको कहनेके बाद भगवान्ने दसवें अध्यायके अन्तमें अपनी ओरसे कहा कि मैं अपने किसी अंशसे सम्पूर्ण जगत्को, अनन्त-कोटि ब्रह्माण्डोंको व्याप्त करके स्थित हूँ (10। 42) अर्थात् भगवान्ने खुद अपना परिचय दिया कि मैं कैसा हूँ। इसी बातको अर्जुन परम गोपनीय मानते हैं 'अध्यात्मसंज्ञितम्'-- दसवें अध्यायके सातवें श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि जो मेरी विभूति और योगको तत्त्वसे जानता है अर्थात् सम्पूर्ण विभूतियोंके मूलमें भगवान् ही हैं और सम्पूर्ण विभूतियाँ भगवान्की सामर्थ्यसे ही प्रकट होती हैं तथा अन्तमें भगवान्में ही लीन हो जाती हैं -- ऐसा तत्त्वसे जानता है, वह अविचल भक्तियोगसे युक्त हो जाता है। इसी बातको अर्जुन अध्यात्मसंज्ञित मान रहे हैं (टिप्पणी प0 573.3)।'यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम'--सम्पूर्ण जगत् भगवान्के किसी एक अंशमें है -- इस बातपर पहले अर्जुनकी दृष्टि नहीं थी और वे स्वयं इस बातको जानते भी नहीं थे, यही उनका मोह था। परन्तु जब भगवान्ने कहा कि सम्पूर्ण जगत्को अपने एक अंशमें व्याप्त करके मैं तेरे सामने बैठा हूँ, तब अर्जुनकी इस तरफ दृष्टि गयी कि भगवान् कितने विलक्षण हैं! उनके किसी एक अंशमें अनन्त सृष्टियाँ उत्पन्न होती हैं, उसमें स्थित रहती हैं और उसीमें लीन हो जाती हैं, और वे वैसे-के-वैसे रहते हैं! इस मोहके नष्ट होते ही अर्जुनको यह खयाल आया कि पहले जो मैं इस बातको नहीं जानता था, वह मेरा मोह ही था (टिप्पणी प0 574)। इसलिये अर्जुन यहाँ अपनी दृष्टिसे कहते हैं कि भगवन्! मेरा यह मोह सर्वथा चला गया है। परन्तु ऐसा कहनेपर भी भगवान्ने इसको (अर्जुनके मोहनाशको) स्वीकार नहीं किया; क्योंकि आगे उनचासवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा है कि तेरेको व्यथा और मूढभाव (मोह) नहीं होना चाहिये -- 'मा ते व्यथा मा च विमूढभावः।' सम्बन्ध-- मोह कैसे नष्ट हो गया-- इसीको आगेके श्लोकमें विस्तारसे कहते हैं।
Sri Abhinav GuptaSanskrit Commentary+
No commentary.
Sri AnandgiriSanskrit Commentary+
तेन तेनात्मना भगवदनुसंधानार्थमुक्ता विभूतीरनुवदति -- भगवत इति। परस्य सोपाधिकं निरुपाधिकं च चिद्रूपं ध्येयत्वेन ज्ञेयत्वेन चोक्तमित्यर्थः। सोपाधिकमैश्वरं रूपमशेषजगदात्मकं विश्वरूपाख्यमधिकृत्याध्यायन्तरमवतारयन्ननन्तरप्रश्नोपयोगित्वेन वृत्तं कीर्तयति -- तत्र चेति। यदेतदशेषप्रपञ्चात्मकमखिलस्यैतस्य जगतः कारणं सर्वज्ञं सर्वैश्वर्यवद्रूपमुक्तं तदिदं श्रुत्वा तस्य साक्षात्कारं यियाचिषुरादौ पृष्टवानित्याह -- श्रुत्वेति। मयि करुणां निमित्तीकृत्योपकारोऽनुग्रहस्तदर्थमिति वचसो विशेषणम्। निरतिशयत्वं परमपुरुषार्थसाधनत्वम्। अशोच्यानित्यादित्वंपदार्थप्रधानं वाक्यम्। मोहस्यायमित्यात्मसाक्षिकत्वं दर्शयति। अविवेकबुद्धिरज्ञानविपर्यासात्मिका।
Sri DhanpatiSanskrit Commentary+
एवं विभूतीर्निरतिशयैश्वर्य च श्रुत्वा साक्षात्कर्तुमिच्छन्नर्जुन उवाच मदनुग्रहार्थ परममुत्कृष्टं परमपुरुषार्थसाधनत्वात् गोप्यमध्यात्मसंक्षितं वजस्त्वंपदार्थप्रधानमशोच्यानित्यादि यत्त्वयोक्तं तेन ममायं मोहोऽहंममेतिप्रत्ययजनकः कर्तृत्वादिहहितात्मस्वरुपावरको विगतो विशेषेण निवृत्तः।
Sri JayatrithaSanskrit Commentary+
एतदध्यायप्रतिपाद्यमर्थमाह -- यथेति। दशमान्ते [42]विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् इति व्याप्तोपासनं सङ्क्षेपेणोक्तम्। न च सङ्क्षेपोक्तस्य ध्यानं शक्यम्? बुद्धावनारोहात्। अतो यथाभूते व्याप्तरूपे विस्तरेण श्रुते ध्यानं शक्यं भवति? तथाभूतस्वरूपस्थितिरर्जुनाय प्रदर्शितस्यानुवादेन अनेनैकादशेनाध्यायेनोच्यते। स्वरूपग्रहणेन विश्वरूपस्य मायादिना तदैव निर्माय विसृष्टत्वं निवारयति।
Sri MadhavacharyaSanskrit Commentary+
म्। यथा श्रुते ध्यानं शक्यं तथा स्वरूपस्थितिरनेनाध्यायेनोच्यते।
Sri Madhusudan SaraswatiSanskrit Commentary+
न नेत्राकृतिर्यत्र यस्या न चान्तो न चादिश्च तैरन्यता नो विभूतेः।ममाभेदता येन दत्ताऽव्यवाया गुरुं काशिराजं भजेऽजं स्वराजम्।।पूर्वाध्याये नानाविभूतीरुक्त्वाविष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् इति विश्वात्मकं पारमेश्वरं रूपं भगवतान्तेऽभिहितं श्रुत्वा परमोत्कण्ठितस्तत्साक्षात्कर्तुमिच्छन्पूर्वोक्तमभिनन्दन्नर्जुन उवाच -- मदनुग्रहायेति। ममानुग्रहाय शोकनिवृत्त्युपकाराय परमं निरतिशयपुरुषार्थपर्यवसायि गुह्यं गोप्यं यस्मैकस्मैचिद्वक्तुमनर्हमपि अध्यात्मसंज्ञितं अध्यात्ममिति शब्दितमात्मानात्मविवेकविषयमशोच्यानन्वशोचस्त्वमित्यादिषष्ठाध्यायपर्यन्तं त्वंपदार्थप्रधानं यत्त्वया परमकारुणिकेन सर्वज्ञेनोक्तं वचो वाक्यं तेन वाक्येनाहमेषां हन्ता मयैते हन्यन्त इत्यादिविविधविपर्यासलक्षणो मोहोऽयमनुभवसाक्षिको विगतो विनष्टो मम। तत्रासकृदात्मनः सर्वविक्रियाशून्यत्वोक्तेः।
Sri NeelkanthSanskrit Commentary+
पूर्वस्मिन्नध्याये योगो विभूतिश्च व्याख्येयत्वेन प्रतिज्ञातौएतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति इति।आत्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन। भूयः कथय इतीतरेण च श्रोतव्यत्वेन प्रार्थितौ। तत्रअहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः इति संक्षेपेण योगो भगवता सर्वभूताधारत्वलक्षण उक्तः प्राग्विभूतिकथनात्। तदन्ते चविष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् इति कुसूलेन धान्यमिव मयेदं जगद्विष्टब्धमित्युक्त्या स एव स्मारितस्तदेव भगवतः सर्वभूताधारत्वं साक्षात्कर्तुकामोऽर्जुन उवाच -- मदनुग्रहायेति। मयि अनुग्रहोऽनुकम्पा तदर्थं मदनुग्रहाय। परमं सद्यः शोकमोहनिवर्तकत्वेनोत्कृष्टं गुह्यं गोप्यं अध्यात्मसंज्ञितमात्मानात्मविवेकार्थं शास्त्रमध्यात्मं तत्संज्ञितं यत्त्वया वचःअशोच्यानन्वशोचः इत्यादिना षष्ठाध्यायपर्यन्तं त्वंपदार्थशुद्धिप्रधानंनायं हन्ति न हन्यते इत्यात्मनोऽकर्तृत्वाभोक्तृत्वप्रतिपादकं तेन मम मोहोऽविवेकोऽयं विशेषेण गतो नष्टः। अत्र प्रथमे पादेऽक्षराधिक्यमार्षम्।
Sri PurushottamjiSanskrit Commentary+
कृष्णात्मत्वं हि जगतो विभूतिकथनान्नरः। अवगत्य च तद्रूपं द्रष्टुं हरिमथाऽब्रवीत् पूर्वाध्यायान्तेविष्टम्याहं [10।42] इत्यनेन स्वक्रीडात्मकत्वेन विश्वस्य स्वात्मकत्वं प्रतिपादितम्? तद्रूपदर्शनेच्छुरर्जुनो भगवन्तं विज्ञापयति -- मदनुग्रहायेति चतुर्भिः। मदनुग्रहाय मम स्वीयत्वेन ग्रहणाय परमं परः पुरुषोत्तमो मीयते अनुमीयते यस्मात्तादृशम्। अतएव गुह्यं सर्वेषामनाख्येयम्। अध्यात्मसंज्ञितं आत्मानात्मविवेकविषयत्वेन सर्वात्मरूपं यत् त्वया वचोविष्टभ्याहं इत्युक्तं? तेन ममाऽयं रूपे मोहो विशेषेण गतो नष्ट इत्यर्थः।
Sri RamanujaSanskrit Commentary+
अर्जुन उवाच -- देहात्माभिमानरूपमोहेन मोहितस्य मम अनुग्रहैकप्रयोजनाय परमं गुह्यं परमं रहस्यम् अध्यात्मसंज्ञितम् आत्मनि वक्तव्यं वचःन त्वेवाहं जातु नासम् (गीता 2।12) इत्यादितस्माद्योगी भवार्जुन (गीता 6।46) इत्येतदन्तं यत् त्वया उक्तम्? तेन अयं मम आत्मविषयो मोहः सर्वो विगतः दूरतो निरस्तः।
Sri ShankaracharyaSanskrit Commentary+
--,मदनुग्रहाय ममानुग्रहार्थं परमं निरतिशयं गुह्यं गोप्यम् अध्यात्मसंज्ञितम् आत्मानात्मविवेकविषयं यत् त्वया उक्तं वचः वाक्यं तेन ते वचसा मोहः अयं विगतः मम? अविवेकबुद्धिः अपगता इत्यर्थः।।किञ्च --,
Sri Sridhara SwamiSanskrit Commentary+
विभूतिवैभवं प्रोच्य कृपया परया हरिः। दिदृक्षोरर्जुनस्याथ विश्वरूपमदर्शयत् पूर्वाध्यायान्तेविष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् इति विश्वात्मकं पारमेश्वरं रूपमुपक्षिप्तं तद्दिदृक्षुः पूर्वोक्तमभिनन्दन्नर्जुन उवाच -- मदनुग्रहायेति चतुर्भिः। ममानुग्रहाय शोकनिवृत्तये परमं परमार्थनिष्ठं गुह्यं गोप्यमप्यध्यात्ममितिसंज्ञितमात्मानात्मविवेकविषयं यत्त्वयोक्तं वचःअशोच्यानन्वशोचस्त्वम् इत्यादि षष्ठाध्यायपर्यन्तं यद्वाक्यं तेन ममायं मोहोऽहं हन्ता एते हन्यन्त इत्यादिलक्षणो भ्रमो विगतो विनष्टः? आत्मनः कर्तृत्वाद्यभावोक्तेः।
Sri VallabhacharyaSanskrit Commentary+
अथातोऽष्टभिरध्यायैर्गुणैराश्रयधर्मतः। पुष्ट्यात्मना भगवता मोचितः स इतीर्यते स्वनिगमवचसा महिमज्ञाने भक्त्या स्वधर्ममर्यादा। कुण्डलावृतमुखभगवत्समाश्रयेणैव धर्मतः पुष्टिः मर्यादावचने पुष्टिः स्वकार्यार्थप्रदर्शने। इति मर्यादया मिश्रं पुष्टिरूपं प्रदर्श्यते पूर्वाध्यायान्ते परमासाधारणयोगः विभूतेरक्षरैश्वर्यस्य स्वस्य विष्टभ्याहमिति श्लोके योगाख्यमैश्वर्यमुदीरितं तद्विशिष्टरूपं दिदृक्षुः पूर्वोक्तमभिनन्दयन्नर्जुन उवाच मदनुग्रहायेति चतुर्भिः। गुह्यमध्यात्मसंज्ञितंअहं सर्वस्य प्रभवः [10।8] इति स्वमाहात्म्यनिरूपकं मर्यादारूपं यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मम गतो मोहः ऐश्वर्याज्ञानरूपः। माहात्म्यनिरूपकं वाक्यमेव ते श्रुतं? न तु तथा स्वरूपं दृष्टं तवेति भावः।
Vedantadeshikacharya VenkatanathaSanskrit Commentary+
विश्वरूपाध्यायभवतारयितुं विभूत्यध्यायार्थं सङ्गृह्याह -- एवमिति।भक्तियोगनिष्पत्तये तद्विवृद्धये चेति प्रयोजनकथनेनानन्तरमर्जुनस्य दिदृक्षा भक्तिविवृद्ध्यधीनेति सूचितम्।सकलेतरविलक्षणनेति सकलेतरवैलक्षण्यरूपेणेत्यर्थः यद्वा सकलेतरस्वभावविलक्षणेनेत्यर्थः। एतेनानवधिकातिशयत्वमुक्तं भवति।अनन्यसाधारणं स्वाभाविकमनवधिकातिशयम् इति पूर्वोक्तस्यात्र प्रातिलोम्येन प्रत्यभिज्ञानात्सकलेतरविलक्षणेन भगवदसाधारणेनेत्यनयोर्यथेष्टं हेतुसाध्यभावेन अन्वयात्समाधिकराहित्यतात्पर्याच्च नानर्थक्यम्। श्रुतार्थनिश्चयाधीनभक्तिविवृद्धिफलभूतदिदृक्षामूलमुत्तराध्यायोपोद्धातरूपमर्जुनवाक्यमवतारयति -- तमेतमिति। तं सर्वातिशायिनम्? एतं उक्तप्रकारम्।भगवत्सकाशादित्यनेन निश्चयहेतुभूतमाप्तत्वं सूचितम् नह्याचार्यान्तरसकाशादुपश्रवणे दिदृक्षायां सत्यामपि दर्शनप्रार्थनं घटत इति च भावः।एवमेतत् इत्यादिश्लोकार्थाभिप्रायेणाह -- एवमेवेति निश्चित्येति। ननुएवमेतद्यथात्थ इति पूर्वोक्तमभ्युपगम्यद्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरम् [11।3] इत्यर्थान्तरस्य रूपविशेषस्य दिदृक्षावचनमिव भाति ततश्च कथं तथाभूतं भगवन्तं साक्षात्कर्तुकाम इत्युच्यते तत्राह -- तथैवेति। श्रुतप्रकारेणेत्यर्थः। तद्विवृणोति -- सर्वाश्चर्येति।अहं सर्वस्य प्रभवः [10।8] इत्यादिनाविष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् [10।42] इत्यन्तेन प्रतिपादितो ह्यर्थोऽत्र विग्रहविशेषानुबन्धेन प्रत्यक्षं प्रत्यभिज्ञायत इति भावः। अत्र साक्षात्कारं प्रार्थयितुंमदनुग्रहाय इत्यादिभिस्त्रिभिः श्लोकैः कृतज्ञतामास्तिक्यं भक्तिमत्त्वं च दर्शयति।तत्र प्रथमेन अध्यात्मशब्दादिस्वारस्यात्भवाप्ययौ इत्यादेः सप्तमाद्यर्थस्य पृथग्वचनाच्चात्मतत्त्वतदवलोकनोपायश्रवणतत्फलानुवादः क्रियत इत्यभिप्रायेणाह -- देहात्मेति।मोहो विगतः इत्यनन्तरमभिधानात् मच्छब्देन मोहविशिष्टस्वरूपं विवक्षितमित्यभिप्रायेणमोहितस्येत्यन्तमुक्तम्।मदनुग्रहाय इत्यनेन न ह्यन्यत्तेनानवाप्तमवाप्तव्यमस्तीत्यभिप्रेतमित्याहमामनुग्रहैकप्रयोजनायेति। युद्धप्रोत्साहनमात्रशङ्काप्यनेन निरस्ता। परमशब्दविशेषितगुह्यशब्देनमौनं चैवास्मि गुह्यानाम् [10।38] इत्युक्तगुह्यत्वप्रतीतिव्युदासाय रहस्यशब्देन व्याख्या। गुह्यतमभक्तियोगशेषत्वात्परमत्वविशेषणमित्यादृत्य परमशब्दपाठेन सूचितम्। आत्मनि प्रतिपादकत्वेनाधिवसनाद्वचसोऽध्यात्मत्वमित्यभिप्रेत्यआत्मनि वक्तव्यमित्युक्तम्। उपोद्धातान्मध्यमषट्कप्रस्तावश्लोकार्थाच्चावच्छिद्य जीवात्मप्रधानमंशमध्यात्मशब्दानूदितमाह -- न त्वेवाहमिति।अध्यात्मसंज्ञितम् इत्येतदनुसारात्अयम् इत्यपरोक्षनिर्देशाभिप्रेतमुक्तंममात्मविषय इति।विगतः इत्यनेन सोपसर्गेण सवासनं निश्शेषविनाशो विवक्षित इति प्रदर्शनायसर्वशब्दः।दूरतो निरस्त इति संस्कारस्यापि तिरस्कारादपुनरङ्कुरं विनष्ट इत्यर्थः।